मक्का समझौते के तहत पाकिस्तान का सऊदी अरब को सैन्य समर्थन का ऐलान, ईरान से सीधी जंग पर सस्पेंस

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मक्का समझौते के तहत पाकिस्तान का सऊदी अरब को सैन्य समर्थन का ऐलान, ईरान से सीधी जंग पर सस्पेंस
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पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और भू-राजनीतिक उथल-पुथल के बीच पाकिस्तान ने एक नए रक्षा समझौते जिसे मक्का समझौता कहा जा रहा है, के तहत सऊदी अरब को हरसंभव सैन्य मदद देने का खुला ऐलान किया है। इस त्रिपक्षीय समझौते के सामने आने के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह सवाल उठने लगे थे कि क्या पाकिस्तान अब ईरान के खिलाफ भी सीधे युद्ध में उतरेगा। हालांकि, पाकिस्तान के आधिकारिक बयानों से यह साफ हो गया है कि इस्लामाबाद इस मामले में बेहद सधा हुआ रुख अपना रहा है और उसकी मंशा ईरान से सीधी जंग मोल लेने की बिल्कुल नहीं है। पाकिस्तान एक तरफ सऊदी अरब को सुरक्षा का भरोसा दे रहा है, तो दूसरी तरफ तेहरान के साथ अपने कूटनीतिक संबंधों को भी बचाए रखना चाहता है।

मक्का संयुक्त रक्षा समझौता और सामूहिक सुरक्षा

यह पूरा घटनाक्रम पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किए के बीच 7 अगस्त को मक्का में हुए मक्का ज्वाइंट डिफेंस एग्रीमेंट के संदर्भ में सामने आया है। इस त्रिपक्षीय सुरक्षा पैक्ट के तहत सामूहिक सुरक्षा का सिद्धांत लागू किया गया है। इसका अर्थ यह है कि इन तीनों देशों में से किसी एक पर भी हुआ हमला, तीनों देशों पर संयुक्त हमला माना जाएगा। हालांकि, तीनों देशों ने बार-बार यह स्पष्ट किया है कि यह गठबंधन पूरी तरह से रक्षात्मक है और इसका उद्देश्य किसी अन्य देश के खिलाफ आक्रामक कार्रवाई करना नहीं है। इस नए रक्षा ढांचे को जमीनी स्तर पर उतारने और रणनीतिक समन्वय स्थापित करने के लिए सऊदी अरब में एक विशेष सचिवालय भी तैयार किया जा रहा है।

रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ का रोम में बड़ा बयान

पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा मोहम्मद आसिफ ने हाल ही में अपने रोम दौरे के दौरान पाकिस्तान की स्थिति को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि यदि सऊदी अरब पर कोई बाहरी हमला होता है, तो उसकी रक्षा के लिए पाकिस्तान अपने सभी उपलब्ध सैन्य संसाधन झोंक देगा और उन्होंने ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब पर लगातार किए जा रहे मिसाइल और ड्रोन हमलों का हवाला देते हुए कहा कि सऊदी अरब का कोई भी दुश्मन, पाकिस्तान का दुश्मन है। हालांकि, जब उनसे यह सवाल किया गया कि क्या पाकिस्तानी सेना यमन में हूती ठिकानों पर किसी सीधी सैन्य कार्रवाई में शामिल है, तो उन्होंने सीधे तौर पर इसकी पुष्टि करने से परहेज किया। उन्होंने केवल इतना कहा कि समझौते के तहत पाकिस्तान अपनी रक्षात्मक क्षमताएं मुहैया कराने के लिए प्रतिबद्ध है।

हूती विद्रोहियों की आक्रामकता और वैश्विक व्यापार पर संकट

ख्वाजा आसिफ ने जानकारी दी कि हूती विद्रोहियों ने यमन के लाल सागर तट पर स्थित रणनीतिक बंदरगाह शहर मोखा और कई महत्वपूर्ण द्वीपों पर कब्जा कर लिया है। इससे वैश्विक व्यापार के लिए बेहद अहम बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य पर संकट गहरा गया है। इस समुद्री रास्ते से दुनिया का लगभग 12 प्रतिशत व्यापार होता है। हूतियों द्वारा सऊदी तेल प्रतिष्ठानों और जहाजों को लगातार निशाना बनाए जाने के बाद इस त्रिपक्षीय सैन्य समझौते को सक्रिय करने की जरूरत महसूस की गई है। हूतियों ने इराक में अपने सहयोगी मिलिशिया के साथ मिलकर सऊदी टैंकरों को इस जलडमरूमध्य का इस्तेमाल करने से रोकने की कोशिश की है, जिससे क्षेत्र में सुरक्षा संबंधी चिंताएं बढ़ गई हैं।

ईरान के साथ संतुलन की कूटनीति

पाकिस्तान सीधे तौर पर ईरान पर हमला करने से बहुत सावधानी से बच रहा है। इसके पीछे कई महत्वपूर्ण कारण हैं और सबसे पहले, मक्का समझौता मुख्य रूप से एक रक्षात्मक गठबंधन है, जिसका उद्देश्य रियाद की क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा करना है। दूसरा, पाकिस्तान की सैन्य मदद का ऐलान मुख्य रूप से हूती विद्रोहियों के ड्रोन और मिसाइल हमलों से सऊदी अरब की रक्षा करने तक सीमित नजर आता है। पाकिस्तान और ईरान के बीच पारंपरिक रूप से पड़ोसी और कूटनीतिक संबंध रहे हैं और पाकिस्तान एक तरफ सऊदी अरब को सुरक्षा का पूरा भरोसा दे रहा है, तो दूसरी तरफ तेहरान के साथ बातचीत के रास्ते भी पूरी तरह खुले रखना चाहता है, ताकि वह पश्चिम एशिया के किसी बड़े युद्ध में सीधे तौर पर उलझने से बच सके।

मध्यस्थता के प्रयास और कूटनीतिक इतिहास

सऊदी अरब को सैन्य समर्थन देने की इच्छा के बावजूद, पाकिस्तान ईरान से जुड़े व्यापक संघर्ष को खत्म करने के लिए बातचीत पर जोर दे रहा है। पाकिस्तान ने तेहरान के परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत के जरिए हुए समझौते को फिर से शुरू करने का समर्थन किया है। इस साल की शुरुआत में पाकिस्तान ने खुद को एक मध्यस्थ के रूप में स्थापित करने की कोशिश की थी। अप्रैल में पाकिस्तान ने इस्लामाबाद में ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच सीधी बातचीत की मेजबानी की थी। दोनों पक्षों ने जून में एक अंतरिम समझौते पर सहमति व्यक्त की थी और 60 दिन के भीतर अंतिम समझौते पर पहुंचने का संकल्प लिया था, लेकिन शत्रुता फिर से शुरू होने के बाद वह समय सीमा समाप्त हो गई। हाल ही में पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब के शीर्ष राजनयिकों ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के इतर बैठक की, जिसमें मक्का समझौते को लागू करने पर चर्चा की गई।

गठबंधन के लिए एक शुरुआती परीक्षा

सऊदी अरब और हूतियों के बीच जारी लड़ाई ने इस नए गठबंधन के लिए एक शुरुआती परीक्षा की स्थिति पैदा कर दी है। समझौते का पूरा मसौदा अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है और इसकी कमान और परिचालन संरचनाएं अभी भी विकसित की जा रही हैं। रक्षा मंत्री आसिफ ने कहा कि यह गठबंधन अपने सदस्यों के बीच इस विश्वास को दर्शाता है कि मौजूदा सुरक्षा व्यवस्था खाड़ी देशों की रक्षा करने में विफल रही है। उन्होंने चेतावनी दी कि एक बार जब कोई संघर्ष शुरू हो जाता है, तो उसके परिणाम और दिशा को नियंत्रित करना मुश्किल होता है। इसलिए, पाकिस्तान रक्षात्मक मजबूती के साथ-साथ कूटनीतिक समाधान की दिशा में भी काम कर रहा है।

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