विशेष / भारत की ऐसी बेटी, जिसके जन्मदिन पर रो रहा था देश, 360 जिंदगी बचाकर शहीद हुई थीं नीरजा

Zoom News : Sep 07, 2019, 12:09 PM
वह अपने 23वें जन्मदिन से मात्र दो दिन पहले ही चली गई। सात सितम्बर को उसका जन्मदिन आता है और उस मौके पर देश जार—जार रो रहा था। हम बात कर रहे हैं भारत की बहादुर बेटी नीरजा भनोट की, जिसने अपनी जान देकर 360 नागरिकों की जान बचाई। उसे वीरता के लिए भारत का सर्वोच्च बहादुरी पुरस्कार (शांतिकाल) अशोक चक्र मिला। उसे पाकिस्तान, ब्रिटेन और अमेरिका ने भी बहादुरी के कई पुरस्कारों से नवाजा।

नीरजा का जन्म 7 सितंबर 1963 को पिता हरीश भनोट और माँ रमा भनोट के यहां चंडीगढ़ में हुआ। उनके पिता बंबई (अब मुंबई) में पत्रकार थे। नीरजा की प्रारंभिक शिक्षा अपने गृहनगर चंडीगढ़ के सैक्रेड हार्ट सीनियर सेकेण्डरी स्कूल में हुई। इसके पश्चात् उनकी शिक्षा मुम्बई के स्कोटिश स्कूल और सेंट ज़ेवियर्स कॉलेज में हुई।

नीरजा का विवाह वर्ष 1985 में हुआ और वे पति के साथ खाड़ी देश को चली गयी लेकिन कुछ दिनों बाद दहेज के दबाव को लेकर इस रिश्ते में खटास आयी और विवाह के दो महीने बाद ही नीरजा वापस मुंबई आ गयीं। इसके बाद उन्होंने पैन एम में विमान परिचारिका की नौकरी के लिये आवेदन किया और चुने जाने के बाद मियामी में ट्रेनिंग के बाद वापस लौटीं।

विमान अपहरण घटनाक्रम
मुम्बई से न्यूयॉर्क के लिये रवाना पैन ऍम-73 को कराची में चार आतंकवादियों ने अपहृत कर लिया और सारे यात्रियों को बंधक बना लिया। नीरजा उस विमान में सीनियर पर्सन के रूप में नियुक्त थीं और उन्हीं की तत्काल सूचना पर चालक दल के तीन सदस्य विमान के कॉकपिट से तुरंत सुरक्षित निकलने में कामयाब हो गये। पीछे रह गयी सबसे वरिष्ठ विमानकर्मी के रूप में यात्रियों की जिम्मेवारी नीरजा के ऊपर थी और जब 17 घंटों के बाद आतंकवादियों ने यात्रियों की हत्या शुरू कर दी और विमान में विस्फोटक लगाने शुरू किये तो नीरजा विमान का इमरजेंसी दरवाजा खोलने में कामयाब हुईं और यात्रियों को सुरक्षित निकलने का रास्ता मुहैय्या कराया।

वे चाहतीं तो दरवाजा खोलते ही खुद पहले कूदकर निकल सकती थीं किन्तु उन्होंने ऐसा न करके पहले यात्रियों को निकलने का प्रयास किया। इसी प्रयास में तीन बच्चों को निकालते हुए जब एक आतंकवादी ने बच्चों पर गोली चलानी चाही नीरजा के बीच में आकार मुकाबला करते वक्त उस आतंकवादी की गोलियों की बौछार से नीरजा की मृत्यु हुई। नीरजा के इस वीरतापूर्ण आत्मोत्सर्ग ने उन्हें अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर हीरोइन ऑफ हाईजैक के रूप में ख्याति दिलाई।

सम्मान
नीरजा को भारत सरकार ने इस अदभुत वीरता और साहस के लिए मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया जो भारत का सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता पुरस्कार है। अपनी वीरगति के समय नीरजा भनोट की उम्र मात्र साल थी। इस प्रकार वे यह पदक प्राप्त करने वाली पहली महिला और सबसे कम आयु की नागरिक भी बन गईं। पाकिस्तानी सरकार की ओर से उन्हें तमगा-ए-इन्सानियत से नवाज़ा गया।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नीरजा का नाम हीरोइन ऑफ हाईजैक के तौर पर मशहूर है। वर्ष 2004 में उनके सम्मान में भारत सरकार ने एक डाक टिकट भी जारी किया और अमेरिका ने वर्ष 2005 में उन्हें जस्टिस फॉर क्राइम अवार्ड दिया है।

स्मृति शेष
नीरजा की समृति में मुम्बई के घाटकोपर इलाके में एक चौराहे का नामकरण किया गया जिसका उद्घाटन 90 के दशक में अमिताभ बच्चन ने किया। इसके अलावा उनकी स्मृति में एक संस्था नीरजा भनोट पैन ऍम न्यास की स्थापना भी हुई है जो उनकी वीरता को स्मरण करते हुए महिलाओं को अदम्य साहस और वीरता हेतु पुरस्कृत करती है। उनके परिजनों द्वारा स्थापित यह संस्था प्रतिवर्ष दो पुरस्कार प्रदान करती है जिनमें से एक विमान कर्मचारियों को वैश्विक स्तर पर प्रदान किया जाता है और दूसरा भारत में महिलाओं को विभिन्न प्रकार के अन्याय और अत्याचार के खिलाफ़ आवाज़ उठाने और संघर्ष के लिये। प्रत्येक पुरस्कार की धनराशि डेढ़ लाख रुपये हैं और इसके साथ पुरस्कृत महिला को एक ट्राफी और स्मृतिपत्र दिया जाता है। महिला अत्याचार के खिलाफ़ आवाज़ उठाने के लिये प्रसिद्ध हुई राजस्थान की दलित महिला भंवरीबाई को भी यह पुरस्कार दिया गया था।

टॉप मॉडल थी नीरजा
एयर होस्टेस बनने से पहले ही नीरजा एक टॉप की मॉडल थीं। उन्होंने कई नामी ब्रैंड्स के लिए प्रिंट और टीवी विज्ञापन किए थे। जब वह 16 साल की थीं, तब एक मैगजीन ने उन्हें स्पॉट किया। उन्होंने करीब 90 ब्रैंड्स के लिए मॉडलिंग की। 

इस तरह किया आत्मोत्सर्ग
आतंकियों ने पाकिस्तान सरकार से पायलट भेजने की मांग की, ताकि वो विमान को अपने मन मुताबिक जगह पर ले जा सकें, पाक सरकार ने मना कर दिया। इससे भन्नाए आतंकियों ने विमान में बैठे अमेरिकी यात्रियों को मारने का फैसला कर लिया। वो अमेरिका के जरिए पाक सरकार पर दबाव बनाने की ताक में थे। लेकिन उन्हें नहीं पता था इसी विमान की 23 साल की अकेली पतली-दुबली फ्लाइट अटेंडेंट उन पर भारी पड़ जाएगी। आतंकियों ने गलती से नीरजा को बुला लिया और सभी यात्रियों के पासपोर्ट इकट्ठा करने को कहा, ताकि वो अमेरिकी नागरिकों को चुन-चुन कर मार सकें।
सबके निकल जाने के बाद आखिर में जब वो विमान से निकलने लगीं, तो अचानक उसे कुछ बच्चों के रोने की आवाज सुनाई दी। नीरजा ने रोते हुए बच्चों को छोड़कर भागना ठीक नहीं समझा। वो वापिस गईं और बच्चों को ढूंढ निकाला। जैसे ही वह उन्हें लेकर एक आपातकालीन खिड़की की ओर बढ़ीं एक आतंकी उनके सामने आ खड़ा हुआ। नीरजा ने बच्चों को नीचे धकेल दिया और आतंकी ने नीरजा को गोलियों से छलनी कर दिया।