Ikkis vs Dhurandhar: इक्कीस ने धुरंधर के नैरेटिव को पलट दिया, धर्मेंद्र ने दिखाया दुनिया जीतने वाला दिल
Ikkis vs Dhurandhar - इक्कीस ने धुरंधर के नैरेटिव को पलट दिया, धर्मेंद्र ने दिखाया दुनिया जीतने वाला दिल
हाल ही में भारतीय सिनेमा में भारत-पाकिस्तान संबंधों पर आधारित दो महत्वपूर्ण फिल्में, 'धुरंधर' और 'इक्कीस', एक महीने के भीतर रिलीज हुईं, और दोनों ने दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया है और इन दोनों फिल्मों का मिजाज और संदेश एक-दूसरे से बिल्कुल अलग है, जो हिंदुस्तानी सिनेमा की विविधता और विरासत को दर्शाता है। जहां आदित्य धर की 'धुरंधर' विध्वंस और प्रहार की शैली में एक एक्शन-पैक्ड कहानी प्रस्तुत करती है, वहीं श्रीराम राघवन की 'इक्कीस' इतिहास के पन्नों से एक भावनात्मक और शांतिपूर्ण संदेश लेकर आती है।
धुरंधर बनाम इक्कीस: दो अलग-अलग दृष्टिकोण
'धुरंधर' का धमाका और शोर अभी भी जारी है, ऐसे में 'इक्कीस' 1971 के युद्ध के अमर पन्नों के साथ कुछ अलग मिजाज से दर्शकों को भावुक कर देती है। इन दोनों फिल्मों की तुलना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों की पृष्ठभूमि में पाकिस्तान से युद्ध, वतनपरस्ती, देशभक्ति और पाकिस्तान को हराने का जज्बा है, लेकिन उनके नैरेटिव में जमीन-आसमान का अंतर है। 'धुरंधर' एक काल्पनिक कहानी पर आधारित है जहां भारत का एक अंडरकवर एजेंट पाकिस्तान के अंदर घुसकर दुश्मनों को खत्म करता है, जबकि 'इक्कीस' 1971 के युद्ध के एक वास्तविक और कभी न भूलने वाले अध्याय पर आधारित है, जिसमें शहीद अरुण खेत्रपाल की बहादुरी की गाथा है।धर्मेंद्र का दुनिया जीतने वाला दिल
'इक्कीस' में धर्मेंद्र ने ब्रिगेडियर (रिटा और ) मदन खेत्रपाल का किरदार निभाया है, जिनके बेटे ब्रिगेडियर अरुण खेत्रपाल 1971 के युद्ध में पाकिस्तान से लड़ते हुए शहीद हो गए थे। फिल्म में धर्मेंद्र की अदाकारी और दरियादिली ने दुनिया का दिल जीतने वाला जिगरा दिखाया है। उनके किरदार में किसी के लिए नफरत नहीं है, यहां तक कि वह अपने बेटे की जान लेने वाले पाकिस्तानी आर्मी ऑफिसर को भी माफ कर देते हैं। यह एक ऐसा भावनात्मक मोड़ है जो फिल्म को 'धुरंधर' के विध्वंसकारी नैरेटिव से बिल्कुल अलग खड़ा करता है। धर्मेंद्र का यह किरदार युद्ध के विरुद्ध अमन और मोहब्बत की वकालत करता है, जो। 'इक्कीस' को एक युद्ध फिल्म होने के बावजूद शांति का संदेश देने वाली फिल्म बनाता है।ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और वीरता की गाथा
'इक्कीस' की कहानी 1971 के युद्ध के इतिहास पर आधारित है, जिसमें परमवीर चक्र से सम्मानित शहीद अरुण खेत्रपाल की बहादुरी को दर्शाया गया है और उनकी वीरता को उस पाकिस्तानी ब्रिगेडियर ने भी सलाम किया है, जिसके आगे परिस्थितिवश वह शहीद हुए थे। फिल्म में 1971 और 2001 के बीच के परिदृश्य बदलते रहते हैं, जिसमें करगिल युद्ध तक तीस साल का वक्त बीत चुका है। पर्दे पर बेटे अरुण खेत्रपाल का युद्ध और पिता मदन खेत्रपाल की पाकिस्तान यात्रा साथ-साथ दिखाई जाती है और मदन खेत्रपाल सबसे पहले पाकिस्तान के सरगोधा स्थित अपने पैतृक गांव जाते हैं और फिर बसंतर की लड़ाई वाली उस जगह पर भी, जहां उनके बेटे ने 1971 की लड़ाई में शहादत दी थी।अगस्त्य नंदा और जयदीप अहलावत का प्रभाव
फिल्म में अमिताभ बच्चन के नाती अगस्त्य नंदा ने अरुण खेत्रपाल के रोल में दर्शकों को प्रभावित किया है। उनकी युवा ऊर्जा और देशभक्ति का चित्रण सराहनीय है और वहीं, धर्मेंद्र (मदन खेत्रपाल) की पाकिस्तान यात्रा के दौरान उनके साथ 71 की लड़ाई का पाकिस्तानी आर्मी ऑफिसर जान मो. निसार होता है, जिसके किरदार में जयदीप अहलावत की अदाकारी फिल्म का एक अहम पक्ष है। निसार ही मदन खेत्रपाल को सरगोधा और बसंतर ले जाता है और एक मेहमान की तरह उनका स्वागत करता है, जबकि 71 की लड़ाई में निसार के हाथों ही बेटे अरुण खेत्रपाल शहीद हुए थे। धर्मेंद्र और जयदीप अहलावत के बीच के कई सीन यादगार। बन पड़े हैं, जो फिल्म के भावनात्मक गहराई को बढ़ाते हैं।नॉस्टेल्जिया और सांस्कृतिक जुड़ाव
जहां 'धुरंधर' में कराची के ल्यारी और मार-काट के दृश्यों के बैकग्राउंड में उषा उत्थुप के 'रंभा हो हो हो... ' और हसन जहांगीर के 'हवा हवा ऐ हवा... ' जैसे गाने सुनाई देते हैं, वहीं 'इक्कीस' में भी नॉस्टेल्जिया जगाने वाले हिंदी फिल्मों के कुछ पुराने गाने और तस्वीरों का इस्तेमाल हुआ है। 'इक्कीस' की कहानी में ल्यारी की कल्पना नहीं बल्कि सरगोधा और बसंतर का वास्तविक युद्ध है। पाकिस्तान के अंदर जाकर धर्मेंद्र जब देव आनंद की फोटो देखते हैं और वहां हिंदी फिल्मों के गाने सुनते हैं तो भावविभोर हो जाते हैं। इसी परिदृश्य में शमशाद बेगम की आवाज़ में गाना 'चांदनी आई बनके प्यार, ओ साजना... ' सुनाई देता है और राजेंद्र कृष्ण के गाने का भी जिक्र आता है, जो दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक जुड़ाव को दर्शाता है।धर्मेंद्र के अभिनय और संवाद की गहराई
पाकिस्तान यात्रा के दौरान धर्मेंद्र (मदन खेत्रपाल) उतार-चढ़ाव की सारी मनोदशाओं को जीते हैं। उनके लिए पाकिस्तान एक दुश्मन मुल्क है, बेटे का हत्यारा है, लेकिन जब। वह अपने गांव जाते हैं तब वहां की यादों में खो जाते हैं। वह मिट्टी और हवा-पानी पर कविता गुनगुनाते हैं, लोगों से प्यार से मिलते हैं, और जवानी के दिनों की मोहब्बत हुस्ना को याद करते हैं। बकायदा महफिल में मदन खेत्रपाल की खातिरदारी होती है और यहीं एक सीन में उनके पुराने दोस्त असरानी मिलते हैं, जोकि सबकुछ भूल चुके हैं। इस दौरान मदन खेत्रपाल जो कहते हैं वह बहुत ही विचारणीय है: 'जो। कुछ बॉर्डर पर दिखाई देता है, वह दोनों मुल्कों के अंदर क्यों नहीं दिखता। बॉर्डर पर हम एक-दूसरे की जान लेने पर तुले रहते हैं लेकिन देश के अंदर प्यार लुटाते हैं। ' यह संवाद उस पिता की मनोदशा को दर्शाता है, जिसके भीतर आक्रोश होने के बावजूद वह युद्ध के विरुद्ध शांति की बात करता है। वह सवाल उठाता है कि दो देशों के बीच युद्ध क्यों होते हैं, आखिर ये नरसंहार कौन करवाता है, और ऐसा कब-तक चलता रहेगा और वह दो देशों के युद्ध को गैर-जरूरी भी बताता है, और इसी बिंदू पर वह दुनिया का दिल जीतने वाला किरदार बन जाता है।अमन का संदेश और भारतीय सिनेमा की विविधता
'इक्कीस' का आखिरी सीन विशेष रूप से भावुक कर देने वाला है। मदन खेत्रपाल अपने बेटे की जान लेने वाले सामने खड़े पाकिस्तानी आर्मी ऑफिसर को माफ कर देते हैं और पूरी दुनिया को अमन का संदेश देते हैं। यह 'धुरंधर' के नैरेटिव के बिल्कुल उलट है, जहां परंपरागत दुश्मन देशों के बीच झुकने या माफ करने की बात नहीं होती। 'धुरंधर' जैसी फिल्में भारत में कश्मीर के मुद्दे और आतंकवाद को लेकर पाकिस्तान की सरकार के हथकंडों का प्रतीकात्मक प्रतिकार करती हैं, और इसी वजह से वह ब्लॉकबस्टर भी हुई। लेकिन 'इक्कीस' में मदन खेत्रपाल जैसे किरदार के माध्यम से फिल्मकार ने जो कहना चाहा, वह भी इतिहास का ही हिस्सा है। 1971 का युद्ध भारत के लिए एक गौरवशाली इतिहास है, जहां भारत ने पाकिस्तान के दो टुकड़े किए और नया बांग्लादेश बनाया। अरुण खेत्रपाल जैसे कई जवानों ने बहादुरी की मिसाल कायम की। 'इक्कीस' यह दर्शाती है कि युद्ध के बाद भी मानवीयता और शांति का संदेश कितना महत्वपूर्ण हो सकता है, और यह भारतीय सिनेमा की क्षमता को दिखाता है कि वह एक ही विषय पर कितने विविध दृष्टिकोण प्रस्तुत कर सकता है।