विज्ञापन

है जवानी तो इश्क होना है रिव्यू: वरुण धवन की हाई एनर्जी और डेविड धवन का कॉमेडी तड़का

है जवानी तो इश्क होना है रिव्यू: वरुण धवन की हाई एनर्जी और डेविड धवन का कॉमेडी तड़का
विज्ञापन

आज के दौर में जहां एक तरफ सिनेमा गंभीर और डार्क विषयों की ओर झुक रहा है, वहीं दर्शकों का एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जो केवल हंसने और मनोरंजन के लिए थिएटर जाता है। इस हफ्ते बॉक्स ऑफिस पर जहां कुछ ऐसी फिल्में आई हैं जो सहमति जैसे गंभीर मुद्दों पर बात करती हैं, वहीं डेविड धवन और वरुण धवन की पिता-पुत्र की जोड़ी अपनी नई फिल्म 'है जवानी तो इश्क होना है' के साथ वापस आई है और अगर आप यह उम्मीद कर रहे हैं कि यह फिल्म किसी गहरे सामाजिक विमर्श में उलझेगी, तो आप गलत हैं। इस जोड़ी का एकमात्र उद्देश्य दर्शकों को गुदगुदाना और उन्हें हंसते हुए थिएटर से बाहर भेजना है। लगभग 2 साल के अंतराल के बाद वापसी कर रही यह जोड़ी अपने पुराने और परखे हुए नो-ब्रेन एंटरटेनमेंट के फॉर्मूले के साथ लौटी है। यह एक पूरी तरह से ठेठ बॉलीवुड कहानी है, जिसे मनोरंजन की नब्ज समझने वालों ने तैयार किया है।

कहानी का प्लॉट: कन्फ्यूजन और भागदौड़

फिल्म 'है जवानी तो इश्क होना है' की कहानी जस के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसका किरदार वरुण धवन ने निभाया है। जस की जिंदगी में तब उथल-पुथल मच जाती है जब उसकी पत्नी बानी, जिसका किरदार मृणाल ठाकुर ने निभाया है, उसे तलाक देने का फैसला करती है। बानी के इस फैसले के पीछे जस की शारीरिक इच्छाएं और बच्चे पैदा करने की उसकी अत्यधिक उत्सुकता होती है, जिसे बानी संभाल नहीं पाती। फिल्म में एक दिलचस्प बात यह है कि सेक्स शब्द को मेकिंग लव से डब किया गया है, जैसे कि वह कोई वर्जित शब्द हो। बानी से अलग होने के बाद जस के जीवन में प्रीत की एंट्री होती है, जिसे पूजा हेगड़े ने निभाया है। कहानी में असली मोड़ तब आता है जब किस्मत के खेल के कारण जस की पूर्व पत्नी बानी और वर्तमान प्रेमिका प्रीत, दोनों एक साथ गर्भवती हो जाती हैं। इन दोनों बच्चों का पिता कोई और नहीं बल्कि जस ही है।

लंदन की खूबसूरत लोकेशंस पर आधारित यह फिल्म इसके बाद होने वाली भागदौड़ और कन्फ्यूजन को दिखाती है। फिल्म अपनी बिना लॉजिक वाली प्रकृति को गर्व से स्वीकार करती है। हालांकि, डेविड धवन की फिल्मों के मानकों के हिसाब से भी इसका पहला भाग काफी धीमा लगता है। शुरुआत के 1 घंटे में कहानी भटकती हुई नजर आती है और थिएटर में सन्नाटा पसरा रहता है क्योंकि फरहाद सामजी द्वारा लिखे गए शुरुआती चुटकुले और संवाद उतने प्रभावी नहीं लगते। कई बार ये कोशिशें जबरदस्ती हंसाने जैसी महसूस होती हैं, जिससे दर्शक थोड़े निराश हो सकते हैं।

दूसरा हाफ: हंसी और ठहाकों की वापसी

इंटरवल के बाद फिल्म की गति में अचानक बदलाव आता है। दूसरा हाफ शुरू होते ही फिल्म अपनी असली रफ्तार पकड़ती है और पागलपन से भरी स्थितियां दर्शकों को ठहाके लगाने पर मजबूर कर देती हैं और हालांकि इसके कुछ जोक्स एडल्ट और डबल मीनिंग वाले हैं, लेकिन वे शालीनता की सीमा के भीतर ही रहते हैं। फिल्म में एक मजेदार दृश्य तब आता है जब मौनी रॉय वरुण की नकली मां बनकर आती हैं और वरुण एक संवाद बोलते हैं कि उन्होंने निरूपा रॉय जैसी मां मांगी थी लेकिन उन्हें मौनी रॉय जैसी मां मिल गई। ऐसे वन-लाइनर्स थिएटर में जान फूंकने का काम करते हैं और दर्शकों का मनोरंजन बनाए रखते हैं।

कलाकारों का प्रदर्शन: वरुण धवन की हाई एनर्जी

अभिनय की बात करें तो वरुण धवन एक बार फिर अपनी सुपरहिट फिल्म 'मैं तेरा हीरो' वाले पुराने अंदाज में नजर आ रहे हैं। कॉमेडी के मामले में उनका कोई मुकाबला नहीं है। वह अपनी जबरदस्त ऊर्जा, बेहतरीन कॉमिक टाइमिंग और स्क्रीन प्रेजेंस से फिल्म में जान डाल देते हैं। लंदन की सड़कों पर उनका डरकर भागना, गिरना और उनके चेहरे के फनी एक्सप्रेशंस दर्शकों का भरपूर मनोरंजन करते हैं। जस के रूप में उनका प्रदर्शन इस शैली में उनकी पकड़ को दर्शाता है और वह पूरी फिल्म को अपने कंधों पर लेकर चलते हैं।

फिल्म में जस के दोस्त की भूमिका निभाने वाले मनीष पॉल को स्क्रीन पर बहुत कम समय मिला है, जो थोड़ा खटकता है। उनका किरदार उनकी पिछली फिल्मों जैसा ही लगता है, जिससे उन्हें कुछ नया करने का अवसर नहीं मिला, लेकिन वरुण के साथ उनकी केमिस्ट्री देखने लायक है। मुख्य अभिनेत्रियों मृणाल ठाकुर और पूजा हेगड़े को अच्छी तरह पता था कि इस तरह की मसाला फिल्मों में उनकी भूमिका क्या है। उन्हें स्क्रीन पर ग्लैमरस दिखना था, गानों पर डांस करना था और वरुण के पागलपन पर प्रतिक्रिया देनी थी, और दोनों ने ही अपना काम पूरी ईमानदारी और खूबसूरती से किया है।

सपोर्टिंग कास्ट में जिमी शेरगिल प्रीत के ओवरप्रोटेक्टिव भाई के रूप में नजर आते हैं, जो हर समय बंदूक ताने और गंभीर चेहरा बनाए रहते हैं, जिससे स्थितियां और भी मजेदार हो जाती हैं और इनके अलावा चंकी पांडे, राकेश बेदी और मौनी रॉय जैसे कलाकारों ने भी छोटे लेकिन मनोरंजक किरदारों के माध्यम से फिल्म के दूसरे हाफ को मजबूती प्रदान की है। इन कलाकारों की मौजूदगी फिल्म के कॉमेडी फैक्टर को और बढ़ा देती है।

निर्देशन और तकनीकी पक्ष

डेविड धवन ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वह कमर्शियल और हल्के-फुल्के पारिवारिक सिनेमा के बेताज बादशाह हैं। उन्होंने किसी नए ट्रेंड के पीछे भागने के बजाय अपने पुराने धवन फॉर्मूले पर ही भरोसा किया है। फिल्म का छायांकन और लुक काफी भव्य और रंगीन है, जो आंखों को सुकून देता है। फिल्म का एक बड़ा प्लस पॉइंट इसका बैकग्राउंड स्कोर और पुराने गानों का इस्तेमाल है और जैसे ही चुनरी चुनरी जैसा पुराना हिट गाना बजता है, थिएटर में पुरानी यादें ताजा हो जाती हैं और यह फिल्म के मूड के साथ पूरी तरह मेल खाता है।

हालांकि, तकनीकी रूप से फिल्म में कुछ कमियां भी हैं। पहला हाफ जहां सुस्त है, वहीं दूसरा हाफ मजेदार होने के बावजूद क्लाइमेक्स तक आते-आते काफी लंबा खिंच जाता है, जिससे ऐसा लगता है कि मेकर्स इसे जबरदस्ती खींच रहे हैं और इसके अलावा, फिल्म में आज के समय में भी बॉडी-शेमिंग और टॉयलेट ह्यूमर का सहारा लिया गया है, जैसे कि एक भारी-भरकम किरदार का नाम केवल मजाक उड़ाने के लिए टिनी रख दिया गया है। यह थोड़ा पुराना और आलस भरा लेखन लगता है जिससे बचा जा सकता था और फिल्म को और बेहतर बनाया जा सकता था।

निष्कर्ष

'है जवानी तो इश्क होना है' कोई ऐसी फिल्म नहीं है जो सिनेमा की दुनिया में कोई बड़ा बदलाव लाएगी या कोई गहरा संदेश देगी और यह एक ठेठ कमर्शियल मसाला फिल्म है जो केवल इस शर्त पर चलती है कि आप अपना दिमाग घर पर छोड़कर आएं। हालांकि फिल्म का पहला भाग कमजोर है और इसकी लंबाई अधिक है, लेकिन सेकंड हाफ का पागलपन, वरुण धवन का प्रदर्शन और मजेदार कन्फ्यूजन इसे डूबने से बचा लेते हैं। अगर आप इस वीकेंड बिना किसी लॉजिक के केवल हंसना चाहते हैं और डेविड धवन के सिनेमा के प्रशंसक रहे हैं, तो यह फिल्म आपको निराश नहीं करेगी और फिल्म को 3 / 5 स्टार की रेटिंग दी जाती है।

विज्ञापन