एजुकेशन / "मल्टी डिसिप्लिनरी, मल्टी डाइमेंशनल और मल्टी कल्चरल वैल्यूज आधारित शिक्षा चाहिए"

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Aug 13, 2019, 04:47 PM

जयपुर में आयोजित एक कार्यशाला तकनीकी एवं संस्कृत शिक्षा राज्यमंत्री डॉ. सुभाष गर्ग ने कहा है कि मल्टी डिसिप्लिनरी, मल्टी डाइमेंशनल और मल्टी कल्चरल वैल्यूज पर आधारित समेकित शिक्षा नीति वर्तमान समय की आवश्यकता है। इसके लिए उच्च शिक्षा, चिकित्सा, आयुर्वेद, संस्कृत एवं तकनीकी शिक्षा सभी को एक छत के नीचे लाना होगा। तभी छात्रों में आज के एआई और रोबोटिक्स के इस युग के अनुरूप ट्रांसडिस्पि्लनरी समझ विकसित कर उनका कौशल विकास किया जा सकेगा।  

डॉ. गर्ग मंगलवार को एमएनआईटी के प्रभा भवन में ‘राजस्थान में तकनीकी शिक्षा के संदर्भ में नई शिक्षा नीति’ विषय पर आयोजित राज्यस्तरीय कार्यशाला को सम्बोधित कर रहे थे।

तकनीकी शिक्षा राज्यमंत्री ने कहा कि हमें अपने विद्यार्थियों को नंबरों और पर्सेंटाइल के दबाव से बाहर लाकर उनमें ज्ञानार्जन की इच्छा जगाने वाली शिक्षा नीति विकसित करनी होगी। उन्होंने स्वयं का उदाहरण देते हुए कहा कि मैं आज राजनीति में हूं लेकिन उससे पहले एक शिक्षक था। इसलिए मेरी जिम्मेदारी है कि शिक्षा को राजनीति से दूर रखा जाए और सभी शिक्षकों की भी यह जिम्मेदारी बनती है। उन्होंने कहा कि हमें सामाजिक सरोकार का भाव रखकर शिक्षा में गुणवत्ता के स्तर को सुधारना होगा।

उन्हाेंने कहा कि एआईसीटीई ने 2020 तक नए इंजीनियरिंग कॉलेज खोलने पर रोक लगा दी है। बार काउंसिल ने तीन साल तक नए लॉ कॉलेज खोलने पर रोक लगाई है। ऎसे में शिक्षा की इन अखिल भारतीय स्तर की संस्थाओं को इसके कारणों और अपनी भूमिका पर फिर से विचार करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि केन्द्र सरकार के माध्यम से मिलने वाली मदद में अलग-अलग मदों की बाध्यता में छूट देनी चाहिए ताकि लैब्स का ढांचा विकसित कर प्रायोगिक शिक्षा का स्तर सुधारा जा सके। उन्होंने कहा कि निजी उच्च शिक्षण संस्थाएं सेल्फ फाइनेंसिंग आधार पर चलती हैं और आर्थिक रूप से सक्षम होती हैं ऎसे में केन्द्र सरकार को इनकी आर्थिक मदद करने के बजाय केन्द्र और राज्य सरकार के स्तरीय उच्च शिक्षण संस्थानों को आर्थिक सहायता देनी चाहिए। 

ब्लैकबोर्ड ड्रिवन नहीं ट्रांसडिसिप्लिनरी हो शिक्षा- प्रो. दिनेश सिंह, पूर्वी वीसी, दिल्ली विव

कार्यशाला में दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति और प्रख्यात शिक्षाविद् प्रो. दिनेश सिंह ने कहा कि भारत की प्राचीन संस्कृति का आधार वैज्ञानिक रहा है। यहां के प्राचीन मंदिरों का निर्माण गणित में कैलकुलस के सिद्धांतों के आधार पर  ही हुआ था। हमें देश को पुनः विज्ञान के उस शीर्ष पर ले जाने की जरूरत है। उन्होंने एक उदाहरण देते हुए कहा कि छात्र फाइटर प्लेन तो बनाना चाहते हैं लेकिन फ्लूड डायनमिक्स की पढ़ाई से जी चुराते हैं। इसका कारण यह है कि भारत में शिक्षा ब्लैकबोर्ड आधारित है, हमें इससे हटकर ट्रांसडिसिप्लनरी शिक्षा पर जोर देना चाहिये। 

प्रो. सिंह ने कहा कि अब आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस और रोबोटिक्स का समय है। इससे भारत के श्रम आधारित रोजगारों के लिए संकट पैदा होगा। ऎसे में छात्र साहित्य, इंजीनियरिंग और गणित जैसे विविध विषयों के अंतर्सम्बन्ध को नहीं समझेंगे तब तक भारत के लिए इस नई चुनौती से मुकाबला करना मुश्किल होगा। उन्होंने कहा कि प्रख्यात लेखक सर आर्थर कोनन डॉयल ने अपने किरदार शरलॉक होम्स को डेटा एनलिटिक्स का बेहतरीन उपयोग करते दिखाया था। शरलॉक होम्स ने अंग्रेजी के सबसे अधिक उपयोग होने वाले अक्षर  म (ई) को डिकोड कर पूरी मिस्ट्री का खुलासा किया था। उन्होंने कहा कि प्रसिद्ध विद्वान नोम चोम्स्की ने गणित के सिद्धांतों और पाणिनि के संस्कृत सूत्रों को जोड़कर भाषा विज्ञान का विकास किया, इंटरडिसिप्लिनरी स्टडीज में यह एक महत्वपूर्ण विषय समझा जाता है। कार्यक्रम के संयोजक प्रो. बी.पी. सुनेजा ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कार्यशाला के उद्देश्यों के बारे में जानकारी दी।

कार्यशाला में सचिव तकनीकी शिक्षा वैभव गालरिया, एमएनआईटी के निदेशक प्रो. उदयकुमार आर. यरगट्टी, राजस्थान तकनीकी विश्वविद्याय के कुलपति प्रो. आर.ए. गुप्ता, एआईसीटीई के सलाहकार डॉ. राजीव कुमार, बीकानेर तकनीकी विश्वविद्यालय के प्रो. एच.डी. चारण, हुआवेई कम्पनी के सीटीओ (इंडस्ट्री सॉल्यूशन) निक गुआंग लु, तकनीकी शिक्षा निदेशक पुरुषोत्तम सांखला, राजस्थान तकनीकी विश्वविद्यालय की रजिस्ट्रार सुनीता डागा सहित कई शिक्षाविद, प्रोफेसर, शोधार्थी और तकनीकी शिक्षा से जुड़े विशेषज्ञ उपस्थित थे।