Ikkis Review: न गला काटा, न शोर मचाया… फिर भी रुला गई ‘इक्कीस’, जानें कैसी है धर्मेंद्र की आखिरी फिल्म

Ikkis Review - न गला काटा, न शोर मचाया… फिर भी रुला गई ‘इक्कीस’, जानें कैसी है धर्मेंद्र की आखिरी फिल्म
| Updated on: 01-Jan-2026 12:40 PM IST
बॉलीवुड के लीजेंडरी एक्टर धर्मेंद्र की आखिरी फिल्म ‘इक्कीस’ थिएटर में रिलीज हो चुकी है, जिसमें अमिताभ बच्चन के नातिन अगस्त्य नंदा भी मुख्य भूमिका में हैं और यह फिल्म नए साल के खास मौके पर दर्शकों के लिए एक अलग तरह का सिनेमाई अनुभव लेकर आई है। आमतौर पर जब हम कोई वॉर फिल्म देखते हैं, तो उसमें धमाके, सरहद पर चीख-पुकार और दुश्मन देश के खिलाफ तेज तर्रार डायलॉगबाजी की उम्मीद करते हैं और हमें यह भी पता होता है कि अंत में हमारा हीरो शहीद होगा, फिर भी हम दिल पर पत्थर रखकर थिएटर जाते हैं ताकि उन गुमनाम नायकों की कहानी जान सकें जिन्होंने देश के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया। ‘इक्कीस’ भी इसी वजह से देखनी चाहिए, लेकिन यह एक आम वॉर फिल्म नहीं है।

कहानी का भावनात्मक ताना-बाना

फिल्म की कहानी साल 2001 की एक सुबह से शुरू होती है, जब पाकिस्तान के ब्रिगेडियर जान मोहम्मद निसार के घर में एक खास भारतीय रिटायर्ड ब्रिगेडियर का स्वागत होना है। इन ब्रिगेडियर का नाम है मदनलाल खेत्रपाल, जिन्हें धर्मेंद्र ने निभाया है और वह अरुण खेत्रपाल (अगस्त्य नंदा) के पिता हैं, जिन्होंने महज 21 साल की उम्र में 1971 की जंग में देश के लिए अपनी जान न्योछावर कर दी थी। विभाजन के समय सरगोधा (अब पाकिस्तान) से भारत आया यह परिवार, आखिर उस मुल्क में क्यों जाना चाहता है, जिसने पहले उनसे उनका घर और बाद में उनका बेटा छीन लिया? इन तमाम सवालों के जवाब और अरुण खेत्रपाल की बहादुरी तथा उनके पिता के इस भावुक सफर को जानने के लिए आपको थिएटर जाकर ‘इक्कीस’ देखनी होगी। यह कहानी सिर्फ युद्ध की नहीं, बल्कि मानवीय रिश्तों और बलिदान की गहराई को दर्शाती है।

एक अलग तरह की युद्ध फिल्म

आज के दौर में जहां ‘बॉर्डर 2’ जैसी मेगा फिल्मों का माहौल बनाया जा रहा है और ‘धुरंधर’ जैसी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर गदर मचा रही हैं, वहां श्रीराम राघवन जैसे प्रवाह के विरुद्ध जाकर फिल्में बनाने वाले निर्देशक ने ‘इक्कीस’ को एक बेहद खास फिल्म बनाया है। यह आम ‘वॉर फिल्म’ की तरह नहीं है, बल्कि यह आपको वहां। चोट करती है जहां आप उम्मीद नहीं करते, सीधे आपके दिल पर। श्रीराम राघवन ने ‘इक्कीस’ को ‘धुरंधर’ जैसी फिल्मों के शोर से कोसों दूर रखा है। इसमें लाउड म्यूजिक की जगह भावनाओं का ठहराव देखने मिलता है। फिल्म में न किसी की गर्दन उड़ती है, न शरीर छलनी होते हैं, फिर भी। शहीद के बलिदान की वो चुभन, उसके परिवार का दर्द हमारी आंखें नम कर देता है। यह श्रीराम राघवन और मैडॉक फिल्म के विजन की जीत है कि उन्होंने आज के सो कॉल्ड ‘एक्शन और वायलेंस ट्रेंड’ के सामने अपने घुटने नहीं टेके।

लेखन और निर्देशन की बारीकियां

इक्कीस का निर्देशन करने के साथ-साथ श्रीराम राघवन ने अरिजीत बिस्वास और पूजा लाधा सुरती के साथ मिलकर इस फिल्म की स्क्रिप्ट लिखी है। ‘बदलापुर’ और ‘अंधाधुन’ जैसे मास्टरपीस देने वाले श्रीराम का अपना एक सिग्नेचर स्टाइल है। उनकी हर फिल्म एक नई दुनिया की सैर कराती है, और यह उनकी पहली वॉर बायोग्राफी है और इस फिल्म में श्रीराम ने एक जोखिम भरा रास्ता चुना है। ‘इक्कीस’ हमारे सामने अलग-अलग उम्र के लोगों का भारत-पाकिस्तान के आपसी रिश्ते को देखने का दिलचस्प नजरिया पेश करती है। उदाहरण के तौर पर, एक तरफ जहां 21 साल का, जोश और जुनून से भरा अरुण खेत्रपाल पाकिस्तान को सबक सिखाना चाहता है, वहीं बेटे की शहादत के 30 साल बाद उसी मुल्क की धरती पर खड़े उनके पिता के दिल में कोई कड़वाहट नहीं है और यह एक ऐसी गहरी सोच है जिसे अक्सर हम खोखले राष्ट्रवाद के शोर में भूल जाते हैं। तकनीकी रूप से भी यह फिल्म शानदार है। अब तक हमने फिल्मों में जमीन, हवा और समंदर में होने वाली लड़ाइयां देखी हैं, लेकिन यहां लड़ाई है आर्मी टैंक की बटालियन में, जिसे अक्सर ‘हॉर्स’ के नाम से जाना जाता है। फिल्म में श्रीराम हमें ‘पूना हॉर्स’ के जाबांजों से मिलवाते हैं, जो वॉर टैंक चलाते हैं। अरुण खेत्रपाल एक टैंक कमांडर थे और बॉलीवुड के इतिहास में यह पहली बार है, जब टैंकों की लड़ाई को इतना सजीव और रोंगटे खड़े कर देने वाला दिखाया गया है। श्रीराम हमें युद्ध के मैदान और उस तनावपूर्ण माहौल में इस कदर डुबो देते हैं कि समय का पता ही नहीं चलता।

कलाकारों का प्रभावशाली अभिनय

धर्मेंद्र इस फिल्म की रूह हैं। ‘रॉकी और रानी की प्रेम कहानी’ में जहां वह थोड़े थके हुए नजर आए थे, वहीं ‘इक्कीस’ में उनकी ऊर्जा और सहजता हैरान कर देने वाली है। स्क्रीन पर उन्हें देखकर यकीन करना मुश्किल हो जाता है कि वह अब हमारे बीच नहीं हैं। फ्लैशबैक हो या वर्तमान, हर सीन में उनके हाव-भाव और डायलॉग डिलीवरी उतनी ही असरदार है। अगस्त्य नंदा की बात करें तो वह ‘डायरेक्टर्स एक्टर’ हैं। कई सीन में उन्हें देखकर ऐसा लगता है कि मानो AI की मदद से युवा अभिषेक बच्चन को पर्दे पर उतार दिया गया हो। एक अनुशासित और ‘पॉलिश्ड’ आर्मी किड के तौर पर अगस्त्य ने बेहतरीन काम किया है। एक प्रिविलेज्ड बैकग्राउंड से आने वाले उस जिद्दी और जुनूनी। नौजवान के इस किरदार को उन्होंने पूरी ईमानदारी से जिया है। जयदीप अहलावत हमेशा की तरह शानदार हैं। असरानी चंद मिनटों के लिए स्क्रीन पर आते हैं और हमारे चेहरे पर मुस्कान छोड़कर चले जाते हैं। जसकिरण के रूप में सिमर भाटिया का काम भी अच्छा है, जो कहानी को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

क्यों देखें 'इक्कीस'?

अगर आप एक ऐसी वॉर बायोग्राफी फिल्म की तलाश में हैं, जहां सिर्फ जोर-जोर से डायलॉग बोले जा रहे हों और साथ ही हीरो दुश्मन के छक्के छुड़ा रहा हो, तो यह फिल्म आपके लिए नहीं है और अगर आपको सिर्फ ‘वॉयलेंस’, मार-धाड़ और खून-खराबा वाला एक्शन चाहिए, तो यहां आपका ‘रॉन्ग नंबर’ लग सकता है। लेकिन, अगर आप एक अच्छा और सच्चा सिनेमा देखना चाहते हैं, तो आपको यह फिल्म जरूर देखनी चाहिए। यह फिल्म देखते हुए मिता संतरा की याद आ जाती है, जिनके पति बबलू संतरा पुलवामा आतंकी हमले में शहीद हुए थे और मिता ने कहा था कि “युद्ध हर समस्या का समाधान नहीं हो सकता”, जिसके लिए उन्हें ट्रोल किया गया। उस वक्त कई लोगों के मन में सवाल उठा होगा कि आखिर एक शहीद की पत्नी ऐसा क्यों सोच रही है?

इसका जवाब आपको ‘इक्कीस’ में मिलेगा। एक रिटायर्ड ब्रिगेडियर पिता और एक पूर्व फौजी की बेटी रही मां, दो देश के बीच हुई इस जंग को और सरहद के उस पार अपने बच्चे पर बंदूक ताने खड़े दुश्मन फौजी को किस नजरिए से देखते हैं? इसका जवाब यह फिल्म आपको देती है। ‘बंदा’ के बाद अगर कोई दिल से फिल्म बनी है, तो वह ‘इक्कीस’ है। अगर हम अच्छे सिनेमा की कद्र नहीं करेंगे, तो हमें। घटिया कंटेंट की शिकायत करने का भी कोई हक नहीं है। यह फिल्म केवल एक फौजी की नहीं, बल्कि उस गरिमा की कहानी है जो एक सैनिक और उसका परिवार ताउम्र ओढ़े रहता है। यह एक ऐसा अहसास है जिसे सब को महसूस करना जरूरी है। अपने नजदीकी सिनेमाघरों में इस वीकेंड ‘इक्कीस’ जरूर देखें और इस महान शहीद की अनकही गाथा का हिस्सा बनें।

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