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अब्राहम समझौते में सऊदी कतर और पाकिस्तान को शामिल करने की अमेरिकी कोशिश के मायने

अब्राहम समझौते में सऊदी कतर और पाकिस्तान को शामिल करने की अमेरिकी कोशिश के मायने
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अमेरिका की कोशिश मिडिल ईस्ट की सुरक्षा में एक बृहद गठबंधन तैयार करने की है। इसके लिए उसने अब्राहम समझौते को आगे बढ़ाया है। अगर मुस्लिम देश इसको लेकर सहमत हो जाते हैं तो आने वाले समय में फिलिस्तीन का मुद्दा पूरी तरह गौण हो जाएगा और इजराइल की स्वीकार्यता काफी बढ़ जाएगी। ईरान परमाणु समझौते की जद्दोजेहद के बीच अमेरिका ने आधिकारिक तौर पर सऊदी अरब, कतर और पाकिस्तान जैसे मुस्लिम देशों से अब्राहम समझौते में शामिल होने के लिए कहा है। यह एक कूटनीतिक समझौता है, जिसके केंद्र में यहूदी देश इजराइल है।

अब्राहम समझौता और इसका इतिहास

ईसाई, यहूदी और इस्लाम धर्म के पूर्वज माने जाने वाले नबी इब्राहीम के नाम पर इस समझौते का नाम अब्राहम रखा गया है। अब्राहम समझौता मिडिल ईस्ट की राजनीति में बड़े बदलाव लाने वाला एक कूटनीतिक कदम है। इस समझौते की पहल अमेरिका द्वारा की गई थी। 2020 में यूएई ने इस समझौते पर सबसे पहले सहमति दी थी। इसके बाद बहरीन, सूडान और मोरक्को भी इसमें शामिल हुए। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में इस समझौते की नींव रखी थी और इस समझौते को इजराइल को अरब देशों की मान्यता दिलाने वाला सबसे बड़ा कूटनीतिक कदम माना जाता है।

इन देशों को शामिल करने के पीछे अमेरिका के 4 बड़े कारण

अमेरिका द्वारा सऊदी, कतर और पाकिस्तान को इस समझौते में शामिल करने की कोशिश के पीछे कई रणनीतिक कारण हैं:

  • पहला कारण यह है कि अमेरिका मिडिल ईस्ट में MESA (मिडिल ईस्ट स्ट्रैटजी अफेयर्स) पर काम कर रहा है। इसके जरिए उसकी कोशिश मिडिल ईस्ट और एशिया के कुछ देशों को साथ लाने की है। इस मिशन के लिए इजराइल, सऊदी, कतर और पाकिस्तान उसके लिए जरूरी हैं, ताकि मिडिल ईस्ट में रूस और चीन के प्रभाव को भविष्य में पूरी तरह खत्म किया जा सके।
  • दूसरा कारण फिलिस्तीन पर हमलों के कारण मुस्लिम देशों में इजराइल की कम स्वीकार्यता है। इसे बढ़ाने के लिए अमेरिका ने अब्राहम समझौते का ड्राफ्ट तैयार किया था। समझौते में अगर सऊदी, पाकिस्तान और कतर शामिल होते हैं तो इजराइल से इनके रक्षा और व्यापार संबंध ठीक होंगे और मुस्लिम दुनिया में इजराइल की स्वीकार्यता बढ़ेगी।
  • तीसरा कारण ईरान और तालिबान से निपटने की रणनीति है। ये दोनों देश अमेरिका के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं। दोनों को कंट्रोल में रखने के लिए इस समझौते में पाकिस्तान को शामिल करने की तैयारी है। पाकिस्तान दुनिया का पहला मुस्लिम देश है, जिसके पास परमाणु हथियार हैं।
  • चौथा कारण घरेलू राजनीति है। क्विंसी इंस्टीट्यूट के वाइस प्रेसिडेंट त्रिता पारसी के मुताबिक, अब्राहम समझौते का मुद्दा उठाकर राष्ट्रपति ट्रंप इजराइल समर्थक बनने की कोशिश कर रहे हैं। अमेरिका और ईरान के बीच जिन मुद्दों पर सहमति बनी है, उसे इजराइल विरोधी माना जा रहा है। ऐसे में ट्रंप की कोशिश अब्राहम मुद्दे को उठाकर यहूदी समुदाय को खुश रखने की है।

पाकिस्तान और सऊदी अरब के सामने चुनौतियां

रिपब्लिकन पार्टी के सीनेटर और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के करीबी लिंडसे ग्राहम ने कहा है कि मिडिल ईस्ट में स्थिति को सामान्य करने के लिए यह समझौता जरूरी है। अमेरिकी आउटलेट एक्सियोस ने सोमवार को एक रिपोर्ट में कहा था कि ट्रंप ने इन देशों को इसमें शामिल होने के लिए कहा है। हालांकि, अटलांटिक काउंसिल के दक्षिण एशिया में सीनियर फेलॉ माइकल कुघलमैन के मुताबिक, पाकिस्तान के लिए इसमें शामिल होना आसान नहीं है। पाकिस्तान की जनता इसे स्वीकार नहीं करेगी क्योंकि फिलिस्तीन का मुद्दा वहां हमेशा से संवेदनशील रहा है।

पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने इसमें शामिल नहीं होने की बात कही है, लेकिन कुघलमैन का मानना है कि पाकिस्तान के नीतिगत मामलों में ख्वाजा की राय को हमेशा तरजीह नहीं दी जाती है और कुघलमैन आगे कहते हैं कि अमेरिका के साथ काम करने का यही जोखिम है कि वाशिंगटन कभी भी कोई ऐसा प्रस्ताव रख सकता है जिसके बारे में आपने सोचा न हो। सऊदी अरब की चिंताएं भी कुछ इसी तरह की हैं, जहां उसे अपनी क्षेत्रीय छवि और अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच संतुलन बनाना पड़ रहा है।

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