डोनाल्ड ट्रंप के दावों की हवा निकाल रहा ईरान, होर्मुज स्ट्रेट से कच्चे तेल की सप्लाई बढ़ने का क्या है सच?

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डोनाल्ड ट्रंप के दावों की हवा निकाल रहा ईरान, होर्मुज स्ट्रेट से कच्चे तेल की सप्लाई बढ़ने का क्या है सच?
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खाड़ी के समंदर की लहरों पर कच्चे तेल की सप्लाई एक बार फिर बेहद तेज हो चुकी है और उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार खाड़ी देशों से तेल निर्यात अपने युद्ध पूर्व के स्तर को भी पार कर चुका है। इसका सीधा अर्थ यह है कि 28 फरवरी 2026 को अमेरिका के ईरान पर हमले से पहले जितना तेल इस मार्ग से गुजरता था, अब उससे भी अधिक मात्रा में तेल का निर्यात किया जा रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस पूरी स्थिति को अपनी और अमेरिकी नौसेना की एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश कर रहे हैं, लेकिन जमीनी रिपोर्टें और भू-राजनीतिक विश्लेषक एक अलग ही कहानी बयां कर रहे हैं। इन रिपोर्ट्स से यह साफ संकेत मिलते हैं कि यह सब ईरान के सुप्रीम लीडर मुज्तबा खामेनेई की मर्जी और सहमति से हो रहा है, क्योंकि ईरानी प्रशासन इस तेल सप्लाई के बदले भारी-भरकम टोल वसूल रहा है। अमेरिकी प्रशासन के भीतर इस समय तेल, होर्मुज स्ट्रेट, डीजल और ईरान जैसे शब्द सबसे ज्यादा चर्चा का केंद्र बने हुए हैं, मानो पूरा ओवल ऑफिस इन्हीं मुद्दों के इर्द-गिर्द घूम रहा हो। ट्रंप प्रशासन के लिए इस तेल संकट और इसकी कूटनीति के केंद्र में आने की मुख्य वजह आगामी मिड-टर्म चुनाव हैं, जिनमें राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की लोकप्रियता लगातार घटती जा रही है, लेकिन इस बीच तेल निर्यात बढ़ने की खबर को रिपब्लिकन्स के लिए एक बड़ी राजनीतिक संजीवनी के रूप में देखा जा रहा है।

खाड़ी से तेल निर्यात में अभूतपूर्व तेजी और अमेरिकी दावे

प्रतिष्ठित प्रकाशन वॉल स्ट्रीट जर्नल की एक रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि खाड़ी देशों से होने वाला तेल निर्यात अब युद्ध से पहले के स्तर को भी पीछे छोड़ चुका है। जितना तेल ईरान के साथ युद्ध शुरू होने से पहले खाड़ी के रास्ते दुनिया भर में भेजा जाता था, अब उससे भी अधिक मात्रा में तेल का ट्रांसफर वैश्विक बाजारों में हो रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति और उनकी पूरी कैबिनेट इस बात का श्रेय अमेरिकी नौसेना द्वारा जहाजों को प्रदान किए जा रहे कड़े संरक्षण को दे रही है। वे यह साबित करने में जुटे हैं कि होर्मुज जलडमरूमध्य में ईरान का नहीं बल्कि अमेरिकी नेवी का दबदबा है और इसी सुरक्षा कवच की वजह से खाड़ी क्षेत्र से तेल निर्यात में यह भारी इजाफा देखने को मिला है। रिपोर्ट के अनुसार, 28 फरवरी 2026 को ईरान पर अमेरिका के सैन्य हमले से पहले खाड़ी क्षेत्र से 2 करोड़ 30 लाख बैरल तेल प्रति दिन का निर्यात होता था, जो युद्ध भड़कने के कारण काफी ज्यादा नीचे गिर गया था, लेकिन 11 अक्टूबर से लेकर 18 अक्टूबर 2026 के बीच खाड़ी देशों ने 2 करोड़ 40 लाख बैरल प्रतिदिन तेल का निर्यात किया, जो कि युद्ध शुरू होने से पहले के सामान्य स्तर से भी काफी अधिक है।

क्या सचमुच अमेरिकी सुरक्षा है तेल निर्यात बढ़ने की वजह?

अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या वाकई इस बढ़े हुए तेल निर्यात की एकमात्र वजह अमेरिकी नौसेना की सुरक्षा है या फिर इसके पीछे कोई और ही भू-राजनीतिक समीकरण काम कर रहा है। यदि गहराई से विश्लेषण किया जाए तो पता चलता है कि तेल निर्यात में बढ़ोतरी के पीछे वैकल्पिक रास्तों का बहुत बड़ा योगदान है। सऊदी अरब की ईस्ट वेस्ट पाइपलाइन और संयुक्त अरब अमीरात यानी यूएई की हबशान-फुजैरा पाइपलाइनों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करके होर्मुज स्ट्रेट को पूरी तरह से बायपास किया जा रहा है। सितंबर 2026 के दौरान खाड़ी क्षेत्र से कुल जितना भी तेल निकला, उसका लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा इन्हीं वैकल्पिक तेल पाइपलाइनों के माध्यम से सीधे अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहुंचाया गया, जबकि 28 फरवरी 2026 को ईरान पर अमेरिकी हमले से पहले इन पाइपलाइनों के जरिए महज 17 प्रतिशत तेल ही सप्लाई किया जाता था। इससे यह स्पष्ट होता है कि होर्मुज जलडमरूमध्य के जोखिमों से बचने के लिए इन पाइपलाइनों के उपयोग में भारी वृद्धि दर्ज की गई है।

शिप-टू-शिप ट्रांसफर और गुप्त नौवहन की तकनीक

पाइपलाइनों के अलावा इस उद्देश्य के लिए शिप-टू-शिप ट्रांसफर यानी जहाजों के बीच तेल के आदान-प्रदान का भी बड़े पैमाने पर सहारा लिया जा रहा है। फारस की खाड़ी में मौजूद विभिन्न देश छोटे जहाजों में कच्चे तेल को लोड करते हैं और ये छोटे जहाज रात के अंधेरे में होर्मुज स्ट्रेट को पार करते हैं। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान इन जहाजों के AIS यानी ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम ट्रैकिंग सिग्नल को पूरी तरह से बंद कर दिया जाता है ताकि वे ईरानी नौसेना की पैनी नजर से बच सकें। ये छोटे तेल टैंकर होर्मुज को गुप्त रूप से पार कर फारस की खाड़ी के खुले समुद्र में पहुंचते हैं, जहां पहले से ही विशालकाय तेल टैंकर तैनात रहते हैं। इन सभी छोटे टैंकर्स का तेल विशाल वीएलसीसी (VLCC) टैंकर्स में ट्रांसफर कर दिया जाता है, जिसके बाद छोटे टैंकर वापस फारस की खाड़ी के भीतर लौट आते हैं, जबकि बड़ा विशाल जहाज तेल लेकर सीधे अरब सागर की तरफ रवाना हो जाता है। यही कारण है कि इस पूरी प्रक्रिया पर नजर रखने वाले विशेषज्ञ अमेरिकी नौसेना के दावों को पूरी तरह सच नहीं मानते हैं और इस पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। इन सवालों के पीछे एक मुख्य वजह यह भी है कि तेल निर्यात बढ़ने के बावजूद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें नीचे आने का नाम नहीं ले रही हैं, जिसका ठीकरा अमेरिकी राष्ट्रपति बार-बार रूस की जलती हुई तेल रिफाइनरियों पर फोड़ रहे हैं।

डोनाल्ड ट्रंप का बयान और रूसी रिफाइनरियों का संकट

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस विषय पर अपनी बात रखते हुए कहा कि जैसा कि आप सभी लोग जानते हैं, अब होर्मुज जलडमरूमध्य से रिकॉर्ड मात्रा में कच्चे तेल की सप्लाई हो रही है, लेकिन हमारे सामने एक अन्य गंभीर समस्या भी खड़ी है। रूस की तेल रिफाइनरियों पर लगातार भारी हमले हो रहे हैं जिसका सीधा असर खास तौर पर डीजल की कीमतों और उसकी उपलब्धता पर पड़ रहा है। इसलिए यह हमारे सामने एक बड़ी समस्या बनी हुई है। हालांकि दुनिया भर के विशेषज्ञ और कूटनीतिक जानकार अमेरिकी राष्ट्रपति के इन दावों को पूरी तरह से कटघरे में खड़ा कर रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि होर्मुज से तेल निर्यात के दावों के बावजूद बाजार में तेल के दाम कम नहीं हो रहे हैं, बल्कि असली विवाद होर्मुज पर आधिपत्य और इस प्रमुख चोक पॉइंट से गुजरने वाले जहाजों की सुरक्षा को लेकर है। लगातार यह सवाल पूछा जा रहा है कि क्या होर्मुज से बढ़े हुए तेल निर्यात का कारण वाकई अमेरिका है या फिर यह सब ईरान की मर्जी और मौन सहमति से हो रहा है।

ईरान को टोल चुकाए जाने का गंभीर दावा

उपलब्ध रिपोर्ट्स की मानें तो खाड़ी देशों से होने वाला तेल निर्यात ऊपर से भले ही बिल्कुल सामान्य नजर आ रहा हो, लेकिन इसका एक बहुत बड़ा हिस्सा जहां पाइपलाइन और शिप-टू-शिप ट्रांसफर के जरिए निकल रहा है, वहीं जो जहाज सीधे होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजर रहे हैं, वे इसके बदले में ईरान को भारी-भरकम टोल चुका रहे हैं और प्रमुख डेटा और ट्रैफिक फर्म केप्लर (Kpler) की रिपोर्ट में यह चौंकाने वाला दावा किया गया है कि सितंबर महीने के आखिरी हफ्ते में पश्चिम एशिया से कच्चे तेल का निर्यात बढ़कर फिर से युद्ध से पहले जैसे हालातों में पहुंच गया है। दरअसल, 28 फरवरी को ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू होने से पहले होर्मुज के रास्ते प्रतिदिन करीब 1 करोड़ 80 लाख बैरल तेल गुजरता था, जबकि युद्ध शुरू होने के बाद मार्च से लेकर अगस्त महीने के बीच यह गिरकर औसतन 10 लाख से 50 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया था। इसके बाद 26 सितंबर से 30 सितंबर के बीच यहां से प्रतिदिन 1 करोड़ 95 लाख से 2 करोड़ 25 लाख बैरल तेल जहाजों के जरिए गुजरा और फिर 11 अक्टूबर से 18 अक्टूबर के बीच 1 करोड़ 40 लाख बैरल तेल प्रतिदिन इस रास्ते से निकाला गया।

केप्लर फर्म की रिपोर्ट और ईरानी टोल का रहस्य

अब डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के दावों के मुताबिक इस बढ़ोतरी की मुख्य वजह जहाजों को मिल रही अमेरिकी नौसेना की सुरक्षा है, जिसमें अमेरिकी युद्धपोत और अत्याधुनिक हेलिकॉप्टर जहाजों को दिन-रात एस्कॉर्ट कर रहे हैं और यदि इस दौरान ईरान हमला करता है तो उसकी मिसाइलों को बीच में ही इंटरसेप्ट कर नष्ट किया जा रहा है, जिससे शिपिंग कंपनियों का भरोसा बढ़ा है। इसके विपरीत, डेटा फर्म केप्लर की जियोपॉलिटिकल हेड मिशेल ब्रूहार्ड का अंदेशा और आकलन कुछ और ही कहता है और उनका दृढ़ मानना है कि खाड़ी देश होर्मुज जलडमरूमध्य को पार करने के लिए ईरान को भारी शुल्क यानी टोल चुका रहे हैं। इस टोल को ईरान की पर्शियन गल्फ स्ट्रेट अथॉरिटी द्वारा वसूले जाने की बात सामने आ रही है। ऐसी प्रबल आशंका जताई जा रही है कि खाड़ी के देश ईरान को अपने कुल कार्गो का 10 प्रतिशत से लेकर 20 प्रतिशत तक शुल्क के तौर पर दे रहे हैं ताकि ईरानी प्रशासन उनके जहाजों को सुरक्षित रूप से होर्मुज पार करने दे।

होर्मुज के पूरी तरह बंद होने का ईरानी दावा

यद्यपि खाड़ी देशों द्वारा होर्मुज से तेल निर्यात के बदले ईरान को टोल दिए जाने की यह बात अभी तक एक अंदेशा बनी हुई है और इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी है, लेकिन ईरान लगातार होर्मुज जलडमरूमध्य पर अमेरिकी नियंत्रण के सभी दावों को सिरे से खारिज कर रहा है और उन्हें झूठा बता रहा है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने अपने एक बयान में स्पष्ट किया है कि हमारा रुख इस मामले में बिल्कुल साफ और सख्त है कि होर्मुज पूरी तरह से बंद है और जो कोई भी जहाज इस रास्ते से गुजरने की कोशिश करेगा, उसे कई गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ेगा। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा है कि जब तक होर्मुज की सुरक्षा और नियंत्रण को लेकर कोई ठोस समझौता नहीं हो जाता, तब तक यह जलमार्ग आम यातायात के लिए नहीं खोला जाएगा। इससे यह पूरी तरह साफ हो जाता है कि होर्मुज के रास्ते तेल निर्यात में भले ही कागजों पर कुछ बढ़ोतरी नजर आ रही हो, लेकिन ईरान के आक्रामक तेवर यह बताने के लिए काफी हैं कि उसकी अनुमति और मर्जी के बिना तेल सप्लाई का ग्राफ ऊपर जाना कतई संभव नहीं है।

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