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पेट्रोल डीजल की कीमतों में 5 रुपये की बढ़ोतरी संभव, तेल कंपनियों को भारी घाटा

पेट्रोल डीजल की कीमतों में 5 रुपये की बढ़ोतरी संभव, तेल कंपनियों को भारी घाटा
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आम आदमी की जेब पर एक बार फिर महंगाई की गाज गिरने वाली है। सरकारी तेल विपणन कंपनियों (OMCs) को हो रहे भारी घाटे की भरपाई के लिए पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 5 रुपये प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी की जा सकती है। रेटिंग एजेंसी इकरा (ICRA) और क्रिसिल (CRISIL) के विश्लेषण में यह चेतावनी दी गई है और वैश्विक कच्चे तेल के बाजार में आए झटकों और पश्चिम एशिया में जारी संकट के कारण सरकारी तेल कंपनियां भारी 'अंडर-रिकवरी' यानी लागत से कम वसूली की समस्या से जूझ रही हैं।

तेल कंपनियों का दैनिक घाटा और अंडर-रिकवरी

मई महीने के दूसरे पखवाड़े में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगभग 8 प्रतिशत का इजाफा देखा गया था, लेकिन अब इसमें और बढ़ोतरी की संभावना जताई जा रही है। ताजा जानकारी के अनुसार, ईंधन की कीमतों में 5 रुपये प्रति लीटर की और तेजी आ सकती है। इसका मुख्य कारण यह है कि कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और पश्चिम एशिया संकट की वजह से सरकारी तेल कंपनियों को हर दिन लगभग 610 करोड़ रुपये का भारी नुकसान हो रहा है।

ICRA लिमिटेड में कॉर्पोरेट रेटिंग्स के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट और को-ग्रुप हेड, प्रशांत वशिष्ठ ने बताया कि 15 मई से पेट्रोल और डीजल की रिटेल कीमतों में कुल मिलाकर लगभग 7 रुपये 50 पैसे प्रति लीटर की बढ़ोतरी की जा चुकी है। इसके बावजूद, तेल कंपनियों को अभी भी पेट्रोल पर लगभग 5 रुपये 50 पैसे प्रति लीटर और डीजल पर 4 रुपये 50 पैसे प्रति लीटर का नुकसान उठाना पड़ रहा है। वशिष्ठ के मुताबिक, तीनों सरकारी तेल कंपनियों को मिलाकर प्रतिदिन लगभग 610 करोड़ रुपये का घाटा हो रहा है। अगर पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 5 रुपये प्रति लीटर की और बढ़ोतरी की जाती है, तो कंपनियां 'ब्रेक-ईवन' यानी उस स्थिति के करीब पहुंच सकती हैं जहां उनकी लागत और कमाई बराबर हो जाए।

एलपीजी और एटीएफ पर भी नुकसान का साया

यह वित्तीय नुकसान केवल पेट्रोल और डीजल तक ही सीमित नहीं है। इकरा के अनुमान के मुताबिक, एलपीजी (LPG) पर अंडर-रिकवरी अभी भी लगभग 680 रुपये प्रति सिलेंडर बनी हुई है। वहीं, एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) यानी हवाई ईंधन पर कंपनियों को प्रतिदिन लगभग 93 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है। क्रिसिल रेटिंग्स का विश्लेषण कहता है कि यदि कच्चे तेल की कीमतें इसी तरह ऊंची बनी रहीं और कंपनियां अपना घाटा कम करने की कोशिश करती रहीं, तो पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कुल बढ़ोतरी 10 रुपये प्रति लीटर के आंकड़े को छू सकती है।

अर्थव्यवस्था और महंगाई पर व्यापक असर

क्रिसिल ने चेतावनी दी है कि ईंधन की कीमतों में इस बढ़ोतरी का व्यापक असर पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। परिवहन लागत बढ़ने से खाने-पीने की चीजों और कोर महंगाई, दोनों में इजाफा होगा। रेटिंग एजेंसी का अनुमान है कि यदि पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 7 रुपये 50 पैसे प्रति लीटर की बढ़ोतरी होती है, तो इससे उपभोक्ता महंगाई में लगभग 36 बेसिस पॉइंट्स की वृद्धि हो सकती है। वहीं, अगर कुल बढ़ोतरी 10 रुपये प्रति लीटर तक पहुंचती है, तो महंगाई पर इसका असर 48 बेसिस पॉइंट्स तक बढ़ सकता है।

महंगाई बढ़ने का सबसे बड़ा कारण ट्रांसपोर्टेशन की लागत में वृद्धि को माना जा रहा है। क्रिसिल के आंकड़ों के अनुसार, भारत की लॉजिस्टिक्स लागत में माल ढुलाई (फ्रेट ट्रांसपोर्ट) का हिस्सा 54 प्रतिशत है। देश में कुल माल ढुलाई का लगभग 71 प्रतिशत हिस्सा सड़क परिवहन के जरिए होता है। सड़क परिवहन की कुल लागत में अकेले ईंधन की हिस्सेदारी लगभग 42 प्रतिशत है। ऐसे में ईंधन महंगा होने से पूरी सप्लाई चेन प्रभावित होती है। इसका सीधा असर डेयरी उत्पाद, फल, दालें, मसाले, चाय, कॉफी, अंडे, मीट और मछली जैसी आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर पड़ेगा, क्योंकि परिवहन खर्च बढ़ने से इनकी रिटेल कीमतें भी बढ़ जाएंगी।

कच्चे तेल की कीमतें और भविष्य की चुनौतियां

मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को भी कच्चे तेल से जुड़े इनपुट और परिवहन के बढ़ते खर्च की वजह से दोहरी मार झेलनी पड़ रही है। इससे कंपनियों के मार्जिन और उपभोक्ताओं के लिए कीमतों पर दबाव बढ़ रहा है। मौजूदा वित्त वर्ष के पहले दो महीनों में कच्चे तेल की कीमतें औसतन 112 डॉलर प्रति बैरल रही हैं, जो क्रिसिल के पूरे साल के 95 डॉलर प्रति बैरल के अनुमान से काफी अधिक है। हालिया बढ़ोतरी के बावजूद तेल कंपनियां घाटे में हैं, इसलिए आने वाले समय में कंपनियों की वित्तीय स्थिति सुधारने और महंगाई को नियंत्रित करने के बीच संतुलन बनाने पर बहस और तेज होने की उम्मीद है।

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