कच्चा तेल छह महीने के उच्च स्तर से लुढ़का सऊदी अरब पर हमलों के बाद भी आई गिरावट

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कच्चा तेल छह महीने के उच्च स्तर से लुढ़का सऊदी अरब पर हमलों के बाद भी आई गिरावट
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अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। लगातार जारी तनाव और सऊदी अरब पर हो रहे हमलों के बीच भी कच्चे तेल के दाम सोमवार को अपने छह महीने के सबसे ऊंचे स्तर से नीचे आ गए हैं और ब्रेंट क्रूड 114 रुपये 50 पैसे प्रति बैरल पर आ गया है, जबकि अमेरिकी फेडरल रिजर्व के आने वाले नीतिगत फैसले से पहले वैश्विक बाजार में यह नरमी दर्ज की गई है। इस पूरी स्थिति ने निवेशकों और विश्लेषकों के बीच नए सवाल खड़े कर दिए हैं कि आखिरकार ऐसी कौन सी परिस्थितियां हैं जिनके कारण आपूर्ति संकट के बावजूद कीमतों में यह गिरावट देखी जा रही है।

सोमवार को सामने आए आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार डब्ल्यूटीआई क्रूड दो रुपये 17 पैसे टूटकर 101 रुपये 09 पैसे प्रति बैरल के स्तर पर आ गया है। प्रतिशत के हिसाब से इसमें दो रुपये 11 पैसे की गिरावट दर्ज की गई है। वहीं दूसरी तरफ ब्रेंट क्रूड भी एक रुपये 85 पैसे यानी दो रुपये 16 पैसे सस्ता होकर 114 रुपये 50 पैसे प्रति बैरल पर पहुंच गया है। सबसे बड़ा और चौंकाने वाला सवाल यही है कि जब सऊदी अरब के तेल ठिकानों और बुनियादी ढांचे को लगातार निशाना बनाया जा रहा है, तब भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में यह नरमी क्यों आई है और इसके पीछे के असली आर्थिक व रणनीतिक कारण क्या हैं।

समीक्षा के तहत यह स्पष्ट होता है कि सोमवार की यह आंशिक गिरावट वास्तव में शुक्रवार को दर्ज की गई भारी तेजी के बाद आई है और हफ्ते के आखिरी कारोबारी दिन यानी शुक्रवार को हूती विद्रोहियों के हमलों के संभावित और आसन्न खतरे के डर से तेल के दाम लगभग तीन डॉलर प्रति बैरल तक उछल गए थे। अगर साप्ताहिक प्रदर्शन पर नजर डालें तो पूरे हफ्ते के दौरान ब्रेंट क्रूड में छह प्रतिशत और डब्ल्यूटीआई क्रूड में दो रुपये 30 पैसे की जोरदार तेजी आई थी। इतनी बड़ी और तीव्र बढ़ोतरी के बाद सोमवार के सत्र में बाजार में थोड़ा ठहराव और करेक्शन आना स्वाभाविक माना जा रहा था। इसके अलावा अमेरिकी फेडरल रिजर्व के आगामी पॉलिसी फैसले से पहले वैश्विक स्तर पर निवेशक अत्यधिक सतर्कता बरत रहे हैं। इसी सावधानी और जोखिम से बचने की प्रवृत्ति के कारण ऊंचे स्तरों पर कीमतों में यह हल्की नरमी देखने को मिली है।

भले ही सोमवार को कीमतों में थोड़ी गिरावट दर्ज की गई हो, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि वैश्विक तेल बाजार में संकट अभी टला नहीं है और अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं। सऊदी अरब पर लगातार हो रहे हमलों ने दुनिया भर में तेल की निर्बाध सप्लाई और सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा कर दी हैं। सप्ताहांत यानी शनिवार और रविवार को भी सऊदी अरब में हालात काफी तनावपूर्ण और चिंताजनक बने रहे। हूती विद्रोहियों ने खुले तौर पर दावा किया कि उन्होंने शनिवार को सऊदी अरब के एक प्रमुख एयरपोर्ट के साथ-साथ महत्वपूर्ण तेल ठिकानों को भी अपने हमलों का निशाना बनाया है। इस तरह की आक्रामक गतिविधियों ने बाजार की नब्ज को थाम रखा है।

दूसरी तरफ सऊदी अरब के आधिकारिक सूत्रों ने स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि उन्होंने रविवार को कई अन्य आक्रामक मिसाइलों और ड्रोन को हवा में ही नाकाम करते हुए मार गिराया। इन हमलों से पहले भी हूती गुटों द्वारा किए गए हमलों में सऊदी के मुख्य एयरपोर्ट को काफी नुकसान पहुंचा था, जहां रविवार को कामकाज बेहद आंशिक रूप से और मुश्किल से शुरू हो पाया था और विद्रोही गुट ने अपनी धमकी को दोहराते हुए कहा है कि वे इस एयरपोर्ट को आगे भी लगातार निशाना बनाते रहेंगे। इस तरह की धमकियों और सैन्य गतिविधियों के कारण ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा पर लगातार तलवार लटकी हुई है, जिससे कीमतें किसी भी समय बड़ा उछाल ले सकती हैं.

आने वाले दिनों में कच्चे तेल के दाम किस दिशा में जाएंगे, यह इस बात पर बहुत हद तक निर्भर करेगा कि रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माने जाने वाले स्ट्रेट ऑफ होर्मुज समुद्री रास्ते के हालात कैसे रहते हैं और तेल ठिकानों की सुरक्षा किस प्रकार सुनिश्चित की जाती है। ब्रेंट क्रूड पहले ही 117 रुपये प्रति बैरल का महत्वपूर्ण स्तर पार कर चुका है। बाजार के तमाम अनुभवी जानकारों और कमोडिटी विशेषज्ञों का कहना है कि अगर तेल के बुनियादी ठिकानों पर या फिर होर्मुज के रास्ते होने वाली मालवाहक जहाजों की आवाजाही में किसी भी प्रकार की रुकावट आती है, तो दुनिया भर में कच्चे तेल के दाम तेजी से उछलकर 120 रुपये प्रति बैरल के ऊंचे स्तर को छू सकते हैं। हालांकि इसके विपरीत अगर दोनों पक्षों के बीच तनाव को कम करने की कोई ठोस राजनयिक पहल होती है, तो मुनाफावसूली हावी होने के कारण कीमतों में बड़ी गिरावट भी देखने को मिल सकती है।

रेलिगेयर ब्रोकिंग में रिसर्च के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट अजीत मिश्रा का इस पूरे घटनाक्रम पर कहना है कि वर्तमान में बाजार का कुल मिलाकर रुख तेजी का ही बना हुआ है, लेकिन यह पूरी तरह से रोजाना आने वाली भू-राजनीतिक खबरों और बयानों पर चल रहा है। उन्होंने निवेशकों और ट्रेडर्स को सलाह दी है कि उन्हें अचानक पैदा होने वाली किसी भी तेजी के पीछे आँख मूंदकर भागने से बचना चाहिए। इसकी बजाय उन्हें देशों के बीच चल रहे कूटनीतिक और सैन्य तनाव, अमेरिकी फेडरल रिजर्व के नीतिगत संकेतों और हर हफ्ते आने वाले कच्चे तेल के स्टॉक के आधिकारिक आंकड़ों पर पैनी नजर रखनी चाहिए और मिश्रा के मुताबिक अमेरिका और ईरान के बीच लगातार बढ़ता हुआ तनाव, किसी भी फौजी कार्रवाई का आसन्न डर, सऊदी अरब पर जारी हमले और प्रमुख समुद्री रास्तों पर मंडराते खतरे ही वे मुख्य कारक हैं जो कीमतों को ऊंचे स्तर पर बनाए हुए हैं।

मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज में कमोडिटीज रिसर्च के प्रमुख नवनीत दमानी ने इस विषय पर विस्तार से बताते हुए कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य और सऊदी अरब के आसपास लगातार बढ़ते हमलों ने तेल के बुनियादी ठिकानों और अंतरराष्ट्रीय निर्यात की सुरक्षा पर एक बार फिर से गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इसी लगातार बने हुए डर के माहौल ने कीमतों को ऊपर की ओर समर्थन दिया है और बाजार में चल रही रिपोर्ट्स के अनुसार अमेरिका और इजरायल ने आगामी तीन नवंबर को होने वाले अमेरिकी मध्यावधि चुनावों के बाद ईरान के प्रमुख ऊर्जा ठिकानों पर सुनियोजित हमला करने की तैयारी और योजना बनाई है। इस संभावित योजना में नतांज के पास स्थित संवेदनशील परमाणु ठिकाने भी शामिल बताए जा रहे हैं। इन खबरों के जवाब में ईरान ने भी बहुत साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि वाशिंगटन या तेल अवीव की तरफ से किसी भी प्रकार का सैन्य हमला किया जाता है, तो इसके बेहद गंभीर और बुरे नतीजे भुगतने होंगे। ईरान के इस कड़े बयान के बाद वैश्विक बाजार में डर और अनिश्चितता का माहौल और अधिक गहरा गया है।

वैश्विक स्तर पर तेल की आपूर्ति को बढ़ाने और डर के माहौल को कम करने के लिए जितनी भी कोशिशें अब तक की गई हैं, वे सभी कीमतों को नीचे लाने में पूरी तरह से नाकाम साबित हुई हैं। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी यानी आईईए ने अपने आपातकालीन इमरजेंसी स्टॉक से और अधिक मात्रा में तेल बाजार में निकालने की बात कही है। इसके अलावा जी सात देशों ने भी कुल 100 मिलियन बैरल अतिरिक्त तेल बाजार में छोड़ने की घोषणा की है, लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम असल में उनके पहले से ही चल रहे कार्यक्रमों और योजनाओं को केवल थोड़ा तेज करने जैसा ही है। यहां तक कि अमेरिका के लिए रवाना हुआ रूसी डीजल का पहला जहाज भी कीमतों की इस तीव्र तेजी को थामने में सफल नहीं हो पाया है। इन सभी असफल प्रयासों ने बाजार के निवेशकों का भरोसा कागजी घोषणाओं से डिगा दिया है।

मौजूदा समय में बाजार के तमाम बड़े खिलाड़ी केवल कागजी और प्रतीकात्मक घोषणाओं पर भरोसा करने के बिल्कुल भी मूड में नहीं हैं। वे ज़मीनी स्तर पर यह देखना चाहते हैं कि क्या वास्तव में इन प्रशासनिक कदमों से बाजार में तेल की भौतिक आपूर्ति बढ़ती है या नहीं। होर्मुज के रास्ते कच्चे तेल की आवाजाही में भले ही तकनीकी रूप से थोड़ा बहुत सुधार दिखाई दिया हो, लेकिन जहाजों का आसमान छूता हुआ बढ़ा हुआ किराया, शिपिंग की लॉजिस्टिक दिक्कतें और लगातार बने हुए सुरक्षा खतरे निर्यात पर निवेशकों के भरोसे को कम कर रहे हैं। जब तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वास्तविक रूप से सप्लाई पूरी तरह सामान्य नहीं हो जाती, तब तक कच्चे तेल के महंगे बने रहने का ही अनुमान लगाया जा रहा है और किसी बड़ी राहत की उम्मीद फिलहाल कम ही नजर आ रही है।

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