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प्रेमानंद महाराज ने फौजियों को देख कही ऐसी बात, सुनकर भर आएंगी आंखें

प्रेमानंद महाराज ने फौजियों को देख कही ऐसी बात, सुनकर भर आएंगी आंखें
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देश आज अपना 77वां गणतंत्र दिवस पूरे उत्साह के साथ मना रहा है। इस राष्ट्रीय पर्व के पावन अवसर पर वृंदावन के सुप्रसिद्ध संत प्रेमानंद महाराज का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। इस वीडियो में महाराज जी के सामने जब देश की रक्षा करने वाले कुछ फौजी भाई दर्शन के लिए पहुंचे, तो दृश्य अत्यंत भावुक कर देने वाला था। सैनिकों को अपने सामने पाकर प्रेमानंद महाराज न केवल प्रसन्न हुए, बल्कि उनके प्रति जो सम्मान उन्होंने प्रकट किया, उसने करोड़ों भारतीयों का दिल जीत लिया है।

सैनिकों की सेवा एक नौकरी नहीं, महा-तपस्या है

प्रेमानंद महाराज ने सैनिकों का स्वागत करते हुए कहा कि एक फौजी का कार्य कोई साधारण आजीविका या नौकरी नहीं है। उन्होंने इसे 'महा-तपस्या' की संज्ञा दी। महाराज जी ने विस्तार से समझाते हुए कहा कि सैनिक जहां भी तैनात होता है, वह हर पल राष्ट्र के लिए अपने प्राणों की आहुति देने को तैयार रहता है। यह एक ऐसा बलिदान है जिसे शब्दों में व्यक्त करना असंभव है और उन्होंने जोर देकर कहा कि आज हम अपने घरों में जो सुरक्षित महसूस करते हैं और चैन की नींद सोते हैं, वह केवल उन वीर जवानों की वजह से है जो सीमाओं पर भीषण परिस्थितियों में भी अडिग खड़े रहते हैं।

समाज की मानसिकता पर महाराज का प्रहार

इस दौरान प्रेमानंद महाराज ने समाज की सोच पर भी गहरी चोट की और उन्होंने विनम्रतापूर्वक प्रार्थना की कि लोग सैनिकों को केवल सरकारी कर्मचारी या नौकर समझने की भूल न करें। महाराज जी के अनुसार, जो व्यक्ति अपने परिवार, बच्चों और सुख-सुविधाओं का त्याग कर केवल राष्ट्र की रक्षा के लिए अपना जीवन समर्पित कर दे, वह सर्वोच्च सम्मान का अधिकारी है। उन्होंने कहा कि हर नागरिक का यह परम कर्तव्य है कि वह सैनिकों और उनके परिवारों का हृदय से आदर करे।

संत और सैनिक: एक ही सिक्के के दो पहलू

महाराज जी ने एक बहुत ही सुंदर तुलना करते हुए कहा कि उनकी दृष्टि में संत और सैनिक दोनों एक समान हैं और उन्होंने समझाया कि जहां संत अपनी तपस्या और साधना के माध्यम से राष्ट्र के लोगों का आध्यात्मिक कल्याण करते हैं और समाज को सही दिशा दिखाते हैं, वहीं सैनिक अपने शौर्य और प्राणों की बाजी लगाकर राष्ट्र की भौतिक और भौगोलिक सीमाओं की रक्षा करते हैं। दोनों का ही उद्देश्य राष्ट्र की सेवा और सुरक्षा है, बस उनके कार्यक्षेत्र अलग-अलग हैं।

प्रेम और स्वार्थ के बीच का अंतर

सैनिकों के राष्ट्र प्रेम को उदाहरण बनाते हुए प्रेमानंद महाराज ने प्रेम की वास्तविक परिभाषा भी साझा की। उन्होंने कहा कि आज के युग में जिसे लोग प्रेम। कहते हैं, वह अक्सर केवल स्वार्थ का एक रूप होता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि 'मैं तुम्हें चाहूं और तुम मुझे चाहो' यह प्रेम नहीं बल्कि एक सौदा है। वास्तविक प्रेम वह है जिसमें सामने वाले से कुछ भी पाने की कोई अपेक्षा न हो। सैनिक इसका सबसे बड़ा जीवंत उदाहरण हैं, जो बिना किसी स्वार्थ के देश के लिए अपनी छाती ताने खड़े रहते हैं। उनका यह निस्वार्थ भाव ही उन्हें महान बनाता है।

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