इजराइल में शामिल होना चाहते हैं लेबनान के ईसाई गांव? नेतन्याहू के दावे पर छिड़ा विवाद

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इजराइल में शामिल होना चाहते हैं लेबनान के ईसाई गांव? नेतन्याहू के दावे पर छिड़ा विवाद
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इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने एक बड़ा और विवादास्पद दावा करते हुए कहा है कि दक्षिणी लेबनान के कुछ ईसाई गांव अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए इजराइल में शामिल होने की इच्छा रखते हैं। नेतन्याहू के इस बयान ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हलचल पैदा कर दी है, क्योंकि यह सीधे तौर पर लेबनान की क्षेत्रीय अखंडता से जुड़ा मामला है। हालांकि, जिन गांवों के बारे में यह दावा किया गया है, उन्होंने तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए इस बात का खंडन किया है और अपनी लेबनानी पहचान को सर्वोपरि बताया है।

नेतन्याहू का फॉक्स न्यूज़ पर बड़ा दावा

रविवार को फॉक्स न्यूज़ के एक कार्यक्रम में इंटरव्यू के दौरान बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा कि दक्षिणी लेबनान के कुछ ईसाई गांवों ने इजराइल का हिस्सा बनने की इच्छा जताई है। नेतन्याहू का तर्क था कि ये गांव हिजबुल्लाह के कट्टरपंथियों के हमलों और उनके बढ़ते प्रभाव से डरे हुए हैं और उन्हें लगता है कि इजराइल ही उन्हें सुरक्षा प्रदान कर सकता है। उन्होंने आगे कहा कि इजराइल न केवल अपने पड़ोस में बल्कि दुनिया के अन्य हिस्सों में भी ईसाइयों की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। हालांकि, अपने इस संबोधन के दौरान प्रधानमंत्री ने किसी भी विशिष्ट गांव का नाम नहीं लिया और न ही इस संबंध में कोई आधिकारिक दस्तावेज पेश किया।

लेबनानी गांवों का कड़ा पलटवार

नेतन्याहू के इस दावे के जवाब में दक्षिणी लेबनान के मार्जेयून इलाके के ईसाई गांवों ने एकजुट होकर एक संयुक्त बयान जारी किया। इन गांवों के प्रतिनिधियों ने स्पष्ट रूप से कहा कि उनके पास किसी दूसरे देश में शामिल होने का न तो कोई कानूनी अधिकार है और न ही ऐसी कोई मंशा। उन्होंने अपने बयान में जोर देकर कहा कि वे अपनी मिट्टी, अपनी राष्ट्रीय पहचान और लेबनान के झंडे के प्रति पूरी तरह वफादार हैं। ग्रामीणों ने नेतन्याहू के दावे को पूरी तरह से निराधार बताते हुए इसे खारिज कर दिया और स्पष्ट किया कि वे लेबनान का अभिन्न हिस्सा बने रहना चाहते हैं।

युद्ध और जमीनी हालात का प्रभाव

यह पूरा घटनाक्रम उस समय हो रहा है जब इजराइल और हिजबुल्लाह के बीच तनाव चरम पर है। अमेरिका और इजराइल के एक संयुक्त हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता की मृत्यु के बाद, हिजबुल्लाह ने जवाबी कार्रवाई करते हुए इजराइल पर कई रॉकेट दागे थे। इसके जवाब में इजराइल ने दक्षिणी लेबनान में बड़े पैमाने पर हवाई हमले किए और अपनी सेना को जमीनी अभियान के लिए सीमा पार भेज दिया। वर्तमान में इजराइली सेना ने सीमा से लगे कई महत्वपूर्ण इलाकों पर अपना नियंत्रण बना रखा है। इस युद्ध की स्थिति में दक्षिणी लेबनान के कई ईसाई गांव भी भारी गोलाबारी, हवाई हमलों और विस्थापन की मार झेल रहे हैं।

ईसाई गांवों की चुनौतियां और सैन्य चेतावनी

युद्ध के दौरान इजराइली सेना ने कई बार इन गांवों को खाली करने के आदेश जारी किए थे। हालांकि, कई स्थानीय निवासियों ने अपने घरों, ऐतिहासिक चर्चों और खेतों की रक्षा के लिए वहीं रुकने का साहसी फैसला लिया। इसके बावजूद, कुछ गांव पूरी तरह से खाली हो गए हैं और वहां के बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा है और रिपोर्टों के अनुसार, इजराइली सेना ने कई ईसाई बहुल गांवों के मेयरों और स्थानीय अधिकारियों को फोन करके सख्त चेतावनी दी थी कि वे हिजबुल्लाह के लड़ाकों या किसी भी अजनबी व्यक्ति को अपने गांव में प्रवेश न करने दें। यह स्थिति स्थानीय आबादी के लिए अत्यधिक तनावपूर्ण बनी हुई है।

दक्षिणी लेबनान में सेना की मौजूदगी और ट्रंप के साथ संबंध

प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने रविवार को एक अन्य सरकारी कार्यक्रम में यह स्पष्ट कर दिया कि उत्तरी इजराइल की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए इजराइली सेना जरूरत पड़ने तक दक्षिणी लेबनान में तैनात रहेगी। हालांकि अमेरिका इस मामले में मध्यस्थता कर रहा है और इजराइल व लेबनान के बीच कुछ समझौते भी हुए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर हिजबुल्लाह और इजराइली सेना के बीच झड़पें रुकने का नाम नहीं ले रही हैं। इसी इंटरव्यू में नेतन्याहू ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ अपने संबंधों पर भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच 99 प्रतिशत मामलों में सहमति रहती है और जो थोड़े-बहुत मतभेद होते हैं, उन्हें बातचीत से सुलझा लिया जाता है। यह बयान ट्रंप के उस हालिया बयान के बाद आया है जिसमें उन्होंने कहा था कि नेतन्याहू जानते हैं कि बॉस कौन है। ट्रंप ने हाल ही में लेबनान और ईरान के मुद्दों पर नेतन्याहू की कार्यशैली की आलोचना भी की थी।

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