491 के स्तर पर पहुंच गया। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक साल के दौरान भारतीय रुपए में डॉलर के मुकाबले लगभग ₹10 की गिरावट आई है, जो प्रतिशत के लिहाज से 11% से अधिक की कमी को दर्शाता है। 76 के स्तर पर था, जो अब गिरकर नए रिकॉर्ड निचले स्तर पर आ गया है। इस गिरावट का सीधा असर देश की व्यापक अर्थव्यवस्था और आम नागरिकों की क्रय शक्ति पर पड़ने की संभावना है।
रुपए में गिरावट के प्रमुख वैश्विक और भू-राजनीतिक कारण
बाजार विशेषज्ञों और आधिकारिक रिपोर्टों के अनुसार, रुपए की इस कमजोरी के पीछे कई अंतरराष्ट्रीय कारक जिम्मेदार हैं और इनमें सबसे प्रमुख अमेरिका की नई टैरिफ नीतियां और भारत-अमेरिका व्यापार सौदे में हो रही देरी को माना जा रहा है। इसके अतिरिक्त, मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) में जारी भू-राजनीतिक तनाव ने वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता पैदा की है। इस तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें प्रभावित हुई हैं। चूंकि भारत अपनी तेल जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए कच्चे तेल की कीमतों में उछाल का सीधा दबाव भारतीय रुपए पर पड़ता है और चालू वर्ष में ही डॉलर के मुकाबले रुपया लगभग 4% तक कमजोर हो चुका है।
घरेलू महंगाई और जीवन यापन की लागत पर प्रभाव
करेंसी के कमजोर होने का सबसे तात्कालिक असर आयातित वस्तुओं की कीमतों पर पड़ता है। भारत ऊर्जा संसाधनों और आवश्यक औद्योगिक कच्चे माल के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है और रुपए की वैल्यू कम होने से इन वस्तुओं का आयात महंगा हो जाता है, जिसे 'इंपोर्टेड इन्फ्लेशन' कहा जाता है। ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी से परिवहन लागत बढ़ती है, जिसका सीधा असर रोजमर्रा की उपभोग की वस्तुओं और खाद्य पदार्थों के दामों पर पड़ता है। इससे परिवारों के जीवन यापन की लागत (Cost of Living) में इजाफा होने की संभावना है। विनिर्माण क्षेत्र में उपयोग होने वाले आयातित पुर्जे महंगे होने से इलेक्ट्रॉनिक सामान और ऑटोमोबाइल की कीमतों में भी वृद्धि देखी जा सकती है।
व्यापार संतुलन और चालू खाता घाटा (CAD) की स्थिति
आर्थिक आंकड़ों के अनुसार, रुपए की गिरावट से देश के व्यापार संतुलन पर दोहरा असर पड़ता है। एक ओर जहां कमजोर रुपया भारतीय निर्यात को अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धी बनाता है, वहीं दूसरी ओर आयात बिल में भारी बढ़ोतरी कर देता है। 1 billion हो गया है। 7 billion के सरप्लस में था।
विदेशी निवेशकों की निकासी और वित्तीय बाजार का परिदृश्य
रुपए की अस्थिरता ने विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) के सेंटीमेंट को भी प्रभावित किया है। आंकड़ों के मुताबिक, मौजूदा महीने में विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से ₹77,000 crore से अधिक की निकासी की है। यदि पूरे वर्ष का डेटा देखें, तो यह आंकड़ा ₹90,000 crore को पार कर गया है। जब विदेशी निवेशक अपनी हिस्सेदारी बेचकर डॉलर बाहर ले जाते हैं, तो इससे रुपए पर दबाव और बढ़ जाता है। हालांकि, आईटी सेवा, कपड़ा और रसायन जैसे निर्यात-उन्मुख क्षेत्रों को डॉलर की मजबूती से लाभ मिल सकता है, क्योंकि उन्हें विदेशी मुद्रा को रुपए में बदलने पर अधिक मूल्य प्राप्त होता है।
भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति और हस्तक्षेप
मुद्रा के मूल्य में इस तीव्र गिरावट ने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के सामने नीतिगत चुनौतियां पेश कर दी हैं। केंद्रीय बैंक को एक तरफ आर्थिक विकास को गति देनी है, वहीं दूसरी तरफ रुपए की गिरावट से उत्पन्न होने वाली महंगाई को नियंत्रित करना है। आरबीआई अक्सर विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप करता है और रुपए को सहारा देने के लिए अपने विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर की बिक्री करता है और हालांकि, इस तरह के हस्तक्षेप की एक सीमा होती है क्योंकि यह विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव डालता है। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि कच्चे तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल के स्तर पर बनी रहती हैं, तो आने वाले समय में रुपए के स्तर में और अधिक उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।