आयकर रिटर्न (ITR) दाखिल करने की प्रक्रिया वर्तमान में जारी है और वेतनभोगी कर्मचारियों के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि वे पुरानी टैक्स व्यवस्था (Old Tax Regime) को चुनें या नई टैक्स व्यवस्था (New Tax Regime) को अपनाएं और वर्तमान नियमों के अनुसार, नई टैक्स व्यवस्था अब डिफॉल्ट विकल्प बन चुकी है और इसमें टैक्स की दरें तुलनात्मक रूप से कम रखी गई हैं। दूसरी ओर, पुरानी टैक्स व्यवस्था में एचआरए (HRA), धारा 80C, धारा 80D और एनपीएस (NPS) जैसी कई महत्वपूर्ण टैक्स छूट और कटौतियों का लाभ मिलता है। ऐसे में 15 लाख रुपये, 20 लाख रुपये या 25 लाख रुपये सालाना कमाने वाले व्यक्तियों के लिए सही विकल्प का चुनाव उनकी कुल बचत पर गहरा प्रभाव डाल सकता है।
टैक्स रिजीम के चुनाव पर विशेषज्ञों की राय
ग्रांट थॉर्नटन भारत (Grant Thornton Bharat) के पार्टनर अखिल चंदना के अनुसार, कौन सा टैक्स रिजीम किसी व्यक्ति के लिए बेहतर साबित होगा, यह पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करता है कि वह कितनी टैक्स छूट और कटौतियों का दावा करने की स्थिति में है। वेतन की संरचना और निवेश की आदतें इस गणना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। जहां नई व्यवस्था कम स्लैब और कम दरों के साथ प्रक्रिया को सरल बनाती है, वहीं पुरानी व्यवस्था उन लोगों को लाभ देती है जो टैक्स बचाने वाले साधनों में निवेश करते हैं और जिनके पास घर के किराए जैसे विशिष्ट खर्च होते हैं।
दोनों टैक्स रिजीम की तुलना का आधार
तुलना को स्पष्ट करने के लिए, पुरानी टैक्स व्यवस्था के तहत कुछ सामान्य कटौतियों को आधार माना गया है। इनमें 50,000 रुपये का स्टैंडर्ड डिडक्शन, धारा 80C के तहत 1 लाख 50 हजार रुपये का निवेश, एनपीएस में 50,000 रुपये का अतिरिक्त निवेश, धारा 80D के तहत 25,000 रुपये का हेल्थ इंश्योरेंस प्रीमियम और 2 लाख रुपये तक की एचआरए (HRA) छूट शामिल है। इस प्रकार कुल 4 लाख 75 हजार रुपये की टैक्स छूट को आधार बनाया गया है।
इसके विपरीत, नई टैक्स व्यवस्था में केवल 75,000 रुपये का स्टैंडर्ड डिडक्शन शामिल किया गया है। इस रिजीम में धारा 80C, 80D, एचआरए और 80CCD(1B) जैसी अधिकांश कटौतियां उपलब्ध नहीं होती हैं। हालांकि, नियोक्ता की ओर से एनपीएस में किए गए योगदान पर तय सीमा तक छूट नई व्यवस्था में भी मिलती रहती है।
15, 20 और 25 लाख की सैलरी पर टैक्स का गणित
यदि किसी कर्मचारी की सालाना सैलरी 15 लाख रुपये है, तो पुरानी टैक्स व्यवस्था में उसे लगभग 1,24,800 रुपये का टैक्स देना होगा। वहीं नई टैक्स व्यवस्था में यह राशि घटकर 97,500 रुपये रह जाती है, जिससे 27,300 रुपये की बचत होती है। इससे संकेत मिलता है कि इस आय स्तर पर नई व्यवस्था अक्सर अधिक आकर्षक होती है, जब तक कि निवेश और छूट बहुत अधिक न हो।
20 लाख रुपये की सालाना आय वाले व्यक्तियों के लिए, पुरानी टैक्स व्यवस्था में टैक्स लगभग 2,80,800 रुपये बनता है। नई टैक्स व्यवस्था में यह टैक्स लायबिलिटी 1,92,400 रुपये रह जाती है, जिससे 88,400 रुपये की बड़ी बचत होती है। जैसे-जैसे आय बढ़ती है, दोनों व्यवस्थाओं के बीच का अंतर भी बढ़ता जाता है, जो कई करदाताओं के लिए नई प्रणाली को फायदेमंद बनाता है।
इसी तरह, 25 लाख रुपये की सैलरी वाले कर्मचारी को पुरानी टैक्स व्यवस्था में लगभग 4,36,800 रुपये टैक्स देना होगा। नई टैक्स व्यवस्था में यह टैक्स 3,19,800 रुपये होगा। इस स्थिति में, एक करदाता नई व्यवस्था को चुनकर लगभग 1 लाख 17 हजार रुपये का टैक्स बचा सकता है। ये आंकड़े सरल टैक्स संरचना के तहत महत्वपूर्ण बचत की संभावना को दर्शाते हैं।
पुरानी टैक्स व्यवस्था कब फायदेमंद होती है?
नई व्यवस्था में कम दरों के बावजूद, पुरानी टैक्स व्यवस्था अभी भी विशिष्ट व्यक्तियों के लिए फायदेमंद हो सकती है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि जो लोग किराए के मकान में रहते हैं और भारी एचआरए छूट लेते हैं, धारा 80C के तहत पूरे 1 लाख 50 हजार रुपये का निवेश करते हैं, एनपीएस में अतिरिक्त 50,000 रुपये जमा करते हैं, हेल्थ इंश्योरेंस प्रीमियम भरते हैं और होम लोन के ब्याज पर छूट का दावा करते हैं, उनके लिए पुरानी व्यवस्था बेहतर हो सकती है।
नांगिया एंड कंपनी एलएलपी (Nangia & Co LLP) के सीनियर पार्टनर नीरज अग्रवाल का कहना है कि 15 लाख रुपये की सालाना आय वाले व्यक्ति के लिए पुरानी टैक्स व्यवस्था तब अधिक लाभदायक हो सकती है, जब वह कुल मिलाकर लगभग 5 लाख 50 हजार रुपये या उससे अधिक की टैक्स छूट का दावा कर सके। इसलिए, ITR दाखिल करने से पहले दोनों व्यवस्थाओं के तहत टैक्स की गणना करना और अपनी वित्तीय स्थिति के आधार पर तुलना करना सबसे समझदारी भरा कदम है।