भारतीय राजनीति में महिला आरक्षण का मुद्दा लंबे समय से चर्चा में है। इसका मकसद स्पष्ट तौर पर राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना है। देश की आधी आबादी महिलाओं की है लेकिन संसद और विधान सभाओं में उनकी संख्या अपेक्षाकृत बहुत कम है या यूं भी कह सकते हैं कि न के बराबर है और इसी कमी को दूर करने के लिए महिला आरक्षण बिल पर न केवल चर्चा शुरू हुई बल्कि कई बार कोशिशें भी सामने आईं लेकिन यह बिल पूरी तरह से पास नहीं हो पाया। अब नारी शक्ति वंदन अधिनियम से महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ने की उम्मीद जागी है। देखना रोचक होगा कि इसका असली स्वरूप क्या सामने आएगा? पर, अभी यह जान लेते हैं कि यह बिल पहले भी आया था, फिर से आ गया है। इन सभी बिलों में आखिर क्या अंतर है और लागू हुआ तो क्या सूरत बनेगी?
महिला आरक्षण बिल का इतिहास और 30 साल का सफर
पहली बार महिला आरक्षण बिल 1996 में पेश हुआ था। इसे 81वां संविधान संशोधन विधेयक कहा गया। इसमें लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रस्ताव था। तब देश में संयुक्त मोर्चा सरकार की सरकार थी। इसके बाद इसे कई बार दोबारा पेश किया गया लेकिन हर बार बिल अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच सका। साल 2010 में यह बिल राज्यसभा से पास हो गया था लेकिन लोकसभा में इसे पारित नहीं कराया जा सका और मामला फिर लटक गया। पुराने बिल को लेकर कई तरह के मतभेद थे। कुछ दलों ने कहा कि इसमें पिछड़े वर्ग की महिलाओं के लिए अलग आरक्षण नहीं है। उनका मानना था कि इसका लाभ केवल कुछ वर्गों तक सीमित रहेगा और कुछ नेताओं ने यह भी कहा कि राजनीतिक दल खुद ही महिलाओं को टिकट दें, कानून बनाने की जरूरत नहीं है। सीटों के रोटेशन का भी विरोध हुआ क्योंकि हर चुनाव में सीट बदलने से नेताओं का अपने क्षेत्र से जुड़ाव कम हो सकता है।
नारी शक्ति वंदन अधिनियम और इसके प्रमुख प्रावधान
साल 2023 में केंद्र सरकार ने महिला आरक्षण पर नया बिल पेश किया, जिसे 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' नाम दिया गया। यह बिल संसद के विशेष सत्र में लाया गया था और अब लोकसभा व राज्यसभा दोनों से पास हो चुका है। इसे व्यापक राजनीतिक समर्थन मिला और कई दलों ने इसका स्वागत किया। हाल ही में पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा देवी पाटिल एवं बसपा प्रमुख मायावती ने भी ताजे बिल का समर्थन किया है।
पुराने और नए बिल में तकनीकी अंतर और रोटेशन का मुद्दा
पुराने और नए बिल में सबसे बड़ा अंतर लागू करने की प्रक्रिया में है। नया बिल तुरंत लागू नहीं होगा। इसके लिए पहले देश में जनगणना होगी और फिर परिसीमन किया जाएगा। परिसीमन का मतलब है सीटों का नया निर्धारण होगा, जिससे लोकसभा और विधान सभाओं में सीटों की मौजूद संख्या बढ़ जाएगी। इन दोनों प्रक्रियाओं के बाद ही आरक्षण लागू होगा, जिसके कारण इसके क्रियान्वयन में कुछ समय लग सकता है। यही बात आलोचना का कारण भी बनी है। इसके अलावा, नए बिल में सीटों के रोटेशन का प्रावधान रखा गया है, यानी हर चुनाव में आरक्षित सीटें बदलेंगी। इससे अलग-अलग क्षेत्रों की महिलाओं को मौका मिलेगा, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इससे निरंतरता प्रभावित हो सकती है और नेताओं का ध्यान दीर्घकालिक विकास योजनाओं के बजाय अन्य समीकरणों पर रह सकता है।
स्थानीय स्तर का अनुभव और वैश्विक परिदृश्य
भारत में पंचायत और नगर निकाय स्तर पर पहले से ही महिला आरक्षण लागू है और 73वें और 74वें संविधान संशोधन के तहत एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की गई थीं। कई राज्यों ने इसे बढ़ाकर 50 प्रतिशत तक कर दिया है। इसका सकारात्मक असर रहा है और लाखों महिलाएं स्थानीय राजनीति में आई हैं, जिन्होंने शिक्षा, स्वच्छता और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर काम किया और वैश्विक स्तर पर देखें तो रवांडा में संसद में महिलाओं की हिस्सेदारी 60 प्रतिशत से अधिक है। नेपाल, बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे देशों में भी महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित हैं। 1990 के दशक में गठबंधन सरकारों के दौर में सहमति बनाना कठिन था, लेकिन वर्तमान में मजबूत बहुमत वाली सरकार और बढ़ती सामाजिक जागरूकता ने इस बिल को पारित करना आसान बना दिया है। हालांकि, जनगणना और परिसीमन के समय को लेकर स्पष्टता की कमी और पिछड़े वर्ग की महिलाओं के लिए अलग आरक्षण की मांग जैसी चुनौतियां अब भी बनी हुई हैं।