दिल्ली हिंसा / सात किलोमीटर में हुई दर्दनाक हिंसा, कोई भाई के गम में डूबी, तो किसी के बुढ़ापे लाठी छिन गई

AMAR UJALA : Feb 28, 2020, 07:25 AM

नई दिल्ली | तीन दिन तक हिंसा की आग में जले उत्तर-पूर्वी जिले में गुरुवार को चौथे दिन भले ही शिव विहार में मामूली हिंसा को छोड़कर पूरे जिले मेें शांति रही, लेकिन जिन लोगों ने अपनों को खो दिया, उनके जख्म भरने में वक्त लगेगा। किसी ने बेटा खो दिया तो किसी ने परिवार के मुखिया को।

कोई बहन अपने भाई के गम में डूबी है तो किसी बुजुर्ग की बुढ़ापे की लाठी  ही छिन गई। रोजी-रोटी का जरिया जलकर राख हो चुका है। बच्चे बेसहारा हो चुके हैं। घरों-दुकानों व गाड़ियों के मलबे से अब भी धुआं उठ रहा है। यह आग ठंडी हो जाएगी, लेकिन अपनों की याद में पीड़ितों के आंसू शायद ही सूख पाए।  

गुरुवार सुबह लोग सड़कों पर दिखे और खुद ही हिंसा के निशान मिटाने शुरू किए। ईंट-पत्थर चलने से लाल हो चुकी सड़कों पर झाड़ू लगाई। इसके साथ ही दुकानों पर खरीदार भी नजर आए।  हिंसा के दौरान सीलमपुर से जाफराबाद होते हुए मौजपुर जाने वाली सड़क को एक तरफ से बंद कर दिया गया था उसे वाहनों की आवाजाही के लिए खोल दिया गया। कुछ देर बाद ही मुख्य सड़क पर वाहन फर्राटा भरने लगे।

इससे पहले सुबह ही इन सड़कों को साफ करने का काम शुरू कर दिया गया था। इसी तरह वजीराबाद रोड पर भी वाहनों की आवाजाही शुरू हो गई और लोग घरों से निकलकर काम पर जाने लगे। हालांकि इन सड़कों पर पुलिस व अर्द्धसैनिक बलों की मौजूदगी थी।

कई जगहों पर दुकानें भी खुलने लगी और लोग रोजमर्रा का सामान खरीदने के लिए पहुंचे। हालांकि, अभी नूर इलाही ब्रह्मपुरी रोड, शिव विहार रोड और करावल नगर रोड में वाहनों को जाने की अनुमति नहीं है। लेकिन इन जगहों पर अद्र्धसैनिक बल लगातार फ्लैग मार्च कर रहे हैं। 

सात किलोमीटर के दायरे में हुई हिंसा

उत्तर-पूर्वी दिल्ली के महज सात किलोमीटर के दायरे में हिंसा हुई। हिंसा भी ऐसी कि शायद इसके जख्म भरते कई दशक लग जाएं। उपद्रवियों ने रविवार, सोमवार और मंगलवार को जमकर बवाल काटा। एक-दूसरे समुदाय के मकानों, दुकानों, फैक्टरी, स्कूल और यहां तक धार्मिक स्थलों को निशाना बनाया गया। लोगों का कहना है कि 1984 और 1992 में भी ऐसी हिंसा नही हुई थी।

जिले में शांति हुई तो लोग हिंसा के डेमेज कंट्रोल में जुट गए। कुछ लोगों ने लंगर बांटकर भाईचारे का पैगाम दिया। कुछ लोग गाड़ियों में खाना-पानी और यहां तक खाने-पीने की जरूरत का सामान भी लेकर हिंसा ग्रस्त इलाकों में पहुंचे। कुछ मोहल्लों में विशेष समुदाय के इक्का-दुक्का घर थे, अब उनके पड़ोसी ऐसे लोगों को मनाकर मोहल्ला न छोड़ने की अपील कर रहे हैं।

घोंडा निवासी दिनेश शर्मा ने बताया कि उनके गांव में कई मुस्लिम परिवार रहते हैं। हिंसा हुई तो कुछ लोग अपने-अपने मकानों को छोड़कर भाग गए। हालांकि कुछ लोग रुके भी रहे। अब यह लोग घरों को छोड़कर दूसरी जगह शिफ्ट करने की बात कर रहे हेैं। दिनेश ने बताया कि गांव के लोग इन लोगों को ऐसा न करने के लिए कह रहे हैं।

उनका कहना है कि जो होना था वह हो गया। भविष्य में ऐसी नौबत दोबारा नहीं आएगी। बुजुर्ग  सुकमा देवी ने बताया कि उनके घर पर ही दो परिवार रहते हैं, वह उनको दूसरी जगह न जाने के लिए कह रही हैं।

मौजपुर चौक, घोंडा चौक, नूर-ए-इलाही, ब्रह्मपुरी रोड समेत दूसरे इलाकों में लोग टेंपो में लंगर बांटते दिखाई दिए। इन लोगों का कहना था कि हिंसा के बाद कई इलाकों में अघोषित कर्फ्यू लग गया था। इसकी वजह से कई लोगों के घर में खाने को भी नहीं था।

65 साल के मेहफूज ने बताया कि वह गामड़ी में रहते हैं, उनके घर में तीन सदस्य हैं। सोमवार से ही घर में खाने को कुछ नहीं था। बृहस्पतिवार को हालत बेहतर हुए तो वह खाने की तलाश में निकले। घोंडा चौक के पास मंदिर के सेवादार खाना बांट रहे थे। वह उनसे खाना लेकर आए।

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