विशेष / भूलकर भी नहीं लेना चाहिए किन्नरों की बद्दुआ, पड़ता है जीवन पर ऐसा असर

News18 : Nov 10, 2019, 01:58 PM

लाइफस्टाइल डेस्क | किन्नर समुदाय के बारे में काफी सारी बातें हैं, जो दूसरों से अलग हैं। जैसे आमतौर पर शादी-ब्याह में नाच-गाकर या बच्चों के जन्म पर दुआएं देकर अपना जीवनयापन करने वाले किन्नरों की दुआ और बद्दुआ दोनों में असर माना जाता है। कभी सोचा है कि आखिर ऐसा क्या है जो किन्नरों के कहने पर ज्यादातर लोग चुपचाप बटुआ खोलकर पैसे निकाल देते हैं?

ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों को किन्नर कहा जाता है। इस शब्द से होमो सेक्सुअल, ट्रांस सेक्सुअल, बाई सेक्सुअल और इंटरसेक्सुअल आदि सभी तरह के व्यक्तियों की पहचान जुड़ी है। भारत में ज्यादातर सभी को हिजड़ा ही कहा जाता है। ज्यादातर जगहों पर ये लोग अपनी ही सोसाइटी बनाकर, दुनिया से कटकर, रहने को मजबूर हैं।

आधी रात में होता है किन्नरों का अंतिम संस्कार, क्यों नहीं होती 'बाहरी' लोगों को देखने की इजाजत

वैसे तो देश में इन्हें थर्ड जेंडर का दर्जा बाकायदा सुप्रीम कोर्ट से मिल चुका है लेकिन अब भी ये मुख्यदारा से जुड़े हुए नहीं हैं। दफ्तरों में इन्हें काम नहीं मिलता या मिलता भी है तो भेदभाव से तंग होकर ये काम छोड़ने पर मजबूर हो जाते हैं। ऐसे में किन्नर शादियों में नाच-गाकर, घरों में किसी शुभ मौके पर दुआएं देकर पेट पालने को मजबूर हो जाते हैं। इसके अलावा सड़कों पर ट्रैफिक सिग्नल पर भी किन्नर आने-जाने वाली गाड़ियों से पैसे मांगते दिख जाते हैं। अक्सर लोग इनकी मांग का विरोध नहीं कर पाते। इसके पीछे बद्दुआओं का डर है।

माना जाता है कि किन्नरों की हाय हर हाल में लगती है। इसके पीछे वजह बताई जाती है कि किन्नर अपनी आइडेंटिटी के कारण पूरी जिंदगी तकलीफें झेलते हैं। ऐसे में इनकी बद्दुआ दिल से निकलती है और जिसे भी दें, वो तकलीफ में आ जाता है। खासकर पर आर्थिक मामले में इनकी बद्दुआओं को काफी मारक माना गया है क्योंकि ज्यादातर किन्नर ताउम्र मुफलिसी झेलते हैं। उनकी रिश्ते पर बद्दुआ से भी लोग बचते हैं। रिश्तों और प्यार के मामले में भी किन्नर काफी तंगहाल होते हैं। परिवार उन्हें स्वीकार नहीं करता और न ही समाज से जुड़ पाते हैं। किसी के घर बच्चा पैदा हो और उस बच्चे के जननांग में कोई कमजोरी पायी जाती है, तो ग्रामीण इलाकों में समाज के डर से अमूमन उसे किन्नरों के हवाले कर दिया जाता है। फिर वो बच्चा पूरी जिंदगी अपने परिवार से दूर हो जाता है या मिलना भी हो तो छुपते-छिपाते होता है।

यहां तक कि किन्नरों की शादी भी एक दिन के लिए ही होती है। एक दिन की शादी के पीछे एक पौराणिक कथा है। दक्षिण भारत में ज्यादातर हिंदू किन्नर इरावन या अरावन नाम के देवता की पूजा करते हैं। इस देवता का नाम महाभारत में आता है। इन्हें अर्जुन और नागा राजकुमारी उलूपी का पुत्र बताया जाता है। महाभारत की कहानी के अनुसार युद्ध के वक्त देवी काली को खुश करना होता है। अरावन उन्हें खुश करने के लिए अपनी बलि देने को तैयार हो जाते हैं। लेकिन उसकी शर्त होती है कि वह अविवाहित नहीं मरना चाहते। शादी के अगले ही पल बेटी के विधवा हो जाने के डर से कोई भी राजा उससे अपनी बेटी की शादी को तैयार नहीं होता। ऐसे में श्रीकृष्ण ही मोहिनी रूप धरकर अरावन से शादी कर लेते हैं।

इसी कथा के आधार पर किन्नर भी एक दिन के लिए अरावन से शादी करते हैं। और अगले ही दिन अरावन को मृत मानकर विधवा हो जाते हैं। शादी के अगले ही रोज विधवा हो जाने वाला पल किसी आम लड़की के पति की मौत जैसा ही होता है। यही वक्त होता है, जिसमें किन्नर आम लोगों की तरह बिलखकर रोते हैं।

आमतौर पर किन्नर खुद को वैसे मंगलामुखी मानते हैं यानी मंगल कामों से ही जुड़ा हुआ और मंगल ही पर यकीन रखने वाला। यही वजह है कि खुद अपने ही समुदाय के सदस्यों की मौत पर भी ये मातम नहीं मनाते, बल्कि खुशी ही मनाते हैं। अपने सदस्यों का अंतिम संस्कार किन्नर निहायत गुप्त तरीके से करते हैं। इसके पीछे उनकी मान्यता है कि अगर बाहरी सदस्य यानी समाज के दूसरे लोग अंतिम संस्कार देख लेंगे तो मृतक का अगल जन्म भी किन्नर रूप में ही होगा।

ये भी मान्यता है कि किन्नरों की खुशी और आशीर्वाद बुरे से बुरे हाल में जी रहे लोगों का जीवन सुधार सकता है। ये भी कहते हैं कि कहा जाता है कि इनसे एक सिक्का लेकर पर्स में रखने से पैसों की बरकत होती है। यही वजह है कि बहुत से लोग किन्नरों को कभी गुस्सा नहीं दिलाना चाहते, बल्कि उनकी पैसों की छोटी -मोटी मांग पूरी कर देते हैं।