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कच्चे तेल में उछाल: डॉलर के मुकाबले रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचा

कच्चे तेल में उछाल: डॉलर के मुकाबले रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचा
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मिडिल ईस्ट में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक तेल आपूर्ति को लेकर उपजी चिंताओं के बीच भारतीय रुपया गुरुवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आए उछाल ने भारतीय मुद्रा पर भारी दबाव डाला, जिससे अंतरबैंक विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार में रुपया रिकॉर्ड गिरावट के साथ कारोबार करता दिखा। हालांकि, कारोबारी सत्र के उत्तरार्ध में तेल की कीमतों में मामूली सुधार होने से रुपये ने अपनी शुरुआती गिरावट को कुछ हद तक कम किया।

बाजार के आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक स्तर पर ऊर्जा की कीमतों में अस्थिरता और विदेशी निवेशकों द्वारा जोखिम वाली संपत्तियों से दूरी बनाने के कारण भारतीय मुद्रा की विनिमय दर प्रभावित हुई है। विशेषज्ञों के अनुसार, भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है, इसलिए कच्चे तेल की कीमतों में होने वाली किसी भी वृद्धि का सीधा असर देश के व्यापार संतुलन और मुद्रा के मूल्य पर पड़ता है।

रुपये की विनिमय दर में ऐतिहासिक गिरावट

3575 के स्तर तक गिर गया, जो इसका अब तक का सबसे निचला स्तर है। पिछले कारोबारी सत्र की तुलना में इसमें उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई। 16% की कमजोरी को दर्शाता है। मुद्रा बाजार के जानकारों के अनुसार, यदि रुपये में गिरावट का यह सिलसिला जारी रहता है, तो भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) बाजार में तरलता बनाए रखने और अत्यधिक अस्थिरता को रोकने के लिए हस्तक्षेप कर सकता है। अधिकारियों के अनुसार, केंद्रीय बैंक की नजर वैश्विक घटनाक्रमों और मुद्रा की चाल पर बनी हुई है।

कच्चे तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव

मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष और तेल उत्पादन केंद्रों पर संभावित हमलों की खबरों ने अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) की कीमतों में आग लगा दी है। 6 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को छू गई थी। 87 डॉलर प्रति बैरल के आसपास स्थिर हुईं। यूनाइटेड स्टेट्स, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता का माहौल पैदा कर दिया है। तेल आपूर्ति श्रृंखला में किसी भी संभावित व्यवधान की आशंका ने आयातकों के बीच घबराहट पैदा की है, जिससे कीमतों में तेजी बनी हुई है।

वैश्विक शेयर बाजारों और निफ्टी पर प्रभाव

भू-राजनीतिक अस्थिरता का असर केवल मुद्रा बाजार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वैश्विक शेयर बाजारों में भी भारी बिकवाली देखी गई। एशियाई बाजारों में औसतन 1% की गिरावट दर्ज की गई, जिसका सीधा असर भारतीय शेयर बाजार पर पड़ा। भारत का प्रमुख सूचकांक निफ्टी 50 (Nifty 50) भी लगभग 1% की गिरावट के साथ कारोबार करता दिखा। यूरोपीय बाजारों में भी शुरुआती कारोबार के दौरान दबाव देखा गया, जबकि अमेरिकी वायदा बाजारों ने भी कमजोर शुरुआत के संकेत दिए। निवेशकों द्वारा सुरक्षित निवेश के विकल्पों जैसे सोने और डॉलर की ओर रुख करने से इक्विटी बाजारों से पूंजी निकासी का सिलसिला तेज हुआ है।

ऊर्जा आयातक देशों की अर्थव्यवस्था पर दबाव

आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार, भारत जैसे देश जो अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर हैं, उनके लिए कच्चे तेल की ऊंची कीमतें एक बड़ी चुनौती हैं। आंकड़ों के अनुसार, मिडिल ईस्ट में संघर्ष शुरू होने के बाद से भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले 1% से अधिक टूट चुका है। एएनजेड (ANZ) बैंक के विश्लेषकों की रिपोर्ट के अनुसार, यदि कच्चे तेल की औसत कीमत 80 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती है, तो भारत के चालू खाता घाटे (CAD) को प्रबंधित करना कठिन हो सकता है। तेल की कीमतों में प्रत्येक डॉलर की वृद्धि भारत के आयात बिल को अरबों डॉलर बढ़ा देती है, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ता है।

महंगाई और आर्थिक वृद्धि की चुनौतियां

अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी रहती हैं, तो इसका सीधा असर घरेलू महंगाई पर पड़ेगा। परिवहन लागत बढ़ने से आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिससे उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित महंगाई में उछाल आ सकता है। इसके अतिरिक्त, उच्च ऊर्जा लागत औद्योगिक उत्पादन की लागत को भी बढ़ाती है, जिससे देश की समग्र आर्थिक विकास दर (GDP Growth) प्रभावित होने की आशंका रहती है। बाजार की नजर अब फरवरी महीने के महंगाई आंकड़ों और वैश्विक तेल उत्पादन से जुड़ी बैठकों पर टिकी है, जो भविष्य की आर्थिक दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

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