भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFC) की ऋण देने की प्रथाओं पर अपनी निगरानी बढ़ा दी है। केंद्रीय बैंक ने विशेष रूप से उन मामलों पर चिंता व्यक्त की है जहां एनबीएफसी उन ग्राहकों को नया ऋण प्रदान कर रहे हैं जिन्होंने अपने पिछले ऋणों के भुगतान में चूक (डिफॉल्ट) की है। आरबीआई के अधिकारियों के अनुसार, वार्षिक निरीक्षण के दौरान यह पाया गया कि कुछ कंपनियां जोखिम प्रबंधन के मानकों की अनदेखी कर रही हैं। नियामक का प्राथमिक उद्देश्य वित्तीय प्रणाली में 'एवरग्रीनिंग' की प्रथा को रोकना और परिसंपत्ति गुणवत्ता की सटीक रिपोर्टिंग सुनिश्चित करना है।
एवरग्रीनिंग और ऋण पुनर्गठन पर रोक
एवरग्रीनिंग एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें एक वित्तीय संस्थान किसी उधारकर्ता को नया ऋण इसलिए देता है ताकि वह अपने पुराने बकाया ऋण का भुगतान कर सके। अधिकारियों के अनुसार, यह प्रक्रिया बैलेंस शीट पर खराब ऋणों की वास्तविक स्थिति को छिपाने का काम करती है। आरबीआई ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई ऋण 90 दिनों तक बकाया रहता है, तो उसे नियमों के तहत नॉन-परफॉर्मिंग एसेट (NPA) घोषित किया जाना अनिवार्य है। एवरग्रीनिंग के माध्यम से कंपनियां इस वर्गीकरण से बचने का प्रयास करती हैं, जिससे वित्तीय स्थिरता को खतरा हो सकता है। केंद्रीय बैंक ने कम से कम तीन बड़ी एनबीएफसी से इस संबंध में स्पष्टीकरण मांगा है कि उन्होंने डिफॉल्ट करने वाले ग्राहकों को अन्य श्रेणियों, जैसे प्रॉपर्टी या होम लोन के तहत नया कर्ज क्यों दिया।
बोर्ड द्वारा अनुमोदित नीति की अनिवार्यता
आरबीआई ने एनबीएफसी को निर्देश दिया है कि वे डिफॉल्ट कर चुके ग्राहकों को नया ऋण देने के लिए बोर्ड से मंजूर एक व्यापक और स्पष्ट नीति तैयार करें। नियामक ने यह स्पष्ट किया है कि वह नया ऋण देने पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगा रहा है, क्योंकि यह कंपनियों का व्यावसायिक निर्णय हो सकता है। हालांकि, ऐसी नीतियों में उन विशिष्ट परिस्थितियों का उल्लेख होना चाहिए जिनमें नया ऋण दिया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, कंपनियों को यह सुनिश्चित करने के लिए आंतरिक नियंत्रण तंत्र विकसित करना होगा कि नए ऋण का उपयोग पुराने ऋणों को केवल कागजों पर 'स्टैंडर्ड' बनाए रखने के लिए न किया जाए। यह निर्देश उन सभी एनबीएफसी पर लागू होंगे जिनकी नेटवर्थ ₹250 करोड़ से अधिक है।
एनपीए वर्गीकरण और एसएमए श्रेणियां
ऋण खातों की निगरानी के लिए आरबीआई ने सख्त समयसीमा निर्धारित की है और नियमों के अनुसार, ऋण भुगतान में पहली चूक होते ही खाते को स्पेशल मेंशन अकाउंट-0 (SMA-0) के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। यदि भुगतान में 31 से 60 दिनों की देरी होती है, तो इसे SMA-1 और 61 से 90 दिनों की देरी होने पर SMA-2 की श्रेणी में रखा जाता है। 90 दिनों की सीमा पार करने के बाद खाता एनपीए बन जाता है। आरबीआई के अनुसार, एनबीएफसी को इन श्रेणियों के आधार पर अपने जोखिम का पारदर्शी मूल्यांकन करना चाहिए। सूत्रों के मुताबिक, केंद्रीय बैंक इस बात की जांच कर रहा है कि क्या कंपनियां इन श्रेणियों के बीच ऋणों को घुमाकर वास्तविक जोखिम को कम करके दिखा रही हैं।
इंड-एएस और ईसीएल मॉडल का प्रभाव
भारतीय लेखा मानक (IndAS) का पालन करने वाली एनबीएफसी के लिए नियम और भी कड़े हैं। इंड-एएस के तहत 'एक्सपेक्टेड क्रेडिट लॉस' (ECL) मॉडल का उपयोग किया जाता है। इस मॉडल में कंपनियों को ऋण के डिफॉल्ट होने का इंतजार करने के बजाय, ऋण देने के समय से ही संभावित नुकसान का आकलन करना होता है। यदि किसी खाते में 30 दिनों से अधिक की देरी होती है, तो इसे क्रेडिट जोखिम में महत्वपूर्ण वृद्धि माना जाता है और इसके लिए वित्तीय प्रावधान (Provisioning) करना अनिवार्य होता है। आरबीआई का मानना है कि ईसीएल मॉडल और बोर्ड-अनुमोदित नीतियों के एकीकरण से एनबीएफसी क्षेत्र में बेहतर गवर्नेंस और पारदर्शिता सुनिश्चित होगी।
वित्तीय स्थिरता और पारदर्शिता के मानक
आरबीआई का यह कदम गैर-बैंकिंग वित्तीय क्षेत्र में प्रणालीगत जोखिम को कम करने के व्यापक प्रयासों का हिस्सा है। नियामक ने स्पष्ट किया है कि आंतरिक नीतियों की अनुपस्थिति का अर्थ यह नहीं है कि कंपनियां अनियंत्रित तरीके से जोखिम भरे ऋण दे सकती हैं। एनबीएफसी को अब अपने ऋण पोर्टफोलियो की गुणवत्ता पर अधिक ध्यान देना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके पास पर्याप्त पूंजी बफर उपलब्ध है। अधिकारियों के अनुसार, भविष्य में होने वाले निरीक्षणों में इन बोर्ड-अनुमोदित नीतियों के कार्यान्वयन की बारीकी से समीक्षा की जाएगी ताकि वित्तीय क्षेत्र की अखंडता बनी रहे।