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पेट्रोल-डीजल की कीमतें स्थिर रखने के लिए सरकार का नया प्लान

पेट्रोल-डीजल की कीमतें स्थिर रखने के लिए सरकार का नया प्लान
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सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियां (OMCs) पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में वृद्धि न करने के कारण हो रहे वित्तीय घाटे को कम करने के लिए एक नई रणनीति पर विचार कर रही हैं। सूत्रों के अनुसार, ये कंपनियां अब रिफाइनरीज को ईंधन के लिए 'इम्पोर्ट-पैरिटी रेट' (IPP) से कम भुगतान करने की योजना बना रही हैं। इस कदम का मुख्य उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आए उछाल के बावजूद घरेलू स्तर पर पेट्रोल और डीजल की कीमतों को स्थिर बनाए रखना है। अधिकारियों के अनुसार, यदि यह योजना लागू होती है, तो इसका सीधा असर मैंगलोर रिफाइनरी एंड पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड (MRPL) और चेन्नई पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (CPCL) जैसी स्टैंडअलोन रिफाइनिंग कंपनियों पर पड़ सकता है।

रिफाइनरी ट्रांसफर प्राइस पर रोक का प्रस्ताव

मामले की जानकारी रखने वाले सूत्रों ने बताया कि तेल विपणन कंपनियां अब रिफाइनरी ट्रांसफर प्राइस (RTP) पर रोक लगाने या उस पर एक निश्चित छूट तय करने के विकल्प को गंभीरता से देख रही हैं। आरटीपी वह आंतरिक मूल्य है, जिस पर रिफाइनरीज अपने मार्केटिंग सेगमेंट या अन्य मार्केटिंग कंपनियों को ईंधन बेचती हैं। वर्तमान में यह मूल्य अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क कीमतों के आधार पर तय होता है और प्रस्तावित योजना के तहत, रिफाइनरीज को पेट्रोल और डीजल की वास्तविक इम्पोर्ट पैरिटी कॉस्ट से कम भुगतान किया जाएगा। इससे रिफाइनरीज कच्चे तेल की बढ़ी हुई लागत का पूरा बोझ मार्केटिंग कंपनियों पर नहीं डाल पाएंगी और उन्हें इस वित्तीय प्रभाव का एक हिस्सा खुद वहन करना होगा।

स्टैंडअलोन रिफाइनरीज पर वित्तीय प्रभाव

इस नीतिगत बदलाव का सबसे अधिक प्रभाव उन रिफाइनरीज पर पड़ने की संभावना है जिनका अपना खुदरा नेटवर्क नहीं है और एमआरपीएल (MRPL), सीपीसीएल (CPCL) और एचपीसीएल-मित्तल एनर्जी लिमिटेड (HMEL) जैसी कंपनियां अपना अधिकांश उत्पादन सार्वजनिक क्षेत्र की तीन बड़ी ओएमसी—इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (IOC), भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन (HPCL) को बेचती हैं। चूंकि इन स्टैंडअलोन रिफाइनरीज की खुदरा बाजार में उपस्थिति न के बराबर है, इसलिए वे मार्केटिंग मार्जिन के जरिए अपने रिफाइनिंग घाटे की भरपाई नहीं कर पाएंगी। सूत्रों के अनुसार, इससे इन कंपनियों के ग्रॉस रिफाइनिंग मार्जिन (GRM) पर दबाव बढ़ सकता है।

एकीकृत तेल कंपनियों के लिए राहत

आईओसी (IOC), बीपीसीएल (BPCL) और एचपीसीएल (HPCL) जैसी एकीकृत तेल कंपनियां इस स्थिति को संभालने के लिए बेहतर स्थिति में मानी जा रही हैं। ये कंपनियां अपने रिफाइनिंग और मार्केटिंग ऑपरेशंस के बीच घाटे और मुनाफे का संतुलन बना सकती हैं। जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं और खुदरा कीमतें स्थिर रहती हैं, तो मार्केटिंग सेगमेंट को नुकसान होता है, लेकिन रिफाइनिंग सेगमेंट को अक्सर उच्च मार्जिन का लाभ मिलता है। आरटीपी में बदलाव के माध्यम से, ये कंपनियां अपने आंतरिक लेखांकन में घाटे को रिफाइनिंग स्तर पर स्थानांतरित कर सकती हैं, जिससे मार्केटिंग घाटे को कम दिखाया जा सके।

निजी रिफाइनरीज और आपूर्ति श्रृंखला

सूत्रों ने यह भी संकेत दिया है कि यदि आरटीपी पर यह छूट या कैप निजी रिफाइनरीज पर भी लागू की जाती है, तो रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (RIL) और नायरा एनर्जी जैसी कंपनियां भी प्रभावित हो सकती हैं। ये निजी कंपनियां अपने कुल उत्पादन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा सरकारी ओएमसी को बेचती हैं। वर्तमान में, देश के 1 लाख से अधिक पेट्रोल पंपों में से लगभग 90% का स्वामित्व और संचालन सरकारी कंपनियों के पास है। ऐसे में निजी रिफाइनरीज के लिए सरकारी ओएमसी को आपूर्ति करना अनिवार्य हो जाता है। यदि भुगतान की दरों में कटौती होती है, तो निजी क्षेत्र की इन कंपनियों के राजस्व और लाभप्रदता पर भी असर पड़ना तय है।

वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों का दबाव

पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में भारी अस्थिरता देखी गई है। कुछ समय पहले तक कच्चा तेल लगभग 70 डॉलर प्रति बैरल के आसपास था, जो तनाव बढ़ने के साथ 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गया है। भारत अपनी तेल जरूरतों का 85% से अधिक आयात करता है, इसलिए वैश्विक कीमतों में किसी भी वृद्धि का सीधा असर देश के आयात बिल पर पड़ता है। हालांकि, सरकार और ओएमसी ने पिछले काफी समय से पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में कोई बड़ी बढ़ोतरी नहीं की है, जिससे तेल कंपनियों पर अंडर-रिकवरी का बोझ बढ़ रहा है।

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