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ईरान-अमेरिका तनाव: रूसी तेल निर्यात से प्रतिदिन ₹71 अरब की कमाई

ईरान-अमेरिका तनाव: रूसी तेल निर्यात से प्रतिदिन ₹71 अरब की कमाई
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मध्य पूर्व में ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते सैन्य और कूटनीतिक तनाव के बीच वैश्विक ऊर्जा बाजार में बड़े बदलाव देखे जा रहे हैं। आधिकारिक आंकड़ों और अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इस संघर्ष की स्थिति में रूस के तेल राजस्व में अप्रत्याशित वृद्धि दर्ज की गई है। वर्तमान में रूस कच्चे तेल के निर्यात के माध्यम से प्रतिदिन लगभग ₹71 अरब (760 मिलियन डॉलर) की कमाई कर रहा है। यह पिछले तीन वर्षों में रूस के लिए तेल बिक्री से होने वाली सबसे अधिक दैनिक आय बताई जा रही है।

द टेलीग्राफ की एक रिपोर्ट के अनुसार, मार्च 2026 के दौरान रूस का कुल तेल निर्यात मूल्य 24 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। यूक्रेन संघर्ष के बाद अमेरिका और पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए कड़े प्रतिबंधों के बावजूद, वैश्विक बाजार में आपूर्ति की कमी ने रूसी तेल की मांग को फिर से बढ़ा दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि मध्य पूर्व में अस्थिरता ने ऊर्जा सुरक्षा को लेकर दुनिया भर के देशों की निर्भरता को वैकल्पिक स्रोतों की ओर मोड़ दिया है।

होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यवधान और वैश्विक आपूर्ति

ईरान और अमेरिका के बीच जारी संघर्ष का सबसे बड़ा प्रभाव होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पर पड़ा है। यह जलमार्ग वैश्विक तेल व्यापार के लिए सबसे महत्वपूर्ण मार्गों में से एक है। वर्तमान स्थिति के कारण इस मार्ग से होने वाली जहाजों की आवाजाही काफी हद तक प्रभावित हुई है। खाड़ी देशों से होने वाली तेल की आपूर्ति में बाधा आने के कारण, कई यूरोपीय और एशियाई देशों ने अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए रूस का रुख किया है। अमेरिकी प्रशासन ने भी कुछ विशेष परिस्थितियों में वैश्विक ऊर्जा संकट को टालने के लिए रूसी तेल की खरीद के प्रति लचीला रुख अपनाया है।

कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और रूसी राजस्व

जंग की शुरुआत से पहले रूस अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपने तेल को भारी छूट (Discount) पर बेच रहा था। हालांकि, आपूर्ति श्रृंखला में आए व्यवधानों के बाद अब रूस सामान्य बाजार दरों पर तेल का निर्यात कर रहा है। कीव स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के आंकड़ों के अनुसार, रूसी कच्चे तेल की कीमतें वर्तमान में 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को छू रही हैं। कीमतों में इस वृद्धि और निर्यात की मात्रा में इजाफे ने रूस की तिजोरी में विदेशी मुद्रा के प्रवाह को तेज कर दिया है। यह स्थिति रूसी अर्थव्यवस्था के लिए एक मजबूत सहारा बनकर उभरी है।

भारत और चीन के आयात में रिकॉर्ड वृद्धि

एशियाई बाजार में भारत और चीन रूसी तेल के सबसे बड़े खरीदार बनकर उभरे हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, भारत ने फरवरी 2026 की तुलना में मार्च 2026 में रूस से तेल खरीद की मात्रा में 72 प्रतिशत की वृद्धि करने का निर्णय लिया है। चीन ने भी अपनी रणनीतिक तेल भंडार क्षमता को बढ़ाने के लिए रूस से आयात तेज कर दिया है। इन दोनों देशों द्वारा की जा रही बड़े पैमाने पर खरीदारी ने रूस को पश्चिमी प्रतिबंधों के प्रभाव से उबरने में महत्वपूर्ण मदद प्रदान की है।

रूस और ईरान के बीच सामरिक सहयोग के दावे

फाइनेंशियल टाइम्स की एक रिपोर्ट में पश्चिमी खुफिया अधिकारियों के हवाले से दावा किया गया है कि रूस इस संघर्ष के दौरान ईरान को विभिन्न स्तरों पर सहायता प्रदान कर रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, रूस द्वारा ईरान को खाद्य सामग्री, उन्नत ड्रोन तकनीक और अन्य सैन्य उपकरण भेजे जा रहे हैं। इसके अतिरिक्त, यह भी आरोप लगाए गए हैं कि रूस अपने सैटेलाइट नेटवर्क के माध्यम से प्राप्त रणनीतिक जानकारी ईरान के साथ साझा कर रहा है। हालांकि, रूसी विदेश मंत्रालय ने इन दावों को सिरे से खारिज कर दिया है। रूस का आधिकारिक रुख यह है कि वह केवल मानवीय आधार पर ईरान को दवाएं और आवश्यक वस्तुएं उपलब्ध करा रहा है।

वैश्विक ऊर्जा बाजार पर दीर्घकालिक प्रभाव

ईरान और अमेरिका के बीच 27 दिनों से जारी इस संघर्ष ने न केवल मध्य पूर्व बल्कि यूरोप और दक्षिण एशिया की अर्थव्यवस्थाओं को भी प्रभावित किया है। ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुसार, जब तक होर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से होने वाली आपूर्ति सामान्य नहीं होती, तब तक वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता बनी रहेगी। रूस इस स्थिति का लाभ उठाते हुए अपने ऊर्जा बुनियादी ढांचे को और अधिक सुदृढ़ करने में जुटा है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसियां स्थिति पर बारीकी से नजर रख रही हैं ताकि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को पूरी तरह से ठप होने से बचाया जा सके।

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