इजराइल में कैसे बनते हैं PM? जानिए भारत से कितना अलग है वहां का चुनावी सिस्टम और क्या है वोटिंग का पूरा प्रोसेस

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इजराइल में कैसे बनते हैं PM? जानिए भारत से कितना अलग है वहां का चुनावी सिस्टम और क्या है वोटिंग का पूरा प्रोसेस
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इजराइल में चुनावी सरगर्मी बेहद तेज हो गई है। इसी महीने की 27 अक्टूबर को इजराइली जनता पार्टियों को वोट करेगी। साल 2019 के बाद यह देश का छठा आम चुनाव है। साथ ही 38 साल में यह पहला मौका है जब संसद अपना कार्यकाल पूरा करके चुनाव में जा रही है। इस चुनाव के बाद यह तय होगा कि बेंजामिन नेतन्याहू सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री बनने वाले अपने रिकॉर्ड को और आगे बढ़ाते हैं या फिर उन्हें सत्ता छोड़नी पड़ेगी। इस बार का आम चुनाव न केवल इजराइल के लिए बल्कि पूरे मिडिल ईस्ट के लिए बेहद खास है, क्योंकि गाजा में फिलिस्तीनियों के साथ हिंसा और ईरान-इजराइल युद्ध के बाद का यह पहला आम चुनाव होगा।

इजराइल का चुनाव भारत, अमेरिका और बाकी देशों के चुनाव से काफी अलग होता है। यहां लोग किसी प्रधानमंत्री उम्मीदवार को सीधे वोट नहीं करते हैं, बल्कि पार्टी को वोट देते हैं और फिर पार्टियों को सीटें बांटी जाती हैं। इजराइल में सीधे प्रधानमंत्री या सांसद के नाम पर वोट नहीं पड़ते हैं। जनता पहले पार्टियों को वोट देती है, फिर उसके बाद वोट के हिसाब से पार्टियों को सीटें बांटी जाती हैं और संसद में बहुमत जुटाने वाला नेता सरकार बनाता है। वहां संसद, जिसे नेसेट कहते हैं, उसमें कुल 120 सीटें होती हैं, जिसमें सरकार बनाने के लिए 61 सांसदों यानी सीटों की जरूरत होती है।

संसद का कार्यकाल चार साल का होता है और प्रधानमंत्री के लिए कार्यकाल की कोई सीमा नहीं है। वहीं, संसद में पहुंचने के लिए किसी पार्टी को कुल वैध वोटों का कम से कम 3 दशमलव 25 प्रतिशत चाहिए होता है। चुनाव के बाद सीटें पूरे देश में पार्टी को मिले वोट प्रतिशत के अनुपात में बंटती हैं। यानी 30 प्रतिशत वोट पाने वाली पार्टी को करीब 30 प्रतिशत सीटें मिलती हैं। इजराइल के चुनावी इतिहास में आज तक कोई भी पार्टी अकेले 61 सीटें नहीं जीत सकी है। वहां पर सबसे बड़ी पार्टी बन जाना भी सत्ता की गारंटी नहीं होता है और नतीजों के बाद दलों के पास गठबंधन बनाने के लिए 28 दिन होते हैं, जिन्हें 14 दिन तक बढ़ाया जा सकता है। इस दौरान यदि 61 सांसदों का समर्थन न जुट पाए, तो देश को फिर चुनाव में जाना पड़ता है और जब तक नया प्रधानमंत्री नहीं मिल जाता, तब तक वर्तमान प्रधानमंत्री ही सत्ता संभालता है।

बिना गठबंधन के सरकार नहीं बनती

इजराइल में गठबंधन धर्म का पालन किए बिना आज तक कोई सरकार नहीं बनी है। इसका सबसे बड़ा कारण वहां का चुनावी सिस्टम ही है। चुनाव में 3 दशमलव 25 प्रतिशत से कम वोट पाने वाली पार्टियों के वोट बेकार चले जाते हैं। इसीलिए छोटे दल हर चुनाव से पहले आपस में विलय करते हैं। इस बार भी नेतन्याहू के गठबंधन की न्यू होप पार्टी लिकुड में मिल रही है। अप्रैल 2019 से 2022 के बीच इजराइल ने पांच चुनाव देखे। एक बार नेतन्याहू और बेनी गांट्ज की सरकार एक साल के भीतर ही गिर गई। साल 2021 में नफ्ताली बेनेट और यायर लापिद ने आठ दलों का गठबंधन बनाकर नेतन्याहू का 12 साल का राज खत्म किया था, लेकिन वह सरकार भी करीब एक साल ही चल पाई। इसके बाद नवंबर 2022 में नेतन्याहू फिर से सत्ता में लौट आए।

बेडर-ऑफर लॉ कैसे काम करता है

पार्टियों को वोट मिलने के बाद किस पार्टी को संसद की कितनी सीट मिलेगी, यह बेडर-ऑफर कानून से तय होता है। यह कानून दो चरणों में काम करता है।

पहला स्टेप यह है कि थ्रेशोल्ड यानी 3 दशमलव 25 प्रतिशत वोट को पार करने वाली पार्टियों के वोट जोड़कर कुल प्रासंगिक वोट निकाला जाता है। थ्रेशोल्ड से नीचे रहने वाली पार्टियों के वोट इसमें नहीं गिने जाते हैं। उसके बाद इसे 120 से भाग देकर पता किया जाता है कि एक सीट कितने वोटों के बराबर है। हर पार्टी के वोट को इस संख्या से भाग देकर उसे उतनी पूरी सीटें दे दी जाती हैं। दशमलव के बाद का हिस्सा इस चरण में नहीं गिना जाता है।

दूसरा स्टेप दशमलव वाले हिस्से के लिए फॉलो होता है। इन्हें एक-एक करके नीलामी जैसे तरीके से बांटा जाता है। हर पार्टी अपने वोट को मौजूदा सीटें और एक जोड़कर भाग देकर अपनी बोली लगाती है। सबसे ऊंची बोली वाली पार्टी को सीट मिलती है और उसकी बोली नए सिरे से घटकर तय होती है। यह प्रक्रिया तब तक चलती है, जब तक सभी 120 सीटें आपस में बंट न जाएं।

इसे एक उदाहरण से आसानी से समझा जा सकता है। मान लीजिए, पार्टी A को 1 लाख वोट मिले और उसके पास 2 सीटें हैं, तो उसका हिसाब 1 लाख भाग 3 यानी 33,333 होगा। वहीं, पार्टी B को 80 हजार वोट मिले और उसके पास 1 सीट है, तो उसका हिसाब 80 हजार भाग 2 यानी 40,000 होगा। पार्टी C को 50 हजार वोट मिले और उसके पास 1 सीट है, तो उसका हिसाब 25,000 होगा। इस उदाहरण में पार्टी B का हिसाब सबसे ज्यादा 40,000 है, इसलिए अगली सीट उसे मिलेगी। इसके बाद पार्टी B की सीटें बढ़कर 2 हो जाएंगी और अगली सीट के लिए उसका हिसाब 80 हजार भाग 3 किया जाएगा। फिर सभी पार्टियों के हिसाब की दोबारा तुलना होगी और यह प्रक्रिया तब तक चलती है जब तक सभी सीटें नहीं बंट जातीं।

कौन वोट कर सकता है और कौन नहीं?

इजराइल में वोट देने का अधिकार यहूदी इजराइलियों और करीब 12 लाख फिलिस्तीनी मूल के इजराइली नागरिकों को है। कब्जे वाले वेस्ट बैंक और पूर्वी यरुशलम में रहने वाले 7 दशमलव 5 लाख से ज्यादा इजराइलियों में वयस्क नागरिक वोट दे सकते हैं, लेकिन गाजा, वेस्ट बैंक और पूर्वी यरुशलम के करीब 30 लाख वयस्क फिलिस्तीनी इजराइली सरकार के चुनाव में वोट नहीं देते हैं, जबकि उनकी सीमाओं, आवाजाही और कानूनी स्थिति पर इजराइल का नियंत्रण रहता है।

पूर्वी यरुशलम के ज्यादातर फिलिस्तीनियों के पास इजराइली नागरिकता के बजाय रेजिडेंसी है, इसलिए वे नेसेट यानी इजराइली संसद के चुनाव में वोट नहीं डाल सकते हैं, हालांकि वे नगर परिषद के चुनाव में मतदान कर सकते हैं। विदेश में रहने वाले इजराइलियों के लिए भी आम अनुपस्थित मतदान की व्यवस्था नहीं है। वोट डालने के लिए देश में होना जरूरी है, जबकि राजनयिकों और सरकारी प्रतिनिधियों को विदेश में इजराइली मिशनों पर मतदान करने की छूट दी जाती है।

भारत से इजराइल का सिस्टम कितना अलग है

भारत और इजराइल के चुनावी सिस्टम में सबसे बड़ा फर्क यह है कि भारत में स्थानीय उम्मीदवार पर वोट पड़ता है, जबकि इजराइल में पूरी तरह पार्टी पर चुनाव होता है। भारत के सिस्टम में थोड़े ज्यादा वोट पाने वाली पार्टी भी बड़ी जीत हासिल कर सकती है, जबकि इजराइल में सीटें वोट के अनुपात में बंटती हैं, इसलिए छोटे दलों को भी संसद में जगह मिलती है। इजराइल में गठबंधन बनाना और उसे टिकाना बेहद मुश्किल होता है और यही कारण है कि वहां बार-बार चुनाव होते रहे हैं। 27 अक्टूबर के नतीजे से ज्यादा अहम यह होगा कि उसके बाद कौन 61 का जादुई आंकड़ा जुटा पाता है। फिलहाल की स्थिति में नेतन्याहू का गुट और विपक्षी गुट, दोनों ही बहुमत से दूर दिख रहे हैं।

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