आनंद एल राय की नई फिल्म 'तेरे इश्क में' सिनेमाघरों में दस्तक दे चुकी है, और एक बार फिर निर्देशक ने मोहब्बत के मुश्किल रास्तों पर कदम रखा है और 'रांझणा' जैसी क्लासिक फिल्म देने के बाद, उनकी पिछली कुछ फिल्में बॉक्स ऑफिस पर उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पाई थीं। ऐसे में, 'तेरे इश्क में' के साथ राय साहब ने एक नई और संभली हुई कहानी। पेश करने की कोशिश की है, जो प्यार, जुनून और बदले की आग में सुलगती है।
एक जटिल प्रेम कहानी का ताना-बाना
'तेरे इश्क में' एक सामान्य प्रेम कहानी से कहीं बढ़कर है। यह जुनून, बदला और भावनात्मक उथल-पुथल की एक तेज रफ्तार और दिलचस्प गाथा है। आनंद एल राय ने इस बार कहानी में मसाला के साथ-साथ इमोशन और ड्रामा का दमदार तड़का लगाया है। फिल्म की कहानी शंकर (धनुष) और मुक्ति (कृति सेनन) के इर्द-गिर्द घूमती है। मुक्ति एक पढ़ी-लिखी लड़की है, जिसके पिता एक आईएएस अधिकारी हैं। वह कॉलेज में एक रिसर्च स्कॉलर है, और उसकी थीसिस का विषय है कि कैसे एक हिंसक इंसान के अंदर से हिंसा को स्थायी रूप से बाहर निकाला जा सकता है और इस थीसिस के लिए उसे एक 'टेस्ट केस' की तलाश रहती है, और यहीं उसकी मुलाकात शंकर से होती है।
शंकर और मुक्ति का अनोखा रिश्ता
शंकर दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ का अध्यक्ष है, लेकिन देखा जाए तो वह एक बेरोजगार, गुंडागर्दी करने वाला और गुस्सैल इंसान है। मुक्ति उसे अपना 'टेस्ट केस' बनाती है, लेकिन इस प्रक्रिया में शंकर मुक्ति से इश्क कर बैठता है। यह इश्क दोनों की जिंदगी में क्या तूफान लेकर आता है, यही फिल्म का मुख्य कथानक है। फिल्म की शुरुआत शानदार है, जहां शंकर और मुक्ति की केमिस्ट्री एकदम ताजी मोहब्बत जैसी लगती है। उनके हल्के-फुल्के पल और नॉस्टैल्जिया वाला फील दर्शकों को बांधे रखता है। ट्रेलर में दिखाया गया वह सीन, जब शंकर ने मुक्ति के हाथ से। खुद को थप्पड़ मारा था, फिल्म के सबसे पावरफुल मोमेंट्स में से एक है।
जुनून और बदले की आग
जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, प्रेम कहानी की जगह जुनून की आग दिखती है। शंकर जब खुद को बर्बाद करने पर उतरता है, तब आनंद एल राय स्क्रीन पर एक विस्फोट कर देते हैं और प्यार, धोखा और बदला—ये सब मिलकर एक ऐसा दर्दनाक चक्रव्यूह बनाते हैं, जिसमें दर्शक कई बार खो भी जाता है। फिल्म एकतरफा प्यार की अवधारणा को छूती है, लेकिन 'रांझणा' जैसी सादगी इसमें नहीं है। लेखक हिमांशु शर्मा और नीरज यादव ने आनंद एल राय के साथ मिलकर। एक अच्छी फिल्म पेश की है, जो दर्शकों को सोचने पर मजबूर करती है।
निर्देशन, संगीत और तकनीकी पहलू
आनंद एल राय ने हमेशा की तरह इस बार भी एक अच्छी फिल्म बनाई है। उन्हें धनुष जैसे दमदार एक्टर को कैसे इस्तेमाल करना है, यह बखूबी आता है। फिल्म की सिनेमैटोग्राफी कमाल की है, जो रोमांस हो या ट्रेजेडी, हर सीन को खूबसूरती से दिखाती है। एआर रहमान का संगीत इस फिल्म की जान है और टाइटल ट्यून सीधा दिल में उतरती है और लंबे समय तक याद रहती है। हालांकि, बाकी गाने कुछ खास यादगार नहीं हैं, पर बैकग्राउंड स्कोर इमोशंस को बहुत सपोर्ट करता है और हालांकि, फिल्म के नैरेटिव में कुछ टेढ़ापन है और एडिटिंग में कुछ खामियां हैं। कुछ सीन बेवजह लंबे खींचे गए हैं, जिससे कहानी का फ़्लो टूटता है।
दमदार अभिनय का प्रदर्शन
धनुष ने शंकर के किरदार में आग लगा दी है। प्यार, गुस्सा, दर्द, बदला—ये सारे इमोशन वह अपनी आंखों से पूरी ईमानदारी से बयां करते हैं। उनके इमोशनल टॉर्चर को देखकर दर्शक भी दर्द महसूस करते हैं। अपनी पॉवरफुल परफॉर्मेंस से वह दर्शकों का दिल जीत लेते हैं और कृति सेनन ने भी धनुष को जबरदस्त टक्कर दी है। उनका किरदार और उसके लिए जरूरी बॉडी लैंग्वेज एकदम परफेक्ट है और प्रकाश राज जैसे मंझे हुए कलाकारों का काम ठोस है, लेकिन कुछ किरदारों को पूरा लिखने का मौका नहीं मिला, जिससे वे अधूरे से लगते हैं। मोहम्मद जीशान अय्यूब का पुजारी वाला किरदार, जो 'मुक्ति' नाम पर मजाक करता है और 'हर हर महादेव' करता है, वह मजेदार लेकिन थोड़ा अटपटा लगता है। जीशान जैसे एक्टर्स से और भी बहुत कुछ कराया जा सकता था।
देखें या नहीं?
धनुष और कृति की शानदार केमिस्ट्री के लिए यह फिल्म देखी जा सकती है और इसमें रूटीन मसाला नहीं है, बल्कि यह कहानी आपको सोचने पर मजबूर करती है कि क्या वाकई प्यार में इतनी ताकत होती है। अगर आप रोजमर्रा की भागमभाग वाली बॉलीवुड फिल्मों से ऊब चुके हैं, तो यह एक अलग हटकर पेशकश है और हालांकि, अगर आपको पेचीदा प्रेम कहानियां पसंद नहीं हैं, तो आप इसे छोड़ सकते हैं। फिल्म जरूरत से ज्यादा लंबी है और बीच-बीच में सुस्त पड़ जाती है, जिससे बोरियत आ सकती है। फिल्म कई सवालों का ठोस जवाब नहीं देती, जिससे थोड़ा अधूरापन भी महसूस होता है।
'रांझणा' से कितनी अलग है 'तेरे इश्क में'?
'रांझणा' एक अधूरी लेकिन सीधी प्रेम कहानी थी, जिसमें कुंदन का प्यार भोला-भाला और दिल को छूने वाला था। वह सिर्फ एकतरफा आशिकी थी, जिसमें इमोशन की गहराई थी। 'तेरे इश्क में' थोड़ी पेचीदा है और यहां भी एकतरफा प्यार है, लेकिन शुरुआत में यह आशिकी का मामला नहीं, बल्कि साइंस का एक्सपेरिमेंट है। शंकर का प्यार सिर्फ प्यार नहीं, बल्कि जुनून की आग है और आनंद एल राय ने इस बार कहानी को सीधा न रखकर खूब घुमाया है, जिसमें बदला और दिमाग का खेल ज्यादा है। 'रांझणा' अगर सीधा-सादा इश्क था, तो 'तेरे इश्क में' कॉम्प्लिकेटेड मोहब्बत है। कुल मिलाकर, 'तेरे इश्क में' एक सशक्त रोमांटिक ड्रामा है, जिसमें जुनून की गहराई है। इसे देखकर आप चुपचाप नहीं बैठ पाएंगे, बल्कि दोस्तों से इस पर बहस करेंगे। इसे देखिए, इस पर सोचिए और शायद इस इश्क की आग में थोड़ा सा जल भी जाइए!