भारतीय नौसेना की सामरिक क्षमता में एक महत्वपूर्ण विस्तार होने जा रहा है। भारत की तीसरी स्वदेशी परमाणु शक्ति से चलने वाली बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी (SSBN), INS अरिधमन (S4), को अप्रैल-मई 2024 तक औपचारिक रूप से बेड़े में शामिल किए जाने की संभावना है। रक्षा मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, यह पनडुब्बी वर्तमान में अपने समुद्री परीक्षणों (सी ट्रायल्स) के अंतिम चरण में है। विशाखापत्तनम स्थित शिप बिल्डिंग सेंटर (SBC) में निर्मित यह पनडुब्बी भारत की परमाणु प्रतिरोधक क्षमता को नई ऊंचाइयों पर ले जाएगी।
INS अरिधमन को एडवांस्ड टेक्नोलॉजी वेसल (ATV) परियोजना के तहत विकसित किया गया है। यह पनडुब्बी पहले से ही नौसेना की सेवा में मौजूद INS अरिहंत और INS अरिघाट की तुलना में आकार और मारक क्षमता में काफी बड़ी और उन्नत है। इसके कमीशन होने के बाद, यह भारत की सामरिक बल कमान (Strategic Forces Command) के तहत संचालित होगी, जो देश के परमाणु हथियारों के प्रबंधन के लिए जिम्मेदार है।
तकनीकी विशेषताएं और मिसाइल क्षमता
INS अरिधमन की सबसे बड़ी विशेषता इसकी मिसाइल ले जाने की क्षमता है। यह पनडुब्बी दो प्रकार की स्वदेशी बैलिस्टिक मिसाइलों से लैस होगी। इसमें 750 किमी की रेंज वाली 24 K-15 सागरिका मिसाइलें तैनात की जा सकती हैं। इसके अतिरिक्त, यह 8 K-4 मिसाइलों को ले जाने में सक्षम है, जिनकी मारक क्षमता 3,500 किमी तक है। K-4 मिसाइल की यह रेंज भारत को समुद्र के भीतर से एशिया के एक बड़े हिस्से को कवर करने की क्षमता प्रदान करती है। यह पनडुब्बी अपने पूर्ववर्ती संस्करणों की तुलना में अधिक मिसाइल ट्यूबों से लैस है, जो इसे एक शक्तिशाली युद्धपोत बनाती है।
स्वदेशी निर्माण और विनिर्माण प्रक्रिया
INS अरिधमन का निर्माण भारत के सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के सहयोग का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। इस पनडुब्बी के निर्माण में निजी क्षेत्र की प्रमुख कंपनी लार्सन एंड टुब्रो (L&T) ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और विशाखापत्तनम के शिप बिल्डिंग सेंटर में इसे अत्यंत गोपनीयता के साथ तैयार किया गया है। परमाणु रिएक्टर से संचालित होने के कारण, यह पनडुब्बी महीनों तक पानी के नीचे रहने की क्षमता रखती है। इसकी संरचना को इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह दुश्मन के रडार और सोनार की पकड़ में आसानी से न आए।
सामरिक महत्व और सेकेंड स्ट्राइक क्षमता
भारत की परमाणु नीति 'नो फर्स्ट यूज' (पहले परमाणु हमला न करने) पर आधारित है। ऐसी स्थिति में 'सेकेंड स्ट्राइक' क्षमता अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है और iNS अरिधमन जैसी परमाणु पनडुब्बियां समुद्र की गहराई में छिपी रहती हैं, जिससे दुश्मन के लिए इन्हें ट्रैक करना लगभग असंभव होता है। यदि देश पर कोई परमाणु हमला होता है, तो ये पनडुब्बियां जवाबी कार्रवाई सुनिश्चित करती हैं। INS अरिधमन के शामिल होने से भारत का परमाणु त्रिकोण (Nuclear Triad) - जो जमीन, हवा और समुद्र से परमाणु हमला करने की क्षमता है - और अधिक अभेद्य हो जाएगा।
स्टेल्थ तकनीक और परिचालन दक्षता
INS अरिधमन को पिछली पनडुब्बियों की तुलना में अधिक 'स्टेल्थी' बनाया गया है। इसमें शोर कम करने वाली उन्नत तकनीक का उपयोग किया गया है, जिससे यह पानी के नीचे अत्यंत शांत तरीके से चल सकती है। इसकी गहराई में जाने की क्षमता और लंबी दूरी की मिसाइलों का संयोजन इसे हिंद महासागर क्षेत्र में भारत के हितों की रक्षा के लिए एक प्रमुख हथियार बनाता है। परमाणु रिएक्टर इसे असीमित सहनशक्ति प्रदान करता है, क्योंकि इसे डीजल पनडुब्बियों की तरह अपनी बैटरी चार्ज करने के लिए बार-बार सतह पर आने की आवश्यकता नहीं होती है।