तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) इस समय अपने राजनीतिक इतिहास के सबसे कठिन और चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रही है। पार्टी के एक और महत्वपूर्ण राज्यसभा सांसद ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है, जिसे ममता बनर्जी के लिए एक बहुत बड़ा व्यक्तिगत और राजनीतिक झटका माना जा रहा है। प्रकाश चिक बाराइक ने राज्यसभा से अपना इस्तीफा सौंप दिया है, जिससे पार्टी के भीतर मची खलबली अब पूरी तरह से सतह पर आ गई है। यह हाल के दिनों में पार्टी छोड़ने वाले तीसरे राज्यसभा सांसद हैं, जो यह दर्शाता है कि संगठन के भीतर असंतोष की जड़ें कितनी गहरी हो चुकी हैं। प्रकाश चिक बाराइक के इस बड़े कदम के बाद, राज्यसभा में टीएमसी के सांसदों की संख्या अब घटकर केवल 10 रह जाएगी।
राज्यसभा में घटती ताकत और इस्तीफों का सिलसिला
राज्यसभा में तृणमूल कांग्रेस की स्थिति लगातार कमजोर होती जा रही है। एक समय था जब उच्च सदन में टीएमसी के पास 13 सांसदों की मजबूत टीम हुआ करती थी, लेकिन अब यह संख्या घटकर 10 पर सिमट गई है। इस्तीफों का यह सिलसिला 8 जून को शुरू हुआ था, जब वरिष्ठ नेता सुखेंदु शेखर रॉय ने अपना इस्तीफा देकर सबको चौंका दिया था। इसके ठीक दो दिन बाद, 10 जून को सुष्मिता देव ने भी ममता बनर्जी का साथ छोड़ दिया और राज्यसभा से अपना इस्तीफा दे दिया। आज यानी 11 जून को प्रकाश चिक बाराइक के इस्तीफे ने पार्टी की मुश्किलों को और अधिक बढ़ा दिया है। राजनीतिक गलियारों में चल रही चर्चाओं और सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, यह सिलसिला अभी थमने वाला नहीं है। बताया जा रहा है कि आने वाले एक हफ्ते के भीतर टीएमसी के तीन और राज्यसभा सांसद अपने पदों से इस्तीफा दे सकते हैं, जिससे पार्टी की संसदीय ताकत और भी कम हो सकती है।
लोकसभा सांसदों की बगावत और संगठन पर मंडराता संकट
टीएमसी के भीतर चल रहा यह गहरा संकट केवल राज्यसभा तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर लोकसभा में भी साफ देखा जा सकता है। पार्टी की नींव इस समय हिलती हुई नजर आ रही है क्योंकि लोकसभा में भी भारी विरोध और बगावत के स्वर उठ रहे हैं। खबरों के मुताबिक, टीएमसी के 10 से ज्यादा लोकसभा सांसद इस समय बागी रुख अपनाए हुए हैं और नेतृत्व से खुश नहीं हैं। इन बागी सांसदों की सूची में काकोली और सयानी घोष जैसे प्रभावशाली नाम शामिल हैं। सयानी घोष का मामला विशेष रूप से चर्चा का विषय बना हुआ है क्योंकि वह कभी ममता बनर्जी की सबसे मुखर समर्थकों में से एक थीं और उन्होंने सार्वजनिक रूप से ममता बनर्जी को 2029 के चुनावों में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश किया था। अब उनके भी पार्टी छोड़ने की खबरें जोरों पर हैं। इन बागी सांसदों ने हाल ही में दिल्ली में भाजपा के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव से मुलाकात की है। इस महत्वपूर्ण बैठक के दौरान बंगाल के कद्दावर नेता शुभेंदु अधिकारी भी वहां मौजूद थे, जो राज्य की राजनीति में किसी बड़े उलटफेर की ओर इशारा कर रहा है।
सत्ता जाने के बाद बिखरती पार्टी और ममता की चुनौती
पश्चिम बंगाल में लगातार 15 साल तक एकछत्र राज करने वाली तृणमूल कांग्रेस के सामने अब अपने अस्तित्व और संगठन को बचाने की सबसे बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। सत्ता से बाहर होने के बाद पार्टी धीरे-धीरे बिखरती जा रही है और खंड-खंड हो रही है और जो नेता कभी ममता बनर्जी के साये की तरह उनके साथ रहते थे और जिन्होंने राजनीति का ककहरा 'दीदी' से ही सीखा था, वे अब एक-एक करके उनका साथ छोड़ रहे हैं। राजनीति के इस अनिश्चित खेल में ममता बनर्जी ने शायद कभी इस बात की कल्पना भी नहीं की होगी कि वह इस कदर अकेली पड़ जाएंगी। पार्टी और संगठन को पूरी तरह टूटने से बचाना अब ममता बनर्जी के लिए एक अग्निपरीक्षा बन गया है। जिस तरह से पुराने वफादार और करीबी नेता बागी हो रहे हैं, उससे टीएमसी के भविष्य पर अनिश्चितता के बादल मंडराने लगे हैं। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि ममता बनर्जी इस बिखराव को रोकने में सफल होती हैं या पार्टी का यह पतन जारी रहता है।