पश्चिम एशिया में जारी सैन्य संघर्ष अब वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिए एक गंभीर चुनौती बन गया है। इजराइल द्वारा ईरान के साउथ पार्स गैस फील्ड पर किए गए हमले के जवाब में ईरान ने कतर, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब में स्थित महत्वपूर्ण तेल और गैस ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए हैं। आधिकारिक रिपोर्टों के अनुसार, ईरान ने कतर में कतरएनर्जी के रास लफान इंडस्ट्रियल सिटी को निशाना बनाया है, जो दुनिया का सबसे बड़ा एलएनजी (LNG) निर्यात केंद्र माना जाता है। इस क्षेत्र में बढ़ते तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता पैदा कर दी है, क्योंकि रास लफान से सालाना लगभग 77 से 80 मिलियन टन एलएनजी का निर्यात होता है, जो वैश्विक एलएनजी व्यापार का लगभग 20% हिस्सा है।
रास लफान पर हमले और वैश्विक प्रभाव
ईरान द्वारा कतर के रास लफान निर्यात केंद्र पर किया गया हमला रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह केंद्र न केवल कतर की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, बल्कि एशिया और यूरोप के कई देशों के लिए ऊर्जा का प्राथमिक स्रोत भी है। आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक गैस भंडार का लगभग 25% हिस्सा इसी प्रभावित क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। इसके अतिरिक्त, वैश्विक तेल प्रवाह का लगभग 20% हिस्सा भी इसी व्यापक भौगोलिक क्षेत्र से होकर गुजरता है। सऊदी अरब के अधिकारियों ने भी पुष्टि की है कि उनके पूर्वी क्षेत्र में एक गैस संयंत्र को निशाना बनाया गया है, जबकि बैलिस्टिक मिसाइल के अवशेष रियाद स्थित एक रिफाइनरी के पास पाए गए हैं। इन हमलों ने क्षेत्र के ऊर्जा बुनियादी ढांचे की संवेदनशीलता को उजागर कर दिया है।
भारत की गैस आपूर्ति संरचना और घरेलू उत्पादन
भारत की ऊर्जा सुरक्षा काफी हद तक आयातित एलएनजी और घरेलू उत्पादन के संतुलन पर टिकी है। वर्तमान में, भारत की पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) आपूर्ति का लगभग आधा हिस्सा घरेलू गैस क्षेत्रों से आता है। ओएनजीसी (ONGC) और रिलायंस जैसी प्रमुख कंपनियां जमीन और समुद्र में स्थित गैस क्षेत्रों से इसका उत्पादन करती हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, घरेलू उत्पादन को प्राथमिकता दी जाती है ताकि घरों और परिवहन क्षेत्र (CNG) को निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके। अधिकारियों का कहना है कि पाइप वाली गैस का उपयोग करने वाले उपभोक्ताओं के लिए वर्तमान में किसी बड़े व्यवधान की आशंका कम है, क्योंकि सरकार ने इन क्षेत्रों को प्राथमिकता श्रेणी में रखा है।
कतर पर भारत की निर्भरता और आयात के आंकड़े
भारत अपनी कुल गैस आवश्यकता का लगभग आधा हिस्सा एलएनजी आयात के माध्यम से पूरा करता है। वर्ष 2025 के अनुमानों के अनुसार, भारत का एलएनजी आयात लगभग 24-25 मिलियन टन रहने की संभावना है, जो इसे दुनिया के सबसे बड़े एलएनजी खरीदारों में से एक बनाता है। भारत के कुल एलएनजी आयात का 50% से अधिक हिस्सा अकेले कतर से आता है। पेट्रोनेट एलएनजी और कतरएनर्जी के बीच दीर्घकालिक अनुबंधों के तहत यह आपूर्ति सुनिश्चित की जाती है। कतर के अलावा, भारत अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, रूस और अफ्रीका के कुछ देशों से भी एलएनजी का आयात करता है, लेकिन मात्रा के मामले में कतर की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। रास लफान पर हमले सीधे तौर पर इन आपूर्ति श्रृंखलाओं को प्रभावित कर सकते हैं।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और लॉजिस्टिक चुनौतियां
भारत के एलएनजी आयात का एक बड़ा हिस्सा, लगभग 50 से 55 प्रतिशत, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) के रास्ते से होकर गुजरता है। वर्तमान संघर्ष के दौरान ईरान ने इस जलडमरूमध्य पर कड़ा नियंत्रण कर रखा है और हालांकि, राजनयिक सूत्रों के अनुसार, ईरान ने भारतीय जहाजों को इस मार्ग से गुजरने की अनुमति दी है, जो भारत के लिए एक राहत की बात है। एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि कच्चे तेल के विपरीत, भारत के पास एलएनजी का कोई रणनीतिक भंडार (Strategic Reserves) नहीं है। गैस को मुख्य रूप से वर्किंग इन्वेंट्री के रूप में ही स्टोर किया जाता है, जिसका अर्थ है कि आपूर्ति श्रृंखला में किसी भी लंबे व्यवधान का असर जल्द ही वितरण नेटवर्क पर दिखाई दे सकता है।
भारत-कतर दीर्घकालिक समझौते और भविष्य की स्थिति
5 मिलियन टन प्रति वर्ष एलएनजी आयात के लिए 20 साल के समझौते का नवीनीकरण किया था। इस सौदे की कुल कीमत लगभग USD 78 बिलियन आंकी गई है। केप्लर (Kpler) के आंकड़ों के अनुसार, पिछले वर्ष अमेरिका भारत का तीसरा सबसे बड़ा एलएनजी आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा है, जिसने कुल आयात में 12% का योगदान दिया। कतर और संयुक्त अरब अमीरात के बाद अमेरिका की बढ़ती भूमिका भारत के लिए आपूर्ति विविधीकरण की दिशा में एक कदम है। हालांकि, वर्तमान में कतर के ठिकानों पर हुए हमलों ने अल्पकालिक आपूर्ति जोखिमों को बढ़ा दिया है, जिस पर पेट्रोलियम मंत्रालय और संबंधित एजेंसियां निरंतर निगरानी रख रही हैं।