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अमेरिका ईरान शांति समझौता: 19 जून को जेनेवा में होगा ऐतिहासिक हस्ताक्षर

अमेरिका ईरान शांति समझौता: 19 जून को जेनेवा में होगा ऐतिहासिक हस्ताक्षर
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मध्य पूर्व की कूटनीतिक स्थिति में एक ऐतिहासिक मोड़ आने वाला है क्योंकि अमेरिका और ईरान शुक्रवार, 19 जून 2026 को एक महत्वपूर्ण शांति प्रस्ताव पर अंतिम हस्ताक्षर करने के लिए तैयार हैं। दोनों देशों के बीच इस शांति प्रस्ताव पर डिजिटल रूप से पहले ही सहमति बन चुकी है और अब जेनेवा में इस पर औपचारिक मुहर लगाई जाएगी। यह घटनाक्रम ऐसे समय में हो रहा है जब लेबनान पर इजरायली हमलों ने क्षेत्र में तनाव बढ़ा दिया है और ईरान की ओर से डोनाल्ड ट्रंप के आश्वासनों पर पूरी तरह भरोसा न कर पाने की खबरें भी सामने आ रही हैं। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जी-7 देशों ने इस शांति पहल का एक सुर में स्वागत किया है और इसे परमाणु प्रसार रोकने की दिशा में एक बड़ा अवसर माना है।

लेबनान में इजरायली ड्रोन हमले और तनाव

शांति समझौते की तैयारियों के बीच लेबनान से आ रही खबरें चिंता का विषय बनी हुई हैं। लेबनान की नेशनल न्यूज एजेंसी (NNA) के अनुसार, मंगलवार को हुए इजरायली ड्रोन हमलों में कम से कम 4 लोगों की मौत हो गई। इन हमलों में "डबल-टैप" रणनीति का इस्तेमाल किया गया, जिसमें पहले मायफाडौन गांव में एक कार को निशाना बनाया गया। जब स्थानीय लोग वहां मदद के लिए इकट्ठा हुए, तो उसी स्थान पर दूसरा हमला किया गया, जिससे 2 लोगों की जान चली गई। इसके अतिरिक्त, शौकिन शहर में हुए एक अन्य ड्रोन हमले में 2 और लोगों की मौत की पुष्टि हुई है। इन सैन्य कार्रवाइयों ने प्रस्तावित शांति डील के माहौल को संवेदनशील बना दिया है, विशेष रूप से तब जब ईरान अमेरिकी नेतृत्व की बातों पर संदेह व्यक्त कर रहा है।

शांति समझौते की मुख्य शर्तें और समयसीमा

अल-अरबिया की रिपोर्ट के अनुसार, इस समझौते के तहत दोनों देशों ने कई महत्वपूर्ण कदम उठाने पर सहमति जताई है। समझौते के अनुसार, अमेरिका ईरान पर लगी अपनी नौसैनिक नाकेबंदी को तत्काल प्रभाव से हटा लेगा। इसके साथ ही, अमेरिका ईरानी समुद्री रास्तों में अपनी उस गतिविधि को बंद कर देगा जिसे वह अब तक दखलअंदाजी कहता रहा है। समझौते में यह भी प्रावधान है कि अंतिम हस्ताक्षर होने के 1 महीने के भीतर अमेरिकी सेनाएं उस क्षेत्र से वापस बुला ली जाएंगी। इसके बदले में, ईरान भी 1 महीने के भीतर होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को फिर से खोलने के लिए प्रतिबद्ध है। इससे दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक पर जहाजों की आवाजाही पूरी तरह बहाल हो जाएगी, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत आवश्यक है।

अमेरिकी उपराष्ट्रपति का कड़ा रुख

अमेरिकी उपराष्ट्रपति वेंस ने इस समझौते पर अमेरिका का पक्ष स्पष्ट करते हुए कहा कि ईरान को इस डील से "असली फायदे" तभी मिल सकते हैं जब वे अपने व्यवहार में बुनियादी बदलाव लाएं। वेंस के अनुसार, यह समझौता बहुत सीधा है और इसके तीन मुख्य स्तंभ हैं। पहला, ईरान के पास परमाणु हथियार नहीं हो सकते। दूसरा, होर्मुज जलडमरूमध्य को अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए खुला रखना होगा। तीसरा, यदि ईरान सही व्यवहार करता है, तो उसे कई आर्थिक और कूटनीतिक लाभ दिए जा सकते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि ईरान आतंकवाद को फंड देना बंद कर देता है और परमाणु हथियार कार्यक्रम को फिर से शुरू करने में मदद करना बंद कर देता है, तो ही उसे लाभ मिलेगा। वेंस ने जोर देकर कहा कि यदि वे ऐसा नहीं करते हैं, तो उन्हें कुछ भी हासिल नहीं होगा और दोनों ही स्थितियों में अमेरिका की जीत सुनिश्चित है।

जी-7 का समर्थन और सैन्य कमान का नया नाम

जी-7 देशों के नेताओं ने अमेरिका और ईरान के बीच हुई इस डील का पुरजोर समर्थन किया है। उन्होंने इसे एक "बड़ी कामयाबी" करार देते हुए कहा कि यह ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने का एक सुनहरा मौका है। जी-7 नेताओं ने मांग की है कि होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही बिना किसी रोक-टोक या टोल के होनी चाहिए। उन्होंने एक व्यापक कूटनीतिक समझौते का समर्थन किया है ताकि पूरे क्षेत्र में शांति और सुरक्षा बनी रहे। इसी बीच, अमेरिकी युद्ध विभाग ने एक प्रशासनिक बदलाव की घोषणा की है, जिसके तहत अमेरिकी इंडो-पैसिफिक कमांड (USINDOPACOM) का नाम बदलकर अब आधिकारिक तौर पर अमेरिकी प्रशांत कमांड (USPACOM) कर दिया जाएगा।

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