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सोना 15000 रुपये सस्ता: ईरान अमेरिका समझौते के बाद क्यों गिरे दाम?

सोना 15000 रुपये सस्ता: ईरान अमेरिका समझौते के बाद क्यों गिरे दाम?
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भारतीय सर्राफा बाजार में सोने की कीमतों में एक बड़ी हलचल देखने को मिली है। ईरान और अमेरिका के बीच शांति समझौता होने की खबरों के साथ ही भारत में सोने की कीमतों में 15000 रुपये की भारी गिरावट दर्ज की गई है। युद्ध के दौरान सोने की कीमतों में जो तेजी आई थी, वह अब शांति की उम्मीदों के साथ कम होती दिख रही है। इस घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर युद्ध और वैश्विक तनाव का सोने की कीमतों से क्या संबंध है और क्यों संकट के समय सोना इतना महंगा हो जाता है।

युद्ध में सोना क्यों चमकता है?

दुनिया में जब भी युद्ध या बड़े तनाव की स्थिति पैदा होती है, तो सोने की कीमतें अक्सर बढ़ जाती हैं। यह कोई संयोग नहीं है बल्कि इसके पीछे ठोस आर्थिक कारण हैं। सोना सिर्फ एक आभूषण नहीं है, बल्कि इसे दुनिया भर में भरोसे की चीज माना जाता है। जब दुनिया में अनिश्चितता और डर का माहौल बढ़ता है, तो लोग अपनी पूंजी बचाने के लिए सोने की ओर भागते हैं। निवेशक भी इसी रणनीति पर चलते हैं, जिसके कारण युद्ध और संकट के समय सोना महंगा हो जाता है। भारत सोने का एक बहुत बड़ा उपभोक्ता देश है, जहां शादी, त्योहार और निवेश के लिए बड़े पैमाने पर सोना खरीदा जाता है। चूंकि भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर सोना विदेशों से आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार की हर हलचल का सीधा असर भारत में सोने के भाव पर पड़ता है।

ईरान से भारत के सोने का कनेक्शन

भारत और ईरान के बीच सोने का कोई बहुत बड़ा सीधा व्यापारिक रिश्ता नहीं है, लेकिन असली कनेक्शन तेल, डॉलर और रुपये के रास्ते से बनता है। ईरान पश्चिम एशिया का एक अत्यंत महत्वपूर्ण देश है और यह क्षेत्र वैश्विक तेल व्यापार के लिए रीढ़ की हड्डी माना जाता है। अगर ईरान से जुड़ा तनाव बढ़ता है, तो कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आने लगता है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर कच्चा तेल आयात करता है। जब तेल महंगा होता है, तो भारत का आयात बिल बढ़ जाता है और उसे तेल खरीदने के लिए ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। इससे भारतीय रुपये पर दबाव आता है और रुपया कमजोर होने लगता है। चूंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना डॉलर में बिकता है, इसलिए रुपया कमजोर होने पर भारत में सोना महंगा हो जाता है।

डॉलर और रुपये की भूमिका

भारत में सोने की कीमत मुख्य रूप से दो कारकों पर निर्भर करती है। पहला है अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने का भाव और दूसरा है डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति। यदि वैश्विक बाजार में सोने के दाम स्थिर भी रहें, लेकिन रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हो जाए, तो भी भारत में सोना महंगा हो जाएगा क्योंकि इसे खरीदने के लिए अधिक रुपये चुकाने होंगे। युद्ध के समय निवेशक डॉलर को भी एक सुरक्षित विकल्प मानते हैं, जिससे डॉलर मजबूत होता है। ऐसी स्थिति में जब डॉलर महंगा और रुपया कमजोर होता है, तो भारत में सोने के भाव में और भी तेजी आ जाती है।

कच्चे तेल और महंगाई का असर

भारत जैसे विकासशील देश के लिए तेल की कीमतें बहुत मायने रखती हैं क्योंकि इसका सीधा असर परिवहन, उद्योग और आम आदमी की जेब पर पड़ता है। ईरान में तनाव से तेल की आपूर्ति बाधित होने का डर बढ़ता है, जिससे कच्चा तेल महंगा हो जाता है। तेल महंगा होने से भारत का व्यापार घाटा बढ़ता है और महंगाई बढ़ने की संभावना पैदा होती है और ऐसे माहौल में लोग सोने को महंगाई से बचाव का सबसे सुरक्षित साधन मानते हैं। जब लोगों को लगता है कि भविष्य में चीजें महंगी होंगी और नकद रुपये की क्रय शक्ति घटेगी, तो वे सोना खरीदना पसंद करते हैं, जिससे इसकी मांग और कीमत दोनों बढ़ जाती हैं।

ब्याज दरें और केंद्रीय बैंकों की भूमिका

सोने पर कोई नियमित ब्याज नहीं मिलता है, इसलिए जब बैंकों या बॉन्ड पर ब्याज दरें अधिक होती हैं, तो निवेशक सोने से पैसा निकालकर वहां लगाते हैं, जिससे सोना सस्ता होता है। इसके विपरीत, जब ब्याज दरें कम होती हैं या उनके घटने की उम्मीद होती है, तो सोना अधिक आकर्षक हो जाता है। अमेरिकी केंद्रीय बैंक की नीतियां भी इस पर गहरा असर डालती हैं। इसके अलावा, दुनिया भर के केंद्रीय बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार में विविधता लाने और जोखिम कम करने के लिए सोना खरीदते हैं। युद्ध या तनाव के समय कई देश डॉलर पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए बड़े पैमाने पर सोना खरीदते हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग बढ़ती है और इसका असर भारत तक पहुंचता है।

घरेलू मांग और टैक्स का प्रभाव

भारत में सोने की कीमतें केवल वैश्विक कारणों से ही तय नहीं होतीं, बल्कि घरेलू मांग भी इसमें बड़ी भूमिका निभाती है। शादी-ब्याह का सीजन, धनतेरस, अक्षय तृतीया और दिवाली जैसे मौकों पर भारत में सोने की मांग चरम पर होती है और यदि इन दिनों अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी कीमतें बढ़ रही हों, तो घरेलू बाजार में सोना और भी महंगा हो जाता है। इसके अलावा, सरकार द्वारा लगाया जाने वाला आयात शुल्क और जीएसटी भी अंतिम कीमत को प्रभावित करते हैं। अगर सरकार आयात शुल्क बढ़ाती है, तो सोना महंगा हो जाता है और शुल्क घटाने पर राहत मिलती है। ग्राहक को मिलने वाली अंतिम कीमत में अंतरराष्ट्रीय भाव, डॉलर-रुपया दर, टैक्स और मेकिंग चार्ज शामिल होते हैं।

सोना कब सस्ता हो सकता है?

सोना हमेशा महंगा नहीं रहता; कई स्थितियों में इसकी कीमतें गिर भी सकती हैं और जैसे ही युद्ध खत्म होने की उम्मीद जगती है, बाजार से डर कम हो जाता है और निवेशक फिर से शेयर बाजार जैसे जोखिम वाले विकल्पों की ओर लौटते हैं। इससे सोने की मांग कम होती है और कीमतें गिरती हैं। यदि डॉलर मजबूत हो और अमेरिका में ब्याज दरें ऊंची रहें, तो भी सोने पर दबाव बना रहता है। भारत के संदर्भ में, यदि रुपया मजबूत होता है या घरेलू मांग में कमी आती है, तो सोने की कीमतों में नरमी देखी जा सकती है। सरल शब्दों में, ईरान और अमेरिका के बीच शांति समझौते ने बाजार से अनिश्चितता को कम किया है, जिससे सोने की कीमतों में 15000 रुपये की यह बड़ी राहत मिली है।

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