दिल्ली के दक्षिण-पश्चिम इलाके सत्य निकेतन में रविवार को एक हृदयविदारक घटना घटी, जब 'हॉस्टल डेज' नामक एक पांच मंजिला पीजी हॉस्टल अचानक ताश के पत्तों की तरह ढह गया। इस हादसे ने पूरे इलाके में दहशत फैला दी, जो दिल्ली यूनिवर्सिटी के साउथ कैंपस का एक प्रमुख छात्र केंद्र है। इमारत के गिरने की आवाज इतनी तेज थी कि आसपास की इमारतों में रहने वाले लोग भूकंप के डर से अपने घरों से बाहर निकल आए। मलबे के ढेर को देखकर स्थानीय लोगों ने तुरंत राहत कार्य शुरू किया और अपने हाथों से कंक्रीट की भारी सिल्लियां हटाने की कोशिश की। इस दर्दनाक हादसे में अब तक 3 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि बचाव दलों ने 11 लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला है।
हॉस्टल डेज पीजी की संरचना और छात्रों की स्थिति
सत्य निकेतन का यह 'हॉस्टल डेज' पीजी बेसमेंट के साथ 5 मंजिला था। इस इमारत के हर फ्लोर पर 4 कमरे बने हुए थे और प्रत्येक कमरे में 2 से 3 छात्र रहते थे। इस हिसाब से एक फ्लोर पर कम से कम 10 छात्र निवास करते थे। इमारत की दूसरी मंजिल पर छात्रों के लिए किचन और मेस की सुविधा भी उपलब्ध थी और दिल्ली यूनिवर्सिटी के साउथ कैंपस के पास होने के कारण यहां कई प्रतिष्ठित कॉलेजों के छात्र रहते थे। इनमें मुख्य रूप से मोतीलाल नेहरू कॉलेज और वेंकेटश्वर कॉलेज के छात्र शामिल थे। इसके अलावा, इस पीजी में जेएमसी कॉलेज, आत्मा राम कॉलेज, दिल्ली कॉलेज ऑफ आर्ट्स एंड कॉमर्स, गार्गी कॉलेज, मैत्री कॉलेज, रामलाल आनंद कॉलेज और आर्यभट्ट कॉलेज के छात्र भी रह रहे थे। रविवार का दिन होने के कारण कई छात्र कॉलेज नहीं गए थे और इमारत के अंदर ही मौजूद थे।
बेसमेंट में निर्माण कार्य और कमजोर नींव का खतरा
हादसे की प्रारंभिक वजह बेसमेंट में चल रहे निर्माण और मरम्मत कार्य को माना जा रहा है और दिल्ली पुलिस में कार्यरत स्थानीय निवासी राजेन छेत्री ने बताया कि इस पीजी में करीब 15 कमरे थे और छात्र हर बेड के लिए लगभग 12000 रुपये किराया दे रहे थे। छेत्री के अनुसार, यहां रहने वाले ज्यादातर छात्र केरल, हरियाणा और उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखते हैं। उन्होंने खुलासा किया कि पिछले कुछ समय से बेसमेंट में मरम्मत का काम चल रहा था, जहां पानी जमा होने की समस्या भी देखी गई थी और राजेन छेत्री, जो पिछले 20 साल से इसी इलाके में रह रहे हैं, ने दावा किया कि इस इमारत की नींव बहुत कमजोर थी। कमजोर नींव के बावजूद बेसमेंट में की जा रही खुदाई या निर्माण ने पूरी संरचना को अस्थिर कर दिया, जिससे यह भीषण हादसा हुआ।
राहत और बचाव कार्य का विवरण
हादसे की सूचना मिलते ही प्रशासन हरकत में आया। साउथ कैंपस पुलिस स्टेशन को दोपहर 1 बजकर 34 मिनट पर एक पीसीआर कॉल प्राप्त हुई थी। इसके तुरंत बाद 8 फायर टेंडर और कई रेस्क्यू टीमों को मौके पर रवाना किया गया। स्थानीय निवासियों ने बताया कि इमारत गिरने से पहले उन्हें अपने घरों में हल्का झटका महसूस हुआ, जैसे भूकंप आया हो। जब तक सरकारी टीमें पहुंचती, स्थानीय लोगों ने खुद ही मलबे में फंसे लोगों को ढूंढना शुरू कर दिया था और प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि बगल वाली इमारत भी इस हादसे के बाद खतरे में दिख रही है और वह थोड़ी झुक गई है। बताया जा रहा है कि जब इमारत गिरी, तब ऊपरी मंजिलों पर लगभग 35 से 40 छात्र मौजूद थे, जिनमें से कुछ सो रहे थे।
प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और बाल-बाल बचे लोग
इस हादसे में कई लोग मौत के मुंह से बाल-बाल बचे। एक निवासी ने बताया कि वह इमारत गिरने से महज कुछ मिनट पहले ही बाहर निकला था, जिससे उसकी जान बच गई, हालांकि उसे मामूली चोटें आई हैं। " एक अन्य निवासी ने अपने भतीजे का अनुभव साझा करते हुए बताया कि उसका भतीजा अपनी बाइक से इमारत के पास से गुजरा ही था कि जोरदार धमाके के साथ स्ट्रक्चर गिर गया। उसके भतीजे ने कहा कि यह महज कुछ ही सेकंड की बात थी, वरना वह भी मलबे के नीचे होता। रविवार की छुट्टी होने के कारण पीजी के अंदर छात्रों की मौजूदगी अधिक थी, जिससे खतरा और बढ़ गया था।
रखरखाव की कमी और अवैध निर्माण पर सवाल
सत्य निकेतन में हुई इस घटना ने इलाके की पुरानी इमारतों की सुरक्षा पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि कई पुराने घरों को पीजी में बदल दिया गया है और उनके मालिक अब वहां नहीं रहते। वे केवल ऑनलाइन किराया वसूलते हैं और इमारतों के रखरखाव पर कोई ध्यान नहीं देते। 'हॉस्टल डेज' की यह इमारत 20 साल से भी ज्यादा पुरानी थी और पिछले कई वर्षों से इसमें कोई मेंटेनेंस का काम नहीं देखा गया था। निवासियों का दावा है कि सत्य निकेतन में मुश्किल से 30 प्रतिशत मकान मालिक खुद रहते हैं, बाकी सब पीजी के रूप में चल रहे हैं। इलाके में खुले गटर और सीवर की समस्या भी आम है। अब स्थानीय लोग मांग कर रहे हैं कि रिहायशी इलाकों में बेसमेंट वाली पांच मंजिला इमारतों के स्ट्रक्चरल वेरिफिकेशन की जांच की जाए और यह पता लगाया जाए कि क्या ऐसे निर्माणों की अनुमति दी जानी चाहिए थी।