लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं। उत्तराखंड के हल्द्वानी कोतवाली थाने में उनके खिलाफ एक गंभीर एफआईआर दर्ज की गई है। यह मामला अनुसूचित जाति के एक युवक अमित कुमार की शिकायत पर आधारित है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि राहुल गांधी ने अपनी टिप्पणियों के माध्यम से अनुसूचित वर्ग की भावनाओं को गहरी ठेस पहुंचाई है। पुलिस ने इस मामले में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 196 और धारा 299 के साथ-साथ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 3(1)(q) को भी शामिल किया है। गौर करने वाली बात यह है कि ये सभी धाराएं गैर-जमानती हैं, जिसका अर्थ है कि इनमें गिरफ्तारी के बाद जमानत मिलना आसान नहीं होता।
विवाद की जड़ और शुद्धिकरण यज्ञ
यह पूरा विवाद हल्द्वानी में आयोजित कांग्रेस की एक रैली के बाद शुरू हुआ। रैली के समापन के पश्चात वहां एक 'शुद्धिकरण यज्ञ' का आयोजन किया गया था। राहुल गांधी ने इस यज्ञ को लेकर सवाल उठाए थे और इसे दलित विरोधी करार दिया था। शिकायतकर्ता अमित कुमार का कहना है कि राहुल गांधी की इस टिप्पणी ने न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान का अपमान किया, बल्कि अनुसूचित जाति के लोगों की भावनाओं को भी आहत किया है। इसी आधार पर उन्होंने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद यह कानूनी कार्रवाई शुरू हुई है।
बीएनएस की धारा 196: दो समुदायों के बीच नफरत
भारतीय न्याय संहिता की धारा 196 एक अत्यंत गंभीर और गैर-जमानती धारा है। इसका उपयोग तब किया जाता है जब दो समुदायों के बीच नफरत फैलाने की कोशिश की जाती है। यह धारा उन मामलों में लगाई जाती है जहां कोई व्यक्ति किसी विशेष जाति के खिलाफ बड़े षड्यंत्र की साजिश करता है या दो समुदायों के बीच दुश्मनी और वैमनस्य पैदा करने का प्रयास करता है। आमतौर पर पुलिस सांप्रदायिक हिंसा भड़काने के आरोपियों पर यह धारा लगाती है। यदि इस धारा के तहत अपराध सिद्ध हो जाता है, तो अपराधी को कम से कम 3 साल की सजा सुनाई जा सकती है।
बीएनएस की धारा 299: हिंसा भड़काने का आरोप
राहुल गांधी के खिलाफ दर्ज एफआईआर में बीएनएस की धारा 299 भी शामिल है, जो कि गैर-जमानती है। यह धारा तब प्रभावी होती है जब कोई व्यक्ति अपने भाषण, वीडियो या किसी लेख के माध्यम से किसी धर्म या समुदाय के खिलाफ हिंसा भड़काने का प्रयास करता है। इस संदर्भ में इमरान प्रतापगढ़ी बनाम गुजरात सरकार मामले का उल्लेख महत्वपूर्ण है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने साल 2025 में स्पष्ट किया था कि यदि किसी भाषण का व्यापक असर नहीं दिखता है, तो केवल एक व्यक्ति की भावना आहत होने पर इस धारा का उपयोग नहीं किया जा सकता। इस धारा में भी दोषी पाए जाने पर 3 साल की सजा का प्रावधान है।
एससी-एसटी एक्ट की धारा 3(1)(q) की गंभीरता
अमित कुमार के आवेदन पर राहुल गांधी के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट की धारा 3(1)(q) भी लगाई गई है। यह धारा तब लागू होती है जब कोई व्यक्ति किसी दलित या आदिवासी के खिलाफ पुलिस या किसी सरकारी अधिकारी को जानबूझकर ऐसी झूठी जानकारी देता है जिससे उस दलित या आदिवासी पर कानूनी कार्रवाई का खतरा पैदा हो जाए। यह भी एक गैर-जमानती धारा है। इस कानून के तहत दोषी करार दिए जाने पर अपराधी को न्यूनतम 6 महीने की सजा हो सकती है, जबकि अधिकतम सजा की अवधि 5 साल तक हो सकती है। इन धाराओं की प्रकृति को देखते हुए यह मामला कानूनी रूप से काफी पेचीदा हो गया है।