भारत के शेयर बाजार के सामने एक नई और गंभीर चुनौती खड़ी हो गई है जो सीधे आसमान से जुड़ी है। वास्तव में एक अत्यंत गंभीर सुपर अल नीनो भारतीय मानसून के लिए बड़ा खतरा बन गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भारत की खपत पर निर्भर 56 फीसदी जीडीपी पर सीधा असर पड़ सकता है। मानसून की शुरुआत पिछले एक दशक में सबसे कमजोर रही है और बारिश की कमी पिछले अल नीनो वाले वर्षों की तुलना में भी कहीं अधिक दर्ज की गई है। बाजार के जानकारों ने चेतावनी दी है कि भले ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें कम हो रही हों लेकिन घरेलू मांग में आने वाली कमी शेयर बाजार की सेहत बिगाड़ सकती है।
कच्चे तेल की राहत पर भारी पड़ता मौसम का जोखिम
ब्रेंट क्रूड की कीमतें अपने 2026 के उच्चतम स्तर 120 डॉलर प्रति बैरल से लगभग 40 फीसदी नीचे आ चुकी हैं। इसके बावजूद भारतीय शेयर बाजार में वह तेजी देखने को नहीं मिली जिसकी उम्मीद की जा रही थी। जैसे-जैसे वैश्विक तेल संकट का असर कम हो रहा है वैसे ही सुपर अल नीनो का खतरा बाजार की ओर बढ़ता दिख रहा है। इस स्थिति के कारण पिछले दस वर्षों में मानसून की सबसे कमजोर शुरुआत हुई है और इससे भारत की अर्थव्यवस्था का वह 56 फीसदी हिस्सा खतरे में है जो सीधे तौर पर लोगों की खपत से जुड़ा है। पिछले दो वर्षों में शेयर बाजार ने निवेशकों को कोई खास रिटर्न नहीं दिया है। जानकारों का कहना है कि अब बाजार के लिए बड़ा जोखिम कच्चे तेल की आपूर्ति नहीं बल्कि घरेलू मांग में होने वाली गिरावट है जिससे एफएमसीजी कंपनियों के शेयरों में बड़ी गिरावट आ सकती है।
मानसून के आंकड़ों में डराने वाली कमी
नुवामा इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज के प्रतीक पारेख के अनुसार 2026 में भारतीय इक्विटी बाजार एक लट्टू की तरह एक ही दायरे में घूम रहा है। उनका मानना है कि सप्लाई आसान होने से मदद तो मिलेगी लेकिन मांग धीमी होने का डर ज्यादा बड़ा है। टैक्स कटौती का असर कम होना और अल नीनो का आगमन बाजार को एक दायरे में ही सीमित रख सकता है और निफ्टी 50 ने पिछले दो सालों में लगभग शून्य रिटर्न दिया है। मौसम विभाग के आंकड़े बताते हैं कि 26 जून 2026 तक कुल बारिश लॉन्ग-टर्म एवरेज (एलटीए) से 42 फीसदी कम रही है। देश के 72 फीसदी हिस्से में बारिश की भारी कमी है। मध्य भारत में 57 फीसदी, पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में 43 फीसदी, दक्षिणी प्रायद्वीप में 30 फीसदी और उत्तर व पश्चिम भारत में 24 फीसदी की कमी दर्ज की गई है। यह कमी 2019 की 40 फीसदी और 2023 की 36 फीसदी की कमी से भी ज्यादा है जिसने 2026 के खरीफ सीजन के लिए जोखिम बढ़ा दिया है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था और मैक्रो-इकोनॉमिक संकट
भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) ने बारिश का अनुमान घटाकर लॉन्ग-पीरियड एवरेज का 90 फीसदी कर दिया है जो पिछले 11 वर्षों में सबसे कमजोर अनुमान है। खरीफ की फसल भारत के कुल अनाज उत्पादन का लगभग 50 फीसदी हिस्सा है और खेती में देश की 46 फीसदी वर्कफोर्स लगी हुई है। एम्बिट कैपिटल का कहना है कि अल नीनो वाले वर्षों में अक्सर कृषि उत्पादन में ठहराव आता है जिससे ग्रामीण आय घट जाती है। वित्त वर्ष 2025 और 2026 के अंत तक ग्रामीण अर्थव्यवस्था एक मजबूत सहारा थी लेकिन अब सुपर अल नीनो, खाद की बढ़ती कीमतों और कर्ज की लागत ने इस मजबूती को हिला दिया है। आरबीआई के सर्वे भी बताते हैं कि शहरी और ग्रामीण दोनों ग्राहकों के बीच भविष्य की उम्मीदें कमजोर हो रही हैं।
कंपनियों की रेटिंग और बाजार का भविष्य
ब्रोकरेज कंपनियां अब कंज्यूमर सेक्टर की रेटिंग घटा रही हैं। पीएल कैपिटल ने कंज्यूमर सेक्टर में अपनी हिस्सेदारी 40 बेसिस पॉइंट कम कर दी है और महिंद्रा एंड महिंद्रा (एमएंडएम) में भी 50 बेसिस पॉइंट की कटौती की है। उनका मानना है कि अल नीनो के कारण ट्रैक्टर की मांग सुस्त पड़ सकती है। डोलट कैपिटल के अमित खुराना का कहना है कि बाजार को अब नई तेजी के लिए अतिरिक्त ट्रिगर्स की जरूरत होगी जिसमें एफपीआई आउटफ्लो में कमी आना सबसे अहम है। हालांकि केयरऐज रेटिंग्स का मानना है कि भारत पहले की तुलना में बेहतर स्थिति में है क्योंकि सिंचाई कवरेज बढ़ा है और गेहूं व चावल का बफर स्टॉक मजबूत है। लेकिन शेयर बाजार के लिए तत्काल वास्तविकता यही है कि कच्चे तेल की गिरावट का फायदा अब खत्म हो चुका है और आगे का रास्ता पूरी तरह से मानसून की प्रगति पर निर्भर करेगा।