उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों सबसे बड़ा सवाल यह बना हुआ है कि लखनऊ में हुए हाई-वोल्टेज ड्रामे के बाद पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अजय राय का अगला कदम क्या होगा। लखनऊ स्थित कांग्रेस मुख्यालय में 11 अक्टूबर को जो कुछ भी हुआ, उसने न केवल पार्टी की छवि पर असर डाला है, बल्कि अजय राय के राजनीतिक भविष्य को लेकर भी कई तरह की अटकलों को जन्म दे दिया है। यह पूरा विवाद उस समय शुरू हुआ जब नई प्रदेश अध्यक्ष आराधना मिश्रा के पदभार ग्रहण समारोह का आयोजन किया जा रहा था। इस गरिमामय कार्यक्रम के दौरान अजय राय और उनके समर्थकों की महिला कांग्रेस नेता ममता चौधरी और उनके समर्थकों के साथ तीखी बहस हो गई, जिसने देखते ही देखते हाथापाई का रूप ले लिया। इस घटना के बाद से ही अजय राय वाराणसी में अपने आवास पर हैं और उन्होंने एक तरह की चुप्पी साध रखी है।
बीजेपी में वापसी की चर्चा और हकीकत
लखनऊ की घटना के बाद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि क्या अजय राय एक बार फिर अपनी पुरानी पार्टी बीजेपी का दामन थाम सकते हैं। हालांकि, उनके बेहद करीबी सूत्रों और कार्यकर्ताओं का कहना है कि बीजेपी में लौटने की संभावना न के बराबर है और एक कार्यकर्ता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान भी बीजेपी की ओर से अजय राय को पार्टी में शामिल होने का प्रस्ताव दिया गया था, लेकिन उन्होंने उसे ठुकरा दिया था। अजय राय के करीबियों का मानना है कि 2009 का राजनीतिक घटनाक्रम उनके लिए एक कड़वा अनुभव रहा है और वह उस समय की परिस्थितियों को अपने साथ हुए विश्वासघात के रूप में देखते हैं। इसके अलावा, उनकी राजनीतिक विचारधारा का समाजवादी पार्टी या बहुजन समाज पार्टी के साथ तालमेल बैठना भी मुश्किल माना जा रहा है, इसलिए उनके लिए कांग्रेस में रहकर ही संघर्ष करना सबसे तार्किक विकल्प नजर आता है।
धार्मिक छवि और पार्टी के भीतर असहजता
अजय राय ने प्रदेश अध्यक्ष के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान अपनी एक अलग राजनीतिक पहचान बनाने की कोशिश की थी। उन्होंने धार्मिक यात्राओं और मंदिरों के दर्शन को अपनी राजनीति का प्रमुख हिस्सा बनाया। उनके करीबियों का दावा है कि उन्होंने अपने कार्यकाल में 11 बार अयोध्या और 9 बार मथुरा के दर्शन किए। इतना ही नहीं, उन्होंने गोवर्धन की सात कोस की परिक्रमा भी नंगे पैर पूरी की थी। अजय राय के इस 'हिंदुत्व कार्ड' या धार्मिक झुकाव ने कांग्रेस के भीतर ही कई वरिष्ठ नेताओं को असहज कर दिया था और पार्टी के एक वर्ग का मानना था कि यह शैली कांग्रेस की पारंपरिक धर्मनिरपेक्ष राजनीति से मेल नहीं खाती, जिसके कारण संगठन के भीतर आंतरिक खींचतान बढ़ती गई।
अल्पसंख्यक समुदाय के मुद्दों पर सक्रियता
धार्मिक यात्राओं के साथ-साथ अजय राय ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़े मुद्दों पर भी काफी सक्रियता दिखाई थी। उनके समर्थकों का कहना है कि सहारनपुर, रामपुर, बरेली और मुरादाबाद जैसे जिलों में जब भी अल्पसंख्यकों से जुड़े मामले सामने आए, अजय राय ने वहां जाकर मजबूती से अपना पक्ष रखा। मुरादाबाद में मस्जिद विवाद हो या जौहर विश्वविद्यालय के खिलाफ की गई कार्रवाई, अजय राय ने इन मुद्दों पर मुखर होकर विरोध प्रदर्शन किया और उन्होंने सहारनपुर में मस्जिद से जुड़े एक मामले में धरना भी दिया था और जेल में बंद तौकीर रजा से मुलाकात भी की थी। उनकी इस सक्रियता ने अल्पसंख्यक समुदाय के एक बड़े हिस्से में उनकी स्वीकार्यता तो बढ़ाई, लेकिन पार्टी के भीतर नेतृत्व के साथ उनके मतभेदों को भी गहरा कर दिया।
संगठनात्मक खींचतान और राजेंद्र पाल गौतम से विवाद
कांग्रेस के भीतर चल रही इस खींचतान का एक बड़ा कारण प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम के साथ अजय राय के रिश्तों में आई खटास को भी माना जा रहा है। बताया जाता है कि अजय राय और राजेंद्र पाल गौतम के बीच कई मुद्दों पर सहमति नहीं बन पा रही थी। दिलचस्प बात यह है कि लखनऊ में जिस ममता चौधरी के साथ अजय राय का विवाद हुआ, उन्हें राजेंद्र पाल गौतम का करीबी माना जाता है। ऐसे में इस विवाद को केवल दो नेताओं की लड़ाई के रूप में नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर चल रहे गुटीय संघर्ष के रूप में देखा जा रहा है। अजय राय के समर्थकों का आरोप है कि उन्हें प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाने के पीछे पार्टी के ही कुछ बड़े नेताओं की साजिश थी, जो उनकी बढ़ती लोकप्रियता और आक्रामक कार्यशैली से डरे हुए थे।
चुनावी इतिहास और पिंडरा पर फोकस
अजय राय का राजनीतिक सफर काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है। वह अब तक कुल 5 बार विधायक रह चुके हैं। उन्होंने 3 बार बीजेपी के टिकट पर जीत हासिल की, 1 बार वह निर्दलीय विधायक बने और 1 बार उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर जीत दर्ज की। हालांकि, पिछले 5 चुनावों में उन्हें कांग्रेस के टिकट पर हार का सामना करना पड़ा है। इन हारों के बावजूद, वाराणसी और आसपास के क्षेत्रों में उनका प्रभाव कम नहीं हुआ है। सूत्रों का कहना है कि अजय राय अब अपनी पूरी ताकत पिंडरा विधानसभा क्षेत्र में अपनी जमीन मजबूत करने पर लगा सकते हैं। वह इसी हफ्ते दिल्ली जाकर राहुल गांधी से मुलाकात कर सकते हैं, जहां वह लखनऊ की घटना और अपने भविष्य की भूमिका पर चर्चा करेंगे। फिलहाल उन्होंने मीडिया से आधिकारिक रूप से बात करने से मना कर दिया है, लेकिन उनकी चुप्पी किसी बड़े राजनीतिक तूफान का संकेत दे रही है।