मध्य पूर्व में जारी अमेरिका और ईरान के बीच का संघर्ष अब एक नए और गंभीर मोड़ पर पहुंच गया है। मिसाइलों और ड्रोनों के हमलों के बीच अब अमेरिकी सैन्य ठिकाने, खुफिया नेटवर्क और वहां तैनात हजारों सैनिकों की सुरक्षा पर बड़ा सवालिया निशान लग गया है। ईरान की ओर से बढ़ते खतरों को देखते हुए अमेरिका अब अपनी सैन्य तैनाती और खुफिया क्षमताओं की गहराई से समीक्षा कर रहा है। 6 सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, यह चर्चा बेहद गोपनीय तरीके से की जा रही है ताकि भविष्य की चुनौतियों का सामना किया जा सके। अमेरिका अब अपने सैन्य और खुफिया नेटवर्क को सुरक्षित करने के लिए कुछ ठिकानों को कम करने या उनके स्वरूप में बदलाव करने पर भी विचार कर रहा है।
सैन्य मौजूदगी और सैनिकों की संख्या
मिडिल ईस्ट में अमेरिका की सैन्य उपस्थिति काफी व्यापक और पुरानी है और आंकड़ों के अनुसार, इस क्षेत्र में वर्तमान में लगभग 50000 अमेरिकी सैनिक सक्रिय रूप से तैनात हैं। इन सैनिकों में एयर डिफेंस यूनिट्स, नौसैनिक बल और अन्य महत्वपूर्ण सैन्य कर्मी शामिल हैं और कतर में स्थित अल-उदीद एयर बेस, बहरीन में अमेरिकी नौसेना की मौजूदगी, और कुवैत व जॉर्डन में बने सैन्य प्रतिष्ठान अमेरिकी अभियानों के लिए रीढ़ की हड्डी माने जाते हैं। हालांकि, मौजूदा संघर्ष ने इन रणनीतिक ठिकानों को न केवल ताकत का केंद्र बनाया है, बल्कि इन्हें संभावित कमजोर लक्ष्य के रूप में भी उजागर कर दिया है। अमेरिका की यह स्थायी सैन्य और खुफिया सुविधाओं का नेटवर्क 11 सितंबर साल 2001 में हुए हमलों के बाद फैलाया गया था, जिसमें इराक, अफगानिस्तान, सीरिया, ईरान, यमन और लीबिया जैसे देश शामिल थे।
बढ़ता खतरा और भूमिगत ठिकानों की योजना
अमेरिकी प्रशासन की चिंता तब और बढ़ गई जब ईरान ने मिडिल ईस्ट में स्थित अमेरिकी ठिकानों पर कई हमले किए और इन हमलों में अब तक 18 अमेरिकी सैनिक मारे जा चुके हैं। इन घटनाओं ने अमेरिकी बुनियादी ढांचे की कमजोरियों को दुनिया के सामने ला दिया है। विशेष रूप से जुलाई में जॉर्डन में हुए एक हमले में 2 अमेरिकी सैन्यकर्मियों की मौत हो गई थी और 1 सैनिक के लापता होने की खबर आई थी। इस गुप्त चर्चा की जानकारी रखने वाले 2 सूत्रों ने बताया कि अमेरिका अब कुछ सैन्य ठिकानों को जमीन के नीचे यानी भूमिगत करने पर विचार कर रहा है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य यह है कि यदि ईरान के साथ युद्ध लंबे समय तक चलता है, तो मिसाइल और ड्रोन हमलों से सैनिकों और महत्वपूर्ण उपकरणों को सुरक्षित रखा जा सके। एक सूत्र ने यह भी खुलासा किया कि अमेरिका को अपने कमजोर ढांचे के बारे में बहुत पहले से जानकारी थी, लेकिन समय रहते ठोस कार्रवाई नहीं की गई थी।
खुफिया नेटवर्क और रणनीतिक चुनौतियां
अमेरिकी सैन्य रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा उसका खुफिया और निगरानी नेटवर्क है। इसी नेटवर्क के जरिए अमेरिका ईरान की मिसाइल गतिविधियों, ड्रोन लॉन्च और सैन्य हलचल पर पैनी नजर रखता है। किसी भी हमले से पहले मिसाइल की दिशा और उसके संभावित लक्ष्य का पता लगाना बेहद जरूरी होता है और ऐसे में इन खुफिया केंद्रों की सुरक्षा करना अमेरिका के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। ईरान पहले ही क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाने की धमकी दे चुका है। कतर, कुवैत और बहरीन जैसे देशों में अमेरिकी मौजूदगी इस संघर्ष को केवल दो देशों के बीच सीमित नहीं रहने देती, बल्कि पूरे खाड़ी क्षेत्र को एक संभावित युद्धक्षेत्र में बदल देती है और अब अमेरिका के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने 50000 सैनिकों और अरबों के सैन्य ढांचे को ईरान के मिसाइल बेड़े से बचाने की है।