चीनी वैज्ञानिकों ने एक चौंकाने वाला दावा करते हुए कहा है कि मध्य पूर्व में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों को ईरान के हमलों में उतना नुकसान हुआ है, जितना अमेरिका स्वीकार नहीं कर रहा है। सैटेलाइट इमेजरी के गहन विश्लेषण के आधार पर तैयार की गई इस रिपोर्ट में बताया गया है कि जमीन पर हुई तबाही का मंजर अमेरिका और ईरान दोनों के आधिकारिक बयानों से काफी अलग है। वैज्ञानिकों का कहना है कि जहां वाशिंगटन ने नुकसान को बहुत कम करके बताया, वहीं ईरान ने भी अपनी सफलता को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया है।
अध्ययन और तकनीकी विश्लेषण
यह महत्वपूर्ण अध्ययन चाइनीज एकेडमी ऑफ साइंसेज (CAS) के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया है। इस शोध को 7 जुलाई को प्रतिष्ठित पीयर-रिव्यू जर्नल 'दी इनोवेशन' में प्रकाशित किया गया। रिसर्च टीम ने अपने विश्लेषण के लिए यूरोपीय संघ के Sentinel-2 सैटेलाइट का सहारा लिया, जो 10 मीटर रिजॉल्यूशन वाली तस्वीरें प्रदान करता है। इन तस्वीरों के माध्यम से वैज्ञानिकों ने 28 फरवरी से 9 अप्रैल के बीच की स्थितियों का बारीकी से अध्ययन किया। उन्होंने हमलों से पहले और हमलों के बाद की तस्वीरों की तुलना की ताकि नुकसान का सटीक अनुमान लगाया जा सके।
नुकसान का विवरण और प्रभावित क्षेत्र
एडवांस्ड रिमोट सेंसिंग और इमेज प्रोसेसिंग तकनीकों की मदद से वैज्ञानिकों ने कुल 217,900 वर्ग मीटर क्षेत्र में हुए नुकसान की पहचान की है। रिपोर्ट के अनुसार, कुवैत का अली अल सलेम एयर बेस सबसे अधिक प्रभावित हुआ, जहां 20 स्ट्राइक पॉइंट दर्ज किए गए। इसके अलावा, संयुक्त अरब अमीरात के अल धफरा एयर बेस पर भी गंभीर हमले हुए। दावा किया गया है कि यहां MQ-9 रीपर ड्रोन और U-2 जासूसी विमानों को रखने वाले हैंगर नष्ट हो गए। बहरीन में स्थित अमेरिकी नौसेना की फिफ्थ फ्लीट और यूएस नेवल फोर्सेज सेंट्रल कमांड के मुख्यालय परिसर को भी संरचनात्मक क्षति पहुंचने की बात कही गई है।
हमलों के चरण और एयर डिफेंस की विफलता
रिपोर्ट के मुताबिक, ये हमले दो मुख्य चरणों में हुए थे। ईरान के शुरुआती हमलों में एक ही दिन में लगभग 58,600 वर्ग मीटर क्षेत्र प्रभावित हुआ था। इसके बाद करीब दो सप्ताह तक कम तीव्रता वाले हमले जारी रहे और फिर 15 मार्च के आसपास हमलों की दूसरी बड़ी लहर आई, जिसमें लगभग 50,000 वर्ग मीटर अतिरिक्त क्षेत्र को नुकसान पहुंचा। वैज्ञानिकों का विश्लेषण बताता है कि इससे क्षेत्रीय एयर-डिफेंस रेजिलिएंस में टू-वेव कोलैप्स हुआ, जिसका अर्थ है कि अमेरिकी एयर डिफेंस सिस्टम इतनी जल्दी अपनी क्षमता दोबारा हासिल नहीं कर पाया कि वह दूसरी लहर को पूरी तरह रोक सके।
दावों में विरोधाभास और हमले की सीमा
चाइनीज सोसाइटी फॉर सर्वेइंग एंड मैपिंग के एक सोशल मीडिया पोस्ट के अनुसार, बड़े लक्ष्यों को हुआ नुकसान अमेरिका के न्यूनतम नुकसान के दावे से कहीं अधिक था, हालांकि यह ईरान द्वारा बताए गए विनाश के स्तर तक नहीं पहुंचा और हमलों का पैमाना बहुत विविध था, जिसमें स्थानीय नुकसान से लेकर बड़े पैमाने पर तबाही तक शामिल थी। ये हमले लगभग 78 से 644 किलोमीटर की दूरी से किए गए थे, जो यह दर्शाता है कि छोटी और लंबी दोनों दूरियों पर बड़े क्षेत्रों को निशाना बनाया गया। वैज्ञानिकों का मानना है कि अमेरिकी सैन्य ठिकानों की कमजोरी पहली बार इतने बड़े स्तर पर दुनिया के सामने आई है।
सूचना का अभाव और अध्ययन की सीमाएं
वैज्ञानिकों ने यह भी स्वीकार किया है कि उनके अध्ययन की कुछ सीमाएं हैं। 10 मीटर रिजॉल्यूशन वाली सैटेलाइट तस्वीरों के कारण बहुत छोटे स्तर के नुकसान का पता लगाना संभव नहीं था, इसलिए वास्तविक नुकसान रिपोर्ट में बताए गए आंकड़ों से भी अधिक हो सकता है। रिसर्च टीम ने यह भी आरोप लगाया कि 4 अप्रैल को अमेरिका ने कुछ व्यावसायिक सैटेलाइट कंपनियों पर शटर कंट्रोल लागू कर दिया था, जिससे युद्ध क्षेत्र की हाई-रिजॉल्यूशन तस्वीरों के वितरण पर रोक लग गई। इससे सूचना का अभाव पैदा हुआ और सटीक आकलन करना कठिन हो गया। वैज्ञानिकों का कहना है कि अमेरिका को अपनी एयर-डिफेंस मिसाइलों को फिर से भरने और खराब रडार को ठीक करने के लिए काफी समय की आवश्यकता होगी।