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केंद्र ने केरल का नाम 'केरलम' करने के प्रस्ताव को दी मंजूरी

केंद्र ने केरल का नाम 'केरलम' करने के प्रस्ताव को दी मंजूरी
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मंगलवार को केरल राज्य का नाम बदलकर 'केरलम' करने के राज्य सरकार के प्रस्ताव को औपचारिक मंजूरी दे दी है। यह निर्णय राज्य की भाषाई और सांस्कृतिक पहचान को आधिकारिक स्तर पर स्थापित करने के उद्देश्य से लिया गया है और केंद्र सरकार के इस कदम का विभिन्न राजनीतिक दलों ने स्वागत किया है, हालांकि कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने इस बदलाव के साथ आने वाली भाषाई चुनौतियों की ओर ध्यान आकर्षित किया है। यह निर्णय उस समय आया है जब राज्य सरकार ने केंद्र से संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल सभी भाषाओं में राज्य का नाम 'केरलम' करने का आग्रह किया था।

कैबिनेट का निर्णय और प्रधानमंत्री की प्रतिक्रिया

केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में केरल सरकार द्वारा भेजे गए प्रस्ताव पर विस्तृत चर्चा के बाद इसे स्वीकृति दी गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस निर्णय की जानकारी साझा करते हुए कहा कि यह कदम केरल के लोगों की लंबे समय से चली आ रही इच्छाओं और उनकी सांस्कृतिक विरासत का सम्मान करता है। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, राज्य सरकार ने पूर्व में विधानसभा में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया था। प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया पर उल्लेख किया कि यह निर्णय राज्य की विशिष्ट पहचान को सुदृढ़ करेगा और स्थानीय भावनाओं के अनुरूप है।

शशि थरूर की भाषाई चिंताएं और सवाल

तिरुवनंतपुरम से कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने केंद्र के इस फैसले की सराहना की है, लेकिन उन्होंने एक महत्वपूर्ण भाषाई प्रश्न भी खड़ा किया है। थरूर ने सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि 'केरलम' नाम अपनाना स्वागत योग्य है, लेकिन उन्होंने अंग्रेजी बोलने वाले समुदाय (एंग्लोफोन्स) के लिए एक दुविधा व्यक्त की। उन्होंने सवाल किया कि अब राज्य के निवासियों के लिए 'Keralite' और 'Keralan' जैसे शब्दों का क्या होगा। थरूर ने मजाकिया लहजे में टिप्पणी की कि 'केरलमाइट' (Keralamite) शब्द किसी सूक्ष्म जीव (microbe) जैसा लगता है और 'केरलमियन' (Keralamian) किसी दुर्लभ खनिज जैसा प्रतीत होता है। उन्होंने सुझाव दिया कि मुख्यमंत्री को इन नए शब्दों के चयन के लिए एक प्रतियोगिता आयोजित करनी चाहिए।

संवैधानिक प्रक्रिया और आगामी विधायी कदम

कैबिनेट से मंजूरी मिलने के बाद अब इस बदलाव को कानूनी रूप देने के लिए एक निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया का पालन किया जाएगा। आधिकारिक जानकारी के अनुसार, राष्ट्रपति अब 'केरल (नाम परिवर्तन) विधेयक, 2026' को केरल राज्य विधानसभा को उनके विचार जानने के लिए भेजेंगी। इसके बाद, राज्य विधानसभा की प्रतिक्रिया प्राप्त होने पर केंद्र सरकार संसद में इस विधेयक को पेश करने के लिए राष्ट्रपति की सिफारिश प्राप्त करेगी। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत किसी राज्य के नाम में परिवर्तन के लिए संसद की मंजूरी अनिवार्य होती है। इस प्रक्रिया के पूर्ण होने के बाद ही आधिकारिक दस्तावेजों और गजट में 'केरल' का स्थान 'केरलम' ले लेगा।

सत्ता पक्ष की प्रतिक्रिया और सांस्कृतिक गौरव

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इस निर्णय का स्वागत करते हुए इसे राज्य की विरासत की प्रामाणिकता को प्रकट करने वाला कदम बताया। उन्होंने कहा कि 'केरलम' नाम राज्य के गौरव को बरकरार रखेगा और यह लोगों की लंबे समय से चली आ रही मांग की पूर्ति है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने भी इस फैसले को औपनिवेशिक युग के अवशेषों से आगे बढ़ने का एक प्रयास बताया। उन्होंने कहा कि यह निर्णय 'विकास भी, विरासत भी' की भावना को मजबूत करता है और भारत की सभ्यता की जड़ों में गौरव बहाल करने के राष्ट्रीय संकल्प को दर्शाता है। नेताओं के अनुसार, यह बदलाव केवल नाम तक सीमित नहीं है बल्कि यह भाषाई पहचान का सम्मान है।

नाम परिवर्तन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

केरल को मलयालम भाषा में 'केरलम' कहा जाता है, लेकिन अन्य भाषाओं और आधिकारिक अंग्रेजी दस्तावेजों में इसे 'केरल' के रूप में दर्ज किया गया था। राज्य सरकार का तर्क रहा है कि 'केरलम' शब्द की उत्पत्ति मलयालम भाषा के मूल से हुई है और इसे सभी आधिकारिक स्तरों पर एक समान किया जाना चाहिए। केरल विधानसभा ने इससे पहले भी इस संबंध में प्रस्ताव पारित किए थे, जिसमें केंद्र सरकार से संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत आवश्यक संशोधन करने की मांग की गई थी। अब कैबिनेट की मंजूरी के साथ इस प्रक्रिया ने अंतिम चरण में प्रवेश कर लिया है।

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