भगवान श्री कृष्ण के भक्तों के लिए भाद्रपद मास की अष्टमी तिथि सबसे बड़ा और पावन अवसर लेकर आती है और आज देशभर में जन्माष्टमी का पावन पर्व बहुत ही धूमधाम और श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है। इस पावन अवसर पर भक्त पूरे दिन व्रत रखकर अपने आराध्य के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे हैं। जन्माष्टमी पर सही मुहूर्त पर और पूरी विधि-विधान से पूजा करना बहुत जरूरी माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सही समय पर नियम से की गई पूजा परिवार में सुख, शांति और समृद्धि लाती है और इसलिए हर भक्त को जन्माष्टमी की सही पूजा समय और पूरी विधि का पूरा ध्यान रखना चाहिए ताकि उनकी भक्ति सफल हो सके।
जन्माष्टमी पूजा का शुभ मुहूर्त
जन्माष्टमी पर भगवान श्री कृष्ण के पूजन के लिए मध्यरात्रि का समय सबसे पावन और उत्तम माना जाता है। वर्ष 2026 में 4 सितंबर को जन्माष्टमी की मुख्य पूजा का मुहूर्त रात्रि 11:57 से शुरू होकर रात्रि 12:43 (5 सितंबर) तक रहेगा। इस प्रकार पूजा के लिए कुल समय लगभग 46 मिनट का प्राप्त होगा। इसी विशेष अवधि में बाल-कृष्ण का जन्मोत्सव मनाना और पूजन का काम पूरा करना सबसे फलदायी होता है। इस शुभ समय में की गई भक्ति से भगवान प्रसन्न होते हैं और भक्तों की मनोकामना पूरी करते हैं और भक्तों को पूजा की सारी तैयारी पहले से ही कर लेनी चाहिए ताकि मुहूर्त के समय बिना किसी विघ्न के नियमपूर्वक पूजा संपन्न हो सके। सही मुहूर्त में पूजन करने से घर में खुशहाली आती है।
तैयारी, अभिषेक और श्रृंगार की सही विधि
जन्माष्टमी की पूजा शुरू करने के लिए सबसे पहले स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें। इसके बाद पूजा स्थान पर लकड़ी की चौकी रखकर उस पर पीला या लाल कपड़ा बिछाएं। रात को 12 बजे लड्डू गोपाल को तांबे या पीतल की थाली में रखकर पंचामृत और फिर गंगाजल से स्नान कराएं। अभिषेक के बाद प्रभु को पोंछकर नए और सुंदर वस्त्र पहनाएं। फिर उन्हें चंदन का सुंदर तिलक लगाएं और मुकुट, बांसुरी व मोरपंख सजाकर उनका पूरा श्रृंगार करें। सही क्रम से किया गया यह श्रृंगार भगवान के प्रति सच्ची भक्ति को दिखाता है। इस तरह पूरे नियम और पवित्रता के साथ प्रभु को सजाने से मन को असीम शांति मिलती है और पूजा का काम बहुत ही पावन बनता है।
झूला, भोग, आरती और शंखनाद का नियम
श्रृंगार के बाद लड्डू गोपाल को सुंदर झूले में बिठाकर बहुत ही भाव के साथ झूला झुलाएं। इसके बाद भगवान को तुलसी दल के साथ माखन और मिश्री का विशेष भोग लगाएं। भोग लगाने के बाद धूप-दीप से भगवान की आरती गाएं और शंख बजाकर उनके आगमन का खुशियों के साथ स्वागत करें। पूजा का काम पूरा होने पर सभी लोगों में चरणामृत और प्रसाद बांटें। इस प्रकार पूरे नियम और विधि के साथ जन्माष्टमी का पूजन संपन्न होता है। सही विधि से की गई यह पूजा घर के वातावरण को पवित्र बनाती है और परिवार पर प्रभु का आशीर्वाद बनाए रखती है। इस तरह से मनाया गया जन्मोत्सव जीवन में हमेशा सुख और शांति लाता है।