ईरान और अमेरिका के बीच शांति समझौते की खबरों के चलते भारतीय शेयर बाजार में हाल ही में तेजी का माहौल देखा गया है। पिछले तीन कारोबारी सत्रों के दौरान सेंसेक्स और निफ्टी में लगभग 4 प्रतिशत का इजाफा दर्ज किया गया है। हालांकि, दिग्गज ग्लोबल रिसर्च और ब्रोकरेज फर्म जेफरीज की एक ताजा रिपोर्ट ने इस राहत को अस्थायी बताते हुए 30 लाख करोड़ रुपये की खतरे की घंटी बजा दी है। भले ही भारतीय शेयर बाजार को घरेलू फंड्स का मजबूत सहारा मिला हुआ है, लेकिन सितंबर 2024 से विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) द्वारा की जा रही अब तक की सबसे बड़ी बिकवाली ने बाजार की स्थिरता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जेफरीज की इस सनसनीखेज रिपोर्ट ने निवेशकों और बाजार के जानकारों की चिंताएं बढ़ा दी हैं।
जेफरीज की रिपोर्ट का मुख्य विश्लेषण
जेफरीज ने मार्च 2026 तक के आंकड़ों का विश्लेषण करते हुए दुनिया के 70 सबसे बड़े इमर्जिंग मार्केट (EM) फंड्स के पोर्टफोलियो की समीक्षा की है। इन फंड्स के पास कुल मिलाकर लगभग 320 बिलियन डॉलर यानी करीब 30 लाख करोड़ रुपये की विशाल पूंजी मौजूद है। इस समीक्षा में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि कुल फंड्स में से 61 प्रतिशत विदेशी निवेशक भारत को लेकर अंडरवेट पोजीशन पर आ गए हैं। इसका अर्थ यह है कि ये फंड्स भारतीय बाजार में अपनी निर्धारित सीमा या बेंचमार्क इंडेक्स की तुलना में काफी कम निवेश कर रहे हैं। बेंचमार्क एमएससीआई इमर्जिंग मार्केट्स इंडेक्स के मुकाबले विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) की स्थिति वर्तमान में शून्य और चार प्रतिशत अंक नीचे चल रही है। यदि पिछले 10 वर्षों के औसत को देखें, तो ये ग्लोबल फंड्स भारतीय बाजार को लेकर हमेशा ओवरवेट रहते थे और 2 से 3 प्रतिशत अंक अधिक निवेश रखते थे, लेकिन अब यह भरोसा डगमगाता दिख रहा है।
विदेशी निवेशकों की बेरुखी के तीन प्रमुख कारण
जेफरीज के इक्विटी एनालिस्ट महेश नंदुरकर ने अपनी रिपोर्ट में उन कारणों का विस्तार से उल्लेख किया है जिनकी वजह से विदेशी निवेशक भारत से दूरी बना रहे हैं। पहला प्रमुख कारण महंगा वैल्यूएशन है और विदेशी निवेशकों का मानना है कि भारतीय कंपनियों की कमाई की रफ्तार के मुकाबले उनके शेयरों की कीमतें बहुत अधिक हो गई हैं। वर्तमान में एमएससीआई इंडिया इंडेक्स अपने साथी उभरते बाजारों की तुलना में 70 प्रतिशत प्रीमियम पर ट्रेड कर रहा है। दूसरा कारण एआई और टेक क्षेत्र में आया उछाल है। इस समय वैश्विक निवेशक ताइवान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों की टेक कंपनियों की ओर अधिक आकर्षित हैं, जहां टीएसएमसी, सैमसंग और एसके हाइनिक्स जैसी कंपनियां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस क्रांति से भारी मुनाफा कमा रही हैं। तीसरा बड़ा कारण भारतीय रुपये की कमजोरी है। साल 2026 की शुरुआत से अब तक डॉलर के मुकाबले रुपया 5 प्रतिशत से अधिक टूट चुका है, जबकि सितंबर 2024 से इसमें कुल 13 प्रतिशत की गिरावट आई है, जिससे विदेशी निवेशकों का डॉलर में मिलने वाला रिटर्न प्रभावित हो रहा है।
निवेशकों के लिए आगे की रणनीति
भले ही विदेशी निवेशक मुख्य सूचकांकों को लेकर सतर्क हैं, लेकिन जेफरीज का मानना है कि कुछ विशेष क्षेत्रों में निवेश के अवसर अभी भी बने हुए हैं। जेफरीज ने अपने मॉडल पोर्टफोलियो में हार्ड एसेट्स को 20 प्रतिशत का भारी वेटेज दिया है, जबकि बेंचमार्क में यह केवल 8 प्रतिशत ही है। रिपोर्ट के अनुसार, निवेशक अब पावर यूटिलिटीज, हॉस्पिटल्स, एयरपोर्ट्स और रियल एस्टेट जैसे क्षेत्रों में विकास की संभावनाएं देख रहे हैं। जेफरीज की पसंदीदा सूची में जेएसडब्ल्यू एनर्जी, अडानी पोर्ट्स, प्रीमियर एनर्जीज और लोढ़ा जैसे मजबूत स्टॉक्स शामिल हैं। निष्कर्ष के तौर पर, जेफरीज की यह 320 बिलियन डॉलर के खतरे वाली रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि जब तक भारतीय बाजार अपने महंगे वैल्यूएशन को कमाई के साथ संतुलित नहीं कर लेता, तब तक विदेशी निवेशकों की आक्रामक वापसी कठिन है। हालांकि, घरेलू खुदरा निवेशकों और म्यूचुअल फंड्स का निरंतर निवेश बाजार को बड़ी गिरावट से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।