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शेयर बाजार में कोहराम: सेंसेक्स 1000 अंक टूटा, ईरान-अमेरिका समझौते पर संशय से बिगड़ा मूड

शेयर बाजार में कोहराम: सेंसेक्स 1000 अंक टूटा, ईरान-अमेरिका समझौते पर संशय से बिगड़ा मूड
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भारतीय शेयर बाजार के लिए गुरुवार का कारोबारी सत्र भारी बिकवाली का गवाह बना। पिछले पांच लगातार सत्रों से जारी तेजी पर अचानक ब्रेक लग गया और प्रमुख सूचकांक लाल निशान में बंद हुए। बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) का सेंसेक्स दिन के निचले स्तर पर पहुंचते हुए करीब 1000 अंक तक लुढ़क कर 76,558 के स्तर पर आ गया। वहीं, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) का निफ्टी भी 255 अंकों की गिरावट के साथ 23,740 के स्तर से नीचे खिसक गया। इस गिरावट के कारण निवेशकों की संपत्ति में भारी कमी आई है। बाजार में आईटी और इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र के शेयरों में सबसे ज्यादा दबाव देखा गया, जिसमें इंफोसिस, एचसीएल टेक और एलएंडटी जैसे बड़े नाम शामिल रहे।

शांति समझौते पर अनिश्चितता और भू-राजनीतिक तनाव

बाजार की इस बड़ी गिरावट का प्राथमिक कारण ईरान और अमेरिका के बीच प्रस्तावित युद्धविराम को लेकर पैदा हुआ संशय है। शुरुआती खबरों में शांति समझौते की उम्मीद जताई गई थी, जिससे वैश्विक बाजारों में राहत देखी गई थी। हालांकि, हालिया घटनाक्रमों ने स्थिति को फिर से तनावपूर्ण बना दिया है। ईरान ने अमेरिका और इजराइल पर समझौते की शर्तों के उल्लंघन का आरोप लगाया है। इजराइल द्वारा लेबनान में हिजबुल्लाह के खिलाफ सैन्य अभियान जारी रखने से स्थिति और जटिल हो गई है। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz), जो वैश्विक व्यापार के लिए एक महत्वपूर्ण मार्ग है, अभी भी पूरी तरह से नहीं खुला है और इसके अतिरिक्त, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की चेतावनी ने बाजार में अनिश्चितता को और बढ़ा दिया है।

कच्चे तेल की कीमतों में दोबारा उछाल

मध्य पूर्व में जारी तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में एक बार फिर तेजी देखी जा रही है। युद्धविराम की चर्चाओं के बीच ब्रेंट क्रूड की कीमतें जो गिरकर 95 डॉलर प्रति बैरल के नीचे आ गई थीं, वे अब दोबारा बढ़ने लगी हैं। 70 डॉलर और WTI क्रूड 3% की बढ़त के साथ 97 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गया है। भारत अपनी तेल जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि सीधे तौर पर भारतीय अर्थव्यवस्था और शेयर बाजार की धारणा को प्रभावित करती है।

विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की निरंतर बिकवाली

दलाल स्ट्रीट पर विदेशी संस्थागत निवेशकों की लगातार बिकवाली ने बाजार के मनोबल को कमजोर किया है और आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, विदेशी निवेशक पिछले 26 कारोबारी सत्रों से लगातार अपने शेयर बेच रहे हैं। केवल बुधवार को ही उन्होंने करीब ₹2,812 करोड़ मूल्य के शेयर बेचे। हालांकि घरेलू संस्थागत निवेशक (DII) खरीदारी के जरिए बाजार को संभालने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन विदेशी पूंजी की निरंतर निकासी ने सूचकांकों पर भारी दबाव बना दिया है। वैश्विक स्तर पर बढ़ती ब्याज दरों और भू-राजनीतिक जोखिमों के कारण निवेशक उभरते बाजारों से पैसा निकाल रहे हैं।

वैश्विक बाजारों का दबाव और रुपये की कमजोरी

भारतीय बाजार पर वैश्विक संकेतों का भी नकारात्मक प्रभाव पड़ा है और जापान का निक्केई, हांगकांग का हैंगसेंग और चीन का शंघाई कंपोजिट जैसे प्रमुख एशियाई बाजार लाल निशान में बंद हुए। इसके साथ ही, अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये में भी गिरावट दर्ज की गई है। 70 के स्तर पर आ गया। रुपये की कमजोरी से आयात महंगा हो जाता है, जो कॉर्पोरेट मुनाफे पर असर डालता है और वैश्विक अनिश्चितता के इस दौर में निवेशक सुरक्षित निवेश के विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे इक्विटी बाजारों में बिकवाली बढ़ गई है।

ऊंचे स्तरों पर मुनाफावसूली का प्रभाव

बाजार में गिरावट की एक अन्य वजह मुनाफावसूली (Profit Booking) भी रही। अप्रैल के शुरुआती पांच दिनों में सेंसेक्स में 5,600 से अधिक अंकों यानी करीब 8% की शानदार तेजी देखी गई थी। बाजार के रिकॉर्ड स्तरों के करीब पहुंचने पर निवेशकों ने अपना मुनाफा सुरक्षित करने के लिए बिकवाली शुरू कर दी। विशेष रूप से आईटी इंडेक्स में 1% से अधिक की गिरावट दर्ज की गई। विशेषज्ञों के अनुसार, जब बाजार कम समय में बड़ी बढ़त हासिल करता है, तो तकनीकी रूप से सुधार की संभावना बढ़ जाती है। वर्तमान में भू-राजनीतिक खबरों ने इस सुधार की प्रक्रिया को और तेज कर दिया है।

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