रिटायरमेंट के बाद अक्सर लोग यह मान लेते हैं कि अब उनकी नियमित सैलरी बंद हो गई है, तो टैक्स की झंझट भी खत्म हो गई होगी। लेकिन वास्तविकता इससे काफी अलग है। रिटायरमेंट के बाद भी आपकी टैक्स देनदारी पूरी तरह खत्म नहीं होती है। आयकर विभाग की नजर आपकी उन तमाम आय पर रहती है जो आप रिटायरमेंट के बाद विभिन्न स्रोतों से प्राप्त करते हैं। सीनियर सिटीजन के लिए यह समझना बेहद जरूरी है कि उनकी कौन-सी कमाई टैक्स के दायरे में आती है और किन पर उन्हें छूट मिल सकती है। सही जानकारी के अभाव में आईटीआर भरते समय गलती होने और टैक्स विभाग से नोटिस आने का खतरा हमेशा बना रहता है।
1. हर महीने मिलने वाली पेंशन
रिटायरमेंट के बाद मिलने वाली सामान्य यानी अनकम्यूटेड पेंशन आम तौर पर टैक्सेबल होती है। इसे आय के रूप में दिखाना अनिवार्य होता है। लागू नियमों और आपके द्वारा चुने गए टैक्स रिजीम के अनुसार इस पर स्टैंडर्ड डिडक्शन का लाभ भी मिल सकता है। पेंशनभोगी को यह ध्यान रखना चाहिए कि पेंशन की राशि को उनकी कुल वार्षिक आय में जोड़ा जाता है और फिर उस पर टैक्स स्लैब के हिसाब से गणना की जाती है।
2. एफडी और सेविंग्स का ब्याज
वरिष्ठ नागरिक अपनी जमा पूंजी को सुरक्षित रखने के लिए अक्सर बैंक एफडी या बचत खातों का सहारा लेते हैं। सेविंग अकाउंट, एफडी, आरडी, पोस्ट ऑफिस डिपॉजिट और सीनियर सिटीजन स्कीम से मिलने वाला ब्याज आम तौर पर टैक्सेबल होता है। पुराने टैक्स रिजीम में सीनियर सिटीजन को सेक्शन 80TTB के तहत योग्य ब्याज आय पर 50000 रुपये तक की कटौती मिल सकती है। हालांकि, नए टैक्स रिजीम में यह कटौती उपलब्ध नहीं है। इसलिए, निवेश करने से पहले और टैक्स रिटर्न भरते समय यह गणना करना जरूरी है कि आपको कुल कितना ब्याज मिला है।
3. किराये से होने वाली कमाई
अगर रिटायरमेंट के बाद आपने अपनी किसी प्रॉपर्टी जैसे घर या दुकान को किराये पर दिया है, तो उससे होने वाली कमाई भी टैक्स के दायरे में आती है। घर से मिलने वाली किराये की आय पर नियमों के अनुसार 30 प्रतिशत स्टैंडर्ड डिडक्शन का लाभ मिलता है। इसके अलावा कुछ अन्य योग्य कटौतियों का लाभ भी लिया जा सकता है। किराये की आय को छिपाना भारी पड़ सकता है क्योंकि अब विभाग के पास संपत्तियों के लेनदेन और उनसे होने वाली आय का डिजिटल रिकॉर्ड होता है।
4. शेयर और म्यूचुअल फंड से मुनाफा
शेयर, म्यूचुअल फंड, जमीन या दूसरी संपत्ति बेचने पर होने वाला कैपिटल गेन भी टैक्सेबल हो सकता है। टैक्स की दर इस बात पर निर्भर करती है कि संपत्ति किस प्रकार की है और उसे कितने समय तक अपने पास रखा गया था। म्यूचुअल फंड बेचने, स्कीम बदलने या शेयर बेचने के दौरान सही जानकारी आईटीआर में देना बहुत जरूरी है। इन सभी लेनदेन की जानकारी अब एनुअल इंफॉर्मेशन स्टेटमेंट यानी एआईएस में दिखाई देती है, जिससे आयकर विभाग के लिए आपकी आय को ट्रैक करना आसान हो गया है।
5. डिविडेंड और इंश्योरेंस से मिलने वाली पेंशन
शेयरों से मिलने वाला डिविडेंड भी निवेशक की आय माना जाता है और उस पर लागू नियमों के अनुसार टैक्स देना पड़ सकता है। इसी तरह, अगर आपने किसी इंश्योरेंस कंपनी से एन्युटी या पेंशन प्लान लिया है, तो उससे मिलने वाली रकम आम तौर पर उसी साल टैक्सेबल होती है जिस साल वह आपको प्राप्त होती है। वरिष्ठ नागरिकों को अपने निवेश पोर्टफोलियो से मिलने वाले हर लाभांश का हिसाब रखना चाहिए।
6. कंसल्टेंसी या पार्ट-टाइम काम की आय
रिटायरमेंट के बाद कई लोग खाली बैठने के बजाय अपनी विशेषज्ञता का उपयोग कंसल्टेंसी, फ्रीलांसिंग या पार्ट-टाइम प्रोफेशनल काम में करते हैं। इस तरह के काम से होने वाली कमाई पूरी तरह से टैक्सेबल होती है। इसे प्रोफेशनल इनकम के तौर पर आईटीआर में दिखाना होता है। यदि आप इस तरह की गतिविधियों से जुड़े हैं, तो अपनी आय और उससे संबंधित खर्चों का सही रिकॉर्ड रखना आपके लिए फायदेमंद हो सकता है।
7. अन्य स्रोतों से होने वाली आय
इन मुख्य स्रोतों के अलावा भी कुछ ऐसी आय होती है जिस पर टैक्स लग सकता है और एफडी में जमा रकम पर मिलने वाला जमा ब्याज, इनकम टैक्स रिफंड पर मिलने वाला ब्याज, पति या पत्नी को मिलने वाली फैमिली पेंशन और कुछ विशेष निवेश योजनाओं से मिलने वाली टैक्सेबल रकम को भी आईटीआर में सही तरीके से दिखाना जरूरी है। इन सभी छोटी-बड़ी आय को मिलाकर ही आपकी कुल टैक्स देनदारी तय होती है।