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नेतन्याहू युद्ध क्यों चाहते हैं और अमेरिका क्यों है बेबस: ईरान-इजराइल संघर्ष पर 5 बड़े सवाल

नेतन्याहू युद्ध क्यों चाहते हैं और अमेरिका क्यों है बेबस: ईरान-इजराइल संघर्ष पर 5 बड़े सवाल
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सीजफायर की कोशिशों के बीच ईरान और इजराइल द्वारा एक-दूसरे पर किए गए मिसाइल हमलों ने मिडिल ईस्ट में युद्ध के बादलों को और गहरा कर दिया है। इन हमलों ने न केवल शांति प्रयासों को झटका दिया है, बल्कि पूरे क्षेत्र के भविष्य पर भी सवालिया निशान लगा दिया है और अप्रैल की शुरुआत में अमेरिका ने दोनों देशों के बीच शांति समझौता कराने की पहल की थी, लेकिन इजराइल की क्षेत्रीय विस्तार की योजनाओं ने इस प्रक्रिया को संकट में डाल दिया है। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि इजराइल ने ईरान पर हमला उस समय किया, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को फोन पर तेहरान पर हमला न करने की सलाह दी थी।

नेतन्याहू की युद्ध की जिद के पीछे के कारण

एक्सियोस (Axios) की एक रिपोर्ट के अनुसार, फरवरी के अंत में अमेरिका और इजराइल ने मिलकर ईरान पर हमला किया था और उस समय इजराइली प्रधानमंत्री ने अमेरिकी राष्ट्रपति को भरोसा दिलाया था कि इस हमले के बाद ईरान में तख्तापलट हो जाएगा। इसी आश्वासन के आधार पर ट्रंप ने हमले की अनुमति दी थी, लेकिन तमाम कोशिशों के बाद भी ईरान की सत्ता में कोई बदलाव नहीं हुआ। इसके बाद अमेरिका ने कूटनीतिक बातचीत का रास्ता चुना और नेतन्याहू को लगता है कि अमेरिका और ईरान के बीच हो रही यह बातचीत इजराइल के हितों के खिलाफ है। इजराइल चाहता है कि ईरान लंबी दूरी की मिसाइलों का निर्माण पूरी तरह बंद करे और ऐसा न करने पर दंड का प्रावधान हो। साथ ही, वह चाहता है कि ईरान अपने 'एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस' के सभी सहयोगियों जैसे हिजबुल्लाह, हमास और हूती को खत्म करे और परमाणु हथियार न बनाने की आधिकारिक घोषणा करे।

अमेरिका फिलहाल केवल परमाणु हथियार और यूरेनियम संवर्धन के मुद्दों पर ही ध्यान केंद्रित कर रहा है, जिससे नेतन्याहू खुद को अलग-थलग महसूस कर रहे हैं। इजराइल में इस साल के अंत में आम चुनाव होने हैं और लेबनान तथा गाजा के मोर्चे पर पहले से ही दबाव झेल रहे नेतन्याहू को लगता है कि युद्ध के माहौल में उनकी राजनीतिक स्थिति मजबूत हो सकती है और ईरान के मामले में उनकी स्थिति और ज्यादा खराब होने का डर उन्हें युद्ध की ओर धकेल रहा है।

अमेरिका की बेबसी और इजराइल का रुख

फाइनेंशियल टाइम्स के साथ एक साक्षात्कार में डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया था कि इजराइल उनकी बात मानेगा और उन्होंने नेतन्याहू को ईरान पर हमला न करने के लिए कहा है। इसके बावजूद इजराइल ने भू-मध्यसागर के रास्ते ईरान पर हमला कर दिया। इस बेबसी का एक बड़ा कारण लेबनान संघर्ष है, जहां हिजबुल्लाह लगातार इजराइल को निशाना बना रहा है। नेतन्याहू के लिए हिजबुल्लाह के हमलों का जवाब न देना राजनीतिक रूप से बहुत जोखिम भरा हो सकता है, इसलिए वे अमेरिकी सलाह के बावजूद सैन्य कार्रवाई जारी रखे हुए हैं।

परमाणु समझौते की वर्तमान स्थिति

मेहर न्यूज एजेंसी के अनुसार, ईरान के पास इस समय एक समझौता प्रस्ताव विचाराधीन है। इस बातचीत में पाकिस्तान एक महत्वपूर्ण मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। रविवार 7 जून को पाकिस्तान के गृह मंत्री मोहसिन नकवी ने तेहरान का दौरा किया और वहां ईरानी अधिकारियों को प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ का पत्र सौंपा। पाकिस्तान इस समय अमेरिका और ईरान के बीच आधिकारिक संदेशवाहक के रूप में काम कर रहा है, जिससे पता चलता है कि पर्दे के पीछे कूटनीतिक प्रयास अभी भी जारी हैं।

समझौते की राह में मुख्य अड़चनें

ईरान का रुख है कि परमाणु समझौता केवल उस तक सीमित न रहकर पूरे 'एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस' यानी लेबनान, यमन और गाजा पर भी लागू होना चाहिए। इसके अलावा, ईरान अपना संवर्धित यूरेनियम अमेरिका को सौंपने के पक्ष में नहीं है। एक और बड़ा विवाद जब्त किए गए पैसों को लेकर है। ईरान चाहता है कि अमेरिका उसके फंड्स को तुरंत रिलीज करे, जबकि अमेरिका का कहना है कि इस पर फैसला समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद ही लिया जाएगा।

युद्ध छिड़ने के वैश्विक परिणाम

यदि यह संघर्ष पूर्ण युद्ध में बदलता है, तो इसके परिणाम विनाशकारी होंगे। ईरान की रणनीति सबसे पहले बाब अल मंडेब जलडमरूमध्य को बंद करने की होगी, जहां से दुनिया का 15 प्रतिशत व्यापार होता है। इसके साथ ही होर्मुज की नाकाबंदी और कड़ी की जा सकती है। इन कदमों से एशिया, यूरोप और अफ्रीका में तेल और गैस की भारी किल्लत पैदा हो जाएगी, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था चरमरा सकती है।

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