प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी न्यूजीलैंड पहुंच गए हैं। न्यूजीलैंड भारत के लिए वर्षों से एक महत्वपूर्ण देश रहा है, लेकिन इन दोनों देशों के बीच का रिश्ता केवल कूटनीति तक ही सीमित नहीं है। इसका एक गहरा ऐतिहासिक सिरा प्रथम विश्व युद्ध के मैदानों से भी जुड़ा हुआ है। भारतीय सैनिकों ने इस देश के लिए और मित्र राष्ट्रों के हितों के लिए एक बहुत ही कठिन युद्ध लड़ा था, जिसे इतिहास में गैलीपोली युद्ध के नाम से जाना जाता है। यह प्रथम विश्व युद्ध का एक अत्यंत चुनौतीपूर्ण और महत्वपूर्ण अभियान था, जिसमें 14वीं फिरोजपुर सिख रेजिमेंट ने अपने अदम्य साहस का परिचय दिया था।
क्या था गैलीपोली युद्ध और इसका महत्व?
गैलीपोली युद्ध प्रथम विश्व युद्ध के दौरान लड़ा गया एक प्रमुख सैन्य अभियान था। यह युद्ध आधुनिक तुर्किये के गैलीपोली प्रायद्वीप में लड़ा गया था। इस युद्ध में एक तरफ भारत, ब्रिटेन, न्यूज़ीलैंड, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस और अन्य मित्र राष्ट्रों की सेनाएं थीं, तो दूसरी तरफ ओटोमन साम्राज्य की सेना थी। भारतीय सैनिक ब्रिटिश भारतीय सेना के हिस्से के रूप में मित्र राष्ट्रों की ओर से लड़े थे। इस अभियान में न्यूज़ीलैंड के सैनिक भी उनके साथी थे और कई मोर्चों पर भारतीय, ऑस्ट्रेलियाई और न्यूज़ीलैंड के सैनिकों का उद्देश्य एक ही था और वह था जीत।
युद्ध की समयसीमा और भौगोलिक स्थिति
गैलीपोली का यह अभियान लगभग नौ महीने तक चला था। मुख्य सैन्य कार्रवाई अप्रैल 1915 से दिसंबर 1915 के बीच हुई थी, हालांकि यह अभियान जनवरी 1916 तक जारी रहा। मित्र राष्ट्रों की सेनाओं ने बाद में धीरे-धीरे अपने सैनिकों को वहां से निकालना शुरू किया और अंतिम निकासी 9 जनवरी 1916 तक पूरी हुई। इस पूरे नौ महीने के दौरान सैनिकों को गोलियों, तोपों की बौछार, भयंकर बीमारियों, चिलचिलाती गर्मी, कड़ाके की ठंड, भूख और पानी की भारी कमी जैसी भीषण परिस्थितियों से जूझना पड़ा था।
यह युद्ध तुर्किये के पश्चिमी भाग में स्थित गैलीपोली प्रायद्वीप पर लड़ा गया, जो डार्डानेल्स जलडमरूमध्य के पास स्थित है और डार्डानेल्स जलमार्ग सामरिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण था क्योंकि यह भूमध्य सागर को काला सागर क्षेत्र से जोड़ता था। मित्र राष्ट्र इस रास्ते को अपने नियंत्रण में लेना चाहते थे ताकि रूस तक समुद्री सहायता आसानी से पहुंचाई जा सके, जो उस समय जर्मनी के खिलाफ युद्ध लड़ रहा था।
युद्ध के पक्ष और रणनीतिक उद्देश्य
गैलीपोली में एक ओर मित्र राष्ट्र थे जिनमें ब्रिटेन, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड और भारत के सैनिक शामिल थे। दूसरी ओर उस्मानी साम्राज्य यानी ओटोमन साम्राज्य की सेना थी, जो उस समय जर्मनी के साथ खड़ी थी। तुर्की सैनिक अपने देश की रक्षा के लिए लड़ रहे थे और उन्हें अपनी भौगोलिक स्थिति का पूरा लाभ मिल रहा था। उन्हें ऊंची पहाड़ियों, संकरी घाटियों और मजबूत रक्षा चौकियों की वजह से बढ़त हासिल थी।
मित्र राष्ट्रों का मुख्य उद्देश्य डार्डानेल्स जलमार्ग को जीतकर इस्तांबुल तक पहुंचने का रास्ता बनाना था, जो उस समय ओटोमन साम्राज्य की राजधानी थी। उन्हें उम्मीद थी कि तुर्की पर दबाव बनाकर उसे युद्ध से बाहर किया जा सकता है। हालांकि, यह योजना जमीन पर बहुत कठिन साबित हुई। समुद्री हमला सफल न होने के बाद सैनिकों को तट पर उतारकर जमीनी लड़ाई शुरू की गई थी।
नेतृत्व और भारतीय सैनिकों की भूमिका
मित्र राष्ट्रों की ओर से इस अभियान का प्रमुख नेतृत्व ब्रिटिश जनरल सर इयान हैमिल्टन के पास था। न्यूज़ीलैंड और ऑस्ट्रेलिया के सैनिकों को सामूहिक रूप से एएनज़ैक (ANZAC) कहा जाता था। वहीं, ओटोमन सेना की रक्षा का नेतृत्व जर्मन जनरल ओटो लिमान फॉन सैंडर्स ने किया था और तुर्की के एक प्रमुख सैन्य अधिकारी मुस्तफ़ा कमाल भी इस युद्ध में बहुत महत्वपूर्ण रहे, जो बाद में आधुनिक तुर्किये के संस्थापक अतातुर्क बने।
भारतीय सैनिक ब्रिटिश भारतीय सेना की अलग-अलग टुकड़ियों में शामिल थे। गैलीपोली में 29वीं भारतीय ब्रिगेड और 14वीं फिरोजपुर सिख रेजिमेंट का नाम विशेष रूप से गर्व के साथ लिया जाता है। उस समय भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था और भारतीय सेना ब्रिटिश साम्राज्य की शक्ति का एक बड़ा हिस्सा थी और भारतीय सैनिकों को गैलीपोली इसलिए भेजा गया था क्योंकि वे अनुभवी थे और उन्हें कठिन मौसम व दुर्गम पहाड़ी इलाकों में लड़ने का अभ्यास था। इन सैनिकों में सिख, पंजाबी मुसलमान, गोरखा और पठान शामिल थे, जिन्होंने अपने अनुशासन का लोहा मनवाया।
14वीं फिरोजपुर सिख रेजिमेंट की वीरता की गाथा
14वीं फिरोजपुर सिख रेजिमेंट ने गैलीपोली के मैदान में जो साहस दिखाया, वह आज भी सैन्य इतिहास के पन्नों में दर्ज है। जून 1915 में क्रिथिया क्षेत्र के पास हुई भयंकर लड़ाई में सिख सैनिकों को भारी नुकसान उठाना पड़ा, लेकिन उन्होंने पीछे हटने के बजाय अपने लक्ष्य की ओर बढ़ना जारी रखा। कई जवान घायल होने के बावजूद लड़ते रहे और अनेक सैनिकों ने अपना सर्वोच्च बलिदान दिया। उनकी इस बहादुरी ने न केवल ब्रिटिश भारतीय सेना की प्रतिष्ठा बढ़ाई, बल्कि यह उन भारतीय सैनिकों की अमर कहानी बन गई जो अपने देश से हजारों मील दूर एक विदेशी धरती पर बहादुरी से लड़े थे।
न्यूज़ीलैंड के साथ संबंध और युद्ध का परिणाम
न्यूज़ीलैंड के सैनिक इस अभियान के मुख्य स्तंभ थे और उन्होंने एएनज़ैक मोर्चे पर लड़ाई लड़ी थी। भारतीय और न्यूज़ीलैंड के सैनिक एक ही गठबंधन का हिस्सा थे, इसलिए भारतीय सैनिकों की कहानी को न्यूज़ीलैंड की गैलीपोली स्मृति से अलग नहीं किया जा सकता। हालांकि भारतीय सैनिक न्यूज़ीलैंड की स्वतंत्र सेना के अधीन नहीं, बल्कि ब्रिटिश कमान के अंतर्गत लड़ रहे थे, लेकिन उनका साझा संघर्ष आज भी दोनों देशों को जोड़ता है।
गैलीपोली अभियान मित्र राष्ट्रों के लिए सैन्य रूप से सफल नहीं रहा और उन्हें अंततः अपने सैनिक वापस बुलाने पड़े। फिर भी, इस युद्ध ने न्यूज़ीलैंड, ऑस्ट्रेलिया और तुर्किये की राष्ट्रीय पहचान पर गहरा प्रभाव डाला और भारत के लिए भी यह अभियान अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि भारतीय सैनिकों ने अपनी बहादुरी और बलिदान से विश्व इतिहास में अपना स्थान बनाया। आज इतिहासकार इन सैनिकों के योगदान को अधिक महत्व दे रहे हैं, जो साहस, कर्तव्य और बलिदान की एक अद्वितीय मिसाल है।