अमेरिका में मिडटर्म चुनाव के बाद ईरान पर फिर मंडराया बड़े हमले का बड़ा खतरा

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अमेरिका में मिडटर्म चुनाव के बाद ईरान पर फिर मंडराया बड़े हमले का बड़ा खतरा
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अमेरिका में आगामी मिडटर्म चुनाव के बाद ईरान पर एक बार फिर से बड़े पैमाने पर सैन्य हमले शुरू होने की आशंकाएं गहराती जा रही हैं। ताजा मीडिया रिपोर्ट्स और एसोसिएटेड प्रेस यानी एपी के खुलासे के मुताबिक, इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर लगातार इस बात का दबाव बना रहे हैं कि ईरान के खिलाफ दोबारा कठोर सैन्य कार्रवाई की जाए। इजरायली नेतृत्व चाहता है कि मंगलवार को होने वाले अमेरिकी मिडटर्म चुनाव के तुरंत बाद ईरान पर नए सिरे से हवाई हमलों का सिलसिला शुरू किया जाए। क्षेत्रीय अधिकारियों और इस संवेदनशील मामले की अंदरूनी जानकारी रखने वाले तीन महत्वपूर्ण सूत्रों के हवाले से यह बड़ा दावा किया गया है। हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अभी तक ईरान पर किसी भी तरह के नए सैन्य हमले को लेकर कोई भी अंतिम या पक्का फैसला नहीं लिया है.

विश्लेषकों और रिपोर्ट के अनुसार, हाल ही में इजरायल में हुए चुनाव में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और उनके दक्षिणपंथी सहयोगियों को संसद में बहुमत का भारी नुकसान उठाना पड़ा है। ऐसे कठिन राजनीतिक दौर में ईरान के साथ दोबारा बड़े स्तर पर सैन्य संघर्ष या युद्ध शुरू होने से नेतन्याहू को राष्ट्रीय सुरक्षा के कड़े मुद्दे पर घरेलू स्तर पर मजबूत राजनीतिक समर्थन हासिल हो सकता है। इसके अलावा, इस युद्ध जैसे हालात के जरिए उन्हें देश में एक नई आपातकालीन सरकार का गठन करने का सुनहरा मौका भी मिल सकता है और अंदरूनी सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, नेतन्याहू ने बीते सप्ताहांत अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के साथ फोन पर लंबी बातचीत की थी, जिसके दौरान उन्होंने ईरान के खिलाफ नए हमलों की जोरदार पैरवी की। केवल राष्ट्रपति ही नहीं, बल्कि उन्होंने अमेरिकी प्रशासन के अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के साथ भी इसी दिशा में गहन संपर्क साधा है और अपनी बात रखी है। हालांकि, इन तमाम कोशिशों के बावजूद अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने अब तक इस तरह की सीधी सैन्य कार्रवाई के लिए अपनी स्पष्ट सहमति नहीं दी है.

एक तरफ जहां इजरायल लगातार सैन्य कार्रवाई और हमलों के लिए अमेरिका पर भारी दबाव बना रहा है, वहीं दूसरी तरफ अमेरिका और ईरान के बीच परदे के पीछे कूटनीतिक बातचीत भी लगातार आगे बढ़ रही है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, खाड़ी देश कतर की मध्यस्थता से पिछले सप्ताह ईरानी अधिकारियों और अमेरिकी पक्षों के बीच बातचीत के कुल दो दौर संपन्न हो चुके हैं। इस कूटनीतिक बातचीत का मुख्य उद्देश्य एक ऐसा ठोस समझौता तैयार करना है, जिसके तहत ईरान रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में अपने सभी हमले और गतिविधियां बंद करे और इसके बदले में संयुक्त राज्य अमेरिका ईरानी बंदरगाहों पर लगाई गई अपनी तमाम नाकेबंदी को पूरी तरह से हटा ले और उम्मीद जताई जा रही है कि इस सप्ताह भी दोनों पक्षों के बीच बातचीत के नए दौर आयोजित किए जा सकते हैं, जिससे तनाव को कम करने का रास्ता तलाशा जा सके.

हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रविवार को मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि इजरायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू के साथ उनकी फोन पर हुई बातचीत बेहद अच्छी और सकारात्मक रही। उन्होंने पुष्टि की कि दोनों नेताओं के बीच ईरान के संवेदनशील मुद्दे पर भी विस्तार से चर्चा हुई, हालांकि उन्होंने इस बातचीत का कोई भी विस्तृत ब्योरा सार्वजनिक करने से इनकार कर दिया और वहीं दूसरी ओर, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने शनिवार को स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति ट्रंप ने अभी तक इस मामले में किसी भी प्रकार का अंतिम निर्णय नहीं लिया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि अमेरिकी प्रशासन फिलहाल कूटनीतिक समाधान और बातचीत को ही अपनी पहली प्राथमिकता मानता है, लेकिन साथ ही यह भी चेतावनी दी कि जरूरत पड़ने पर राष्ट्रपति ट्रंप के पास सैन्य कार्रवाई करने की पूरी क्षमता और मजबूत इच्छाशक्ति दोनों मौजूद हैं.

मध्य पूर्व क्षेत्र के कई प्रमुख अमेरिकी सहयोगी देश ईरान पर किसी भी नए अमेरिकी हमले के सख्त खिलाफ खड़े नजर आ रहे हैं। इन देशों को इस बात का गहरा डर सता रहा है कि इस तरह के किसी भी दुस्साहस से पूरा मध्य पूर्व क्षेत्र भीषण अस्थिरता की आग में झुलस सकता है और क्षेत्र के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, यदि ईरान पर नए हमले किए जाते हैं, तो इसके जवाब में यमन के आक्रामक हूती विद्रोही सऊदी अरब और लाल सागर से गुजरने वाले अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक जहाजों पर अपने हमलों को और अधिक तेज कर सकते हैं। इसके अलावा, इराक के भीतर सक्रिय ईरान समर्थित विभिन्न सशस्त्र गुट भी इस बड़े क्षेत्रीय संघर्ष में सीधे तौर पर कूद सकते हैं। बहरीन की राजधानी में आयोजित मनामा डायलॉग सुरक्षा सम्मेलन के दौरान संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्रपति के विशेष सलाहकार अनवर गर्गाश ने खुली चेतावनी देते हुए कहा कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच मौजूद गंभीर मतभेदों को जल्द दूर नहीं किया गया, तो आने वाले दिनों में हालात बेहद खतरनाक और नियंत्रण से बाहर हो सकते हैं। मिस्र के विदेश मंत्री बद्र अब्देलअत्ती ने भी चिंता जताते हुए कहा कि अगला कोई भी संभावित सैन्य टकराव पिछले सभी संघर्षों से कहीं अधिक खतरनाक और पूर्ण विनाशकारी साबित हो सकता है.

इन तमाम युद्धक सरगर्मियों के बीच ईरान ने भी अपनी स्थिति बिल्कुल स्पष्ट कर दी है। ईरानी पक्ष का कहना है कि वह अमेरिका के साथ किसी भी प्रकार की कूटनीतिक बातचीत करने के लिए पूरी तरह से तैयार है, लेकिन इसका यह कतई मतलब नहीं है कि वह किसी भी बाहरी सैन्य खतरे का मुंहतोड़ जवाब देने से पीछे हट जाएगा। ईरान के नए सर्वोच्च नेता मोज्तबा खामेनेई ने शीर्ष सैन्य अधिकारियों के साथ हुई एक उच्च स्तरीय बैठक में दो टूक शब्दों में निर्देश दिया कि अमेरिका या इजरायल की तरफ से यदि कोई भी छोटा या बड़ा खतरा पैदा होता है, तो उसका तत्काल और कड़ा जवाब दिया जाना चाहिए और उन्होंने संभावित जवाबी लक्ष्यों की सूची को और अधिक बढ़ाने की बात भी कही है ताकि दुश्मनों को करारा संदेश मिल सके.

ईरान का यह भी साफ तौर पर कहना है कि वह किसी भी समझौते के पक्ष में तभी उतरेगा जब अमेरिका की ओर से उस समझौते के सभी प्रावधानों को सख्ती से लागू करने की सौ फीसदी ठोस गारंटी दी जाए। ईरानी अधिकारियों का तर्क है कि अमेरिका और इजरायल का इतिहास गवाह है कि वे पहले भी परमाणु कार्यक्रम को लेकर चल रही बातचीत के दौरान धोखे से ईरान पर हमले कर चुके हैं, इसलिए इस बार बिना ठोस गारंटी के किसी भी समझौते पर भरोसा करना संभव नहीं होगा.

इस जटिल भू-राजनीतिक संकट और मध्य पूर्व में लगातार बढ़ते तनाव के बीच एशियाई महाशक्ति चीन ने भी अपनी कूटनीतिक पहल और सक्रियता तेज कर दी है। चीन के विदेश मंत्रालय की आधिकारिक प्रवक्ता माओ निंग द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, नवंबर महीने के पहले या दूसरे पखवाड़े के दौरान चीन का एक विशेष दूत ईरान, ओमान और सऊदी अरब के महत्वपूर्ण दौरों पर निकलेगा ताकि शांति के प्रयास किए जा सकें। इसके अलावा, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भी स्पष्ट शब्दों में कहा है कि फारस की खाड़ी का यह संवेदनशील क्षेत्र किसी भी सूरत में बड़ी ताकतों की आपसी प्रतिस्पर्धा और भू-राजनीतिक संघर्ष का खुला मैदान नहीं बनना चाहिए.

फिलहाल इन तमाम घटनाओं के बीच मध्य पूर्व की संपूर्ण स्थिति बेहद संवेदनशील और नाजुक बनी हुई है। एक तरफ जहां इजरायल हर हाल में अमेरिका से कड़ी सैन्य कार्रवाई की मांग कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ कतर समेत दुनिया के कई अन्य देश कूटनीतिक बातचीत के जरिए इस खतरनाक तनाव को कम करने की पुरजोर कोशिश में जुटे हुए हैं और अब दुनिया भर के तमाम देशों की निगाहें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अगले बड़े फैसले और अमेरिका तथा ईरान के बीच प्रस्तावित होने वाली आगामी बातचीत के दौर पर टिकी हुई हैं.

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