भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने शुक्रवार को आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से अपना GSLV-F18 रॉकेट सफलतापूर्वक लॉन्च किया है। यह शक्तिशाली रॉकेट अपने साथ देश के अगली पीढ़ी के नेविगेशन उपग्रह NVS-03 को लेकर अंतरिक्ष की कक्षा में रवाना हुआ है। इस महत्वपूर्ण लॉन्च के साथ, भारत के स्वदेशी नेविगेशन सिस्टम 'NavIC' को और अधिक मजबूत करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाया गया है। यह लॉन्च ऐसे समय में किया गया है जब भारत का अपना नेविगेशन सिस्टम NavIC उपग्रहों की कमी से जूझ रहा था, जिससे रणनीतिक और सामरिक मोर्चे पर बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।
GSLV कार्यक्रम की ऐतिहासिक बीसवीं उड़ान और नॉटी बॉय का सफर
शुक्रवार को हुए इस महत्वपूर्ण लॉन्च के साथ, देश के GSLV कार्यक्रम ने अपनी बीसवीं उड़ान सफलतापूर्वक पूरी कर ली है और अपने शुरुआती दौर में बार-बार तकनीकी खराबी और असफलताओं का सामना करने की वजह से इस रॉकेट को 'नॉटी बॉय' यानी शरारती लड़का कहा जाता था। लेकिन लगातार और विश्वसनीय सफलताओं के बाद, अब इस रॉकेट ने 'स्मार्ट बॉय' यानी समझदार लड़का होने का गौरव हासिल कर लिया है। इस सफल लॉन्च का मुख्य उद्देश्य भारत की उस स्वदेशी क्षमता को और अधिक बढ़ाना है, जिसके जरिए देश और उसकी सीमाओं से बाहर सटीक पोजिशनिंग, नेविगेशन और टाइमिंग सेवाएं बेहद आसानी से और सुरक्षित रूप से प्रदान की जा सकें।
भारत को अपने स्वदेशी जीपीएस या नाविक यानी NavIC सिग्नल की भारी जरूरत है, खासकर रणनीतिक और सामरिक उद्देश्यों के लिए, जिसमें 'ऑपरेशन सिंदूर' जैसे संवेदनशील सैन्य अभियान भी पूरी तरह से शामिल हैं। किसी भी आधुनिक नेविगेशन सिस्टम को लगातार चालू और सक्रिय रखने के लिए कम से कम चार सक्रिय उपग्रहों यानी सैटेलाइट्स की सख्त जरूरत होती है। हालांकि, लॉन्च से पहले NavIC के बेड़े में केवल तीन ही सक्रिय उपग्रह बचे थे। चूंकि जीपीएस की तरह स्वतंत्र रूप से और बिना किसी बाधा के काम करने वाले पोजिशन-ट्रैकिंग सिस्टम के लिए चार सक्रिय उपग्रहों का होना अनिवार्य है, इसलिए फिलहाल हमारे सशस्त्र बल NavIC का पूरी तरह से इस्तेमाल नहीं कर पा रहे थे।
सशस्त्र बलों और सामरिक अभियानों को मिलेगा अभूतपूर्व फायदा
नेविगेशन प्रणाली के पूरी तरह से सक्रिय न होने के कारण सेना को कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता था। इसमें मिसाइल नेविगेशन, सटीक लोकेशन का समय पर पता लगाना, समुद्र के भीतर या सतह पर युद्धपोतों के बीच बेहतर तालमेल बिठाना, और सैनिकों की आवाजाही या लड़ाकू विमानों के लिए स्वदेशी नेविगेशन सपोर्ट प्रदान करने जैसे बेहद अहम सामरिक काम शामिल हैं। इन सभी जरूरतों के लिए रणनीतिक बलों को मजबूरन अमेरिकी जीपीएस और रूसी ग्लोनास जैसे विदेशी नेविगेशन सिस्टम पर ही निर्भर रहना पड़ता था। विदेशी प्रणालियों पर यह निर्भरता देश की सुरक्षा के लिए एक बड़ा जोखिम पैदा करती थी।
इतिहास गवाह है कि किसी भी गंभीर संघर्ष या युद्ध के दौरान विदेशी नेविगेशन सिस्टम तक देश की पहुंच को या तो सीमित किया जा सकता है, उनकी सिग्नल गुणवत्ता को जानबूझकर घटाया जा सकता है, या फिर उन्हें पूरी तरह से बंद भी किया जा सकता है। ऐसा ही कड़वा अनुभव भारत ने साल 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान खुद महसूस किया था। लेकिन अब NVS-03 के इस सफल और ऐतिहासिक लॉन्च ने देश की इस बड़ी कमजोरी को हमेशा के लिए बदल दिया है और भारत को अंतरिक्ष तकनीक के क्षेत्र में पूरी तरह से आत्मनिर्भर बनाने का मार्ग प्रशस्त कर दिया है.
क्या है NVS-03 उपग्रह और इसकी प्रमुख खासियतें
NVS-03, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की अगली पीढ़ी की आधुनिक नेविगेशन सैटेलाइट श्रृंखला का तीसरा महत्वपूर्ण उपग्रह है। इसे 'इंडियन रीजनल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम' यानी IRNSS के तहत विकसित किया गया है, जिसे आम तौर पर NavIC के नाम से जाना जाता है। इस पूरे मिशन का मुख्य उद्देश्य अंतरिक्ष में सेवाओं की निरंतरता को हमेशा बनाए रखना है। भारत के अपने जीपीएस सिस्टम 'NavIC' यानी नेविगेशन विद इंडियन कॉन्स्टेलेशन को और अधिक आधुनिक तथा अत्याधुनिक बनाने के लिए इस उपग्रह को अंतरिक्ष में भेजा गया है और यह सैटेलाइट भारत मुख्य भूमि और उसकी सीमाओं से लगभग 1,500 किलोमीटर दूर तक के विशाल इलाके में बिल्कुल सटीक लोकेशन, नेविगेशन और सटीक समय की जानकारी देने में पूरी तरह मदद करेगा।
इसरो के इस नए उपग्रह की कई तकनीकी विशेषताएं हैं जो इसे बेहद खास बनाती हैं:
- NVS-03, दूसरी पीढ़ी की आधुनिक NVS श्रृंखला का तीसरा उपग्रह है, जिसका मुख्य उद्देश्य NavIC प्रणाली को अभूतपूर्व मजबूती देना है।
- एक बार अंतरिक्ष की कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित हो जाने के बाद, यह उपग्रह अपनी कक्षा को ऊपर उठाने की जटिल प्रक्रियाएं यानी ऑर्बिट-रेज़िंग मैन्यूवर्स को पूरा करेगा।
- यह उपग्रह 32.5 डिग्री पूर्व में अपने अंतिम निर्धारित जियोसिंक्रोनस स्लॉट तक सुरक्षित रूप से पहुंच जाएगा।
- NVS-03 सैटेलाइट में बेहद सटीक पोजिशनिंग और टाइमिंग सेवाओं को सुनिश्चित करने के लिए एक स्वदेशी एटॉमिक क्लॉक के साथ-साथ बाहरी रूप से ली गई एटॉमिक क्लॉक भी लगाई गई हैं।
- यह अत्याधुनिक सैटेलाइट मौजूदा L5 और S-बैंड नेविगेशन सिग्नलों के अलावा बिल्कुल नया L1 सिग्नल भी प्रसारित करेगा, जिससे कवरेज दायरा और अधिक व्यापक हो जाएगा।
- L1 सिग्नल के जुड़ने से आधुनिक नागरिक नेविगेशन उपकरणों जैसे कि स्मार्टफोन और पहनने योग्य तकनीक यानी वियरेबल टेक्नोलॉजी के साथ इसकी अनुकूलता बेहद शानदार हो जाएगी।
भारत का स्वदेशी नेविगेशन सिस्टम कैसे करता है काम
भारत का यह स्वदेशी नेविगेशन सिस्टम मुख्य रूप से दो अलग-अलग प्रकार की महत्वपूर्ण सेवाएं प्रदान करता है। इनमें पहली आम नागरिकों के लिए उपलब्ध 'स्टैंडर्ड सर्विस' है और दूसरी देश की सुरक्षा बलों के लिए आरक्षित 'रिस्ट्रिक्टेड सर्विस' शामिल है और स्टैंडर्ड सर्विस का इस्तेमाल देश के आम नागरिक अपने रोजमर्रा के रास्तों की तलाश करने और सटीक लोकेशन जानने के लिए करते हैं, जैसे कि हम आमतौर पर गूगल मैप्स या अन्य ऐप में देखते हैं। वहीं दूसरी सेवा पूरी तरह से सुरक्षित और अत्यधिक सीक्रेट यानी एन्क्रिप्टेड होती है, जिसका इस्तेमाल केवल देश की सेना और अधिकृत सुरक्षा एजेंसियां ही कर सकती हैं।
इस पूरे सिस्टम और सैटेलाइट की सबसे बड़ी और गौरवशाली खासियत यह है कि इसमें पूरी तरह से भारत में तैयार की गई स्वदेशी एटॉमिक क्लॉक लगाई गई है, जो नैनोसेकंड के स्तर पर बिल्कुल सटीक समय बताने का कार्य करती है। इसके अलावा इसमें नए L1 सिग्नल को भी सफलतापूर्वक जोड़ा गया है, जिसके माध्यम से देश के आम नागरिकों के स्मार्टफोन और आधुनिक गाड़ियों में नेविगेशन सेवाएं और भी अधिक सुगम और प्रभावी तरीके से काम करने लगेंगी।
क्या होता है जीपीएस सिस्टम और इसके प्रमुख उपयोग
जीपीएस यानी GPS का पूरा नाम ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम यानी Global Positioning System है। यह एक उपग्रह-आधारित अत्याधुनिक नेविगेशन प्रणाली है, जिसका मूल स्वामित्व संयुक्त राज्य अमेरिका की अंतरिक्ष सेना के पास है। इसकी अचूक मदद से दुनिया में किसी भी कोने में मौजूद किसी व्यक्ति, वाहन या वस्तु की बिल्कुल सटीक लोकेशन यानी स्थान, उसकी गति और सटीक समय का आसानी से पता लगाया जा सकता है। जीपीएस के हमारे दैनिक जीवन में अनगिनत और प्रमुख उपयोग हैं।
इसके मुख्य उपयोगों में रास्ता खोजना शामिल है, जहां कार, बाइक या पैदल चलते समय नेविगेशन के लिए गूगल मैप्स का इस्तेमाल होता है। इसके अलावा यातायात और ऑनलाइन डिलीवरी सेवाओं जैसे कि कैब बुकिंग, फूड डिलीवरी और कोरियर की लाइव ट्रैकिंग में इसका भारी इस्तेमाल किया जाता है। इसके साथ ही आपातकालीन सेवाएं जैसे एम्बुलेंस, पुलिस या प्राकृतिक आपदा के समय बचाव दलों द्वारा सबसे कम समय में सटीक जगह पर पहुंचने के लिए भी जीपीएस प्रणाली जीवनरक्षक साबित होती है।
जीपीएस तकनीक कैसे काम करती है
जीपीएस यानी ग्लोबल पोजीशनिंग सिस्टम अंतरिक्ष की असीम गहराइयों में चक्कर लगा रहे उपग्रहों यानी सैटेलाइट्स और धरती पर मौजूद आपके व्यक्तिगत डिवाइस जैसे कि स्मार्टफोन या कार के नेविगेशन रिसीवर के बीच आपसी तालमेल के जरिए काम करता है। पृथ्वी की कक्षा के चारों तरफ लगभग 24 से अधिक जीपीएस उपग्रह निरंतर चक्कर काटते रहते हैं। ये सभी उपग्रह लगातार अंतरिक्ष से रेडियो सिग्नल और अपनी बिल्कुल सटीक स्थिति तथा समय की ताजा जानकारी लगातार प्रसारित करते रहते हैं। जब कोई नागरिक अपने मोबाइल फोन में जीपीएस या गूगल मैप्स को सक्रिय करता है, तो फोन का रिसीवर इन सिग्नल्स को पकड़ता है।
प्रकाश की गति हमेशा पूरी तरह से फिक्स होती है। इसके आधार पर आपका स्मार्टफोन यह जटिल गणना करता है कि अंतरिक्ष में मौजूद उपग्रह द्वारा भेजा गया रेडियो सिग्नल आपके उपकरण तक पहुंचने में कुल कितने माइक्रूसेकंड का समय लिया है और समय और गति के इस सटीक गणितीय हिसाब से फोन यह आसानी से निकाल लेता है कि वह उस विशिष्ट उपग्रह से कितनी दूरी पर स्थित है। किसी भी स्थान की सही और बिल्कुल सटीक लोकेशन यानी अक्षांश, देशांतर और ऊंचाई का पता लगाने के लिए आपके मोबाइल फोन को अंतरिक्ष में मौजूद कम से कम 4 अलग-अलग उपग्रहों से रेडियो सिग्नल की सख्त आवश्यकता होती है।
शुरुआती तीन उपग्रह आपकी त्रिविम स्थिति यानी टू-डी लोकेशन और ऊंचाई को तय करने में मदद करते हैं, जबकि चौथा उपग्रह समय की परम सटीकता यानी क्लॉक सिंक्रोनाइज़ेशन और सही तालमेल बिठाने का काम करता है। इन उपग्रहों में बेहद उच्च कोटि की परमाणु घड़ियां यानी एटॉमिक क्लॉक लगी होती हैं, जिनकी वजह से उपयोगकर्ताओं को मीटर-दर-मीटर की अचूक और सटीक लोकेशन प्राप्त होती है, जिससे आधुनिक नेविगेशन आसान हो जाता है।