भारत और दक्षिण अमेरिकी देश चिली के बीच एक व्यापक मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को लेकर बातचीत निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार, दोनों देश एक व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौते (CEPA) को अंतिम रूप देने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। यह समझौता भारत की ऊर्जा सुरक्षा और विनिर्माण क्षेत्र के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि चिली दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल है जिनके पास आधुनिक तकनीक के लिए आवश्यक दुर्लभ खनिजों का विशाल भंडार है।
खनिजों की रणनीतिक महत्ता और चीन की चुनौती
वैश्विक अर्थव्यवस्था में वर्तमान में क्रिटिकल मिनरल्स यानी महत्वपूर्ण खनिजों को 'रणनीतिक संपत्ति' के रूप में देखा जा रहा है। लिथियम, कॉपर, कोबाल्ट और मॉलीब्डीनम जैसे खनिज इलेक्ट्रॉनिक्स, इलेक्ट्रिक वाहन (EV) और नवीकरणीय ऊर्जा प्रणालियों के उत्पादन के लिए अनिवार्य हैं। वर्तमान में इन खनिजों की वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर चीन का व्यापक नियंत्रण है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, भारत अपनी खनिज आवश्यकताओं के एक बड़े हिस्से के लिए आयात पर निर्भर है। चिली के साथ यह प्रस्तावित समझौता आपूर्ति श्रृंखला में विविधता लाने और चीन पर निर्भरता को कम करने की भारत की रणनीति का एक हिस्सा है।
चिली के विशाल खनिज भंडार का महत्व
चिली खनिज संसाधनों के मामले में विश्व स्तर पर अग्रणी स्थान रखता है। यह देश दुनिया का सबसे बड़ा तांबा (कॉपर) उत्पादक है, जो वैश्विक उत्पादन का लगभग 23% हिस्सा साझा करता है। इसके अतिरिक्त, लिथियम उत्पादन में चिली दुनिया में दूसरे स्थान पर है और वैश्विक आपूर्ति का लगभग 20% यहीं से आता है। भारत के 'नेशनल इलेक्ट्रिक मोबिलिटी मिशन' और 2030 तक नवीकरणीय ऊर्जा के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए लिथियम और कॉपर की स्थिर आपूर्ति अनिवार्य है। चिली के पास मौजूद रीनियम और मॉलीब्डीनम जैसे खनिज भी उच्च-तकनीकी विनिर्माण के लिए आवश्यक हैं।
व्यापारिक आंकड़ों में भारी उछाल
भारत और चिली के बीच व्यापारिक संबंधों में हाल के वर्षों में महत्वपूर्ण वृद्धि देखी गई है। 60 billion तक पहुंच गया है। 15 billion रहा, लेकिन कुल व्यापार संतुलन चिली के पक्ष में होने के बावजूद भारत के लिए कच्चे माल की उपलब्धता प्राथमिकता बनी हुई है। यह वृद्धि दर्शाती है कि भारतीय उद्योगों में चिली के खनिजों और कच्चे माल की मांग निरंतर बढ़ रही है।
निजी क्षेत्र और सार्वजनिक उपक्रमों की सक्रियता
इस रणनीतिक साझेदारी को धरातल पर उतारने के लिए भारत का सार्वजनिक और निजी क्षेत्र सक्रिय हो गया है और कोल इंडिया लिमिटेड के बोर्ड ने हाल ही में चिली में एक होल्डिंग कंपनी स्थापित करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है, जो वहां खनिज अन्वेषण और खनन परियोजनाओं पर ध्यान केंद्रित करेगी। निजी क्षेत्र में, अडानी समूह ने चिली की सरकारी स्वामित्व वाली कंपनी कोडेल्को (Codelco) के साथ एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं। इस समझौते के तहत चिली में तीन प्रमुख कॉपर परियोजनाओं के अन्वेषण और विकास की संभावनाओं का आकलन किया जाएगा।
व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौते का दायरा
भारत और चिली के बीच आर्थिक संबंधों की शुरुआत साल 2006 में 'प्रीफेरेंशियल ट्रेड एग्रीमेंट' (PTA) के साथ हुई थी। हालांकि, अब प्रस्तावित CEPA का दायरा उससे कहीं अधिक विस्तृत है। इस नए समझौते में न केवल वस्तुओं के व्यापार पर शुल्क कम करने का प्रावधान है, बल्कि इसमें डिजिटल सेवाओं, निवेश प्रोत्साहन और तकनीकी सहयोग को भी शामिल किया गया है। अधिकारियों के अनुसार, इस समझौते के माध्यम से दोनों देश एक ऐसा फ्रेमवर्क तैयार करना चाहते हैं जिससे भारतीय कंपनियों को चिली के खनन क्षेत्र में दीर्घकालिक निवेश करने और वहां से खनिजों के सीधे आयात में आसानी हो सके।