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बांग्लादेश चुनाव: तारिक रहमान की जीत, 35 साल बाद पुरुष प्रधानमंत्री

बांग्लादेश चुनाव: तारिक रहमान की जीत, 35 साल बाद पुरुष प्रधानमंत्री
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बांग्लादेश के राजनीतिक परिदृश्य में एक ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिल रहा है। हाल ही में संपन्न हुए आम चुनावों में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने प्रचंड बहुमत हासिल किया है। निर्वाचन आयोग द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, 299 संसदीय सीटों में से BNP ने 209 सीटों पर जीत दर्ज की है। अब तक 286 सीटों के परिणाम घोषित किए जा चुके हैं, जिसमें बहुमत के लिए आवश्यक 150 का आंकड़ा पार्टी ने आसानी से पार कर लिया है। इस जीत के साथ ही पार्टी के वरिष्ठ नेता तारिक रहमान का प्रधानमंत्री बनना लगभग निश्चित माना जा रहा है।

चुनाव परिणाम और सत्ता का नया समीकरण

निर्वाचन अधिकारियों के अनुसार, इस बार के चुनावों में विपक्षी दलों की अनुपस्थिति और छात्र आंदोलनों के बाद बदले माहौल का सीधा लाभ BNP को मिला है। तारिक रहमान ने दो अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों से चुनाव लड़ा और दोनों ही सीटों पर बड़े अंतर से जीत हासिल की और पिछले साल दिसंबर में 17 साल का निर्वासन समाप्त कर स्वदेश लौटे तारिक रहमान के लिए यह जीत उनके राजनीतिक करियर का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ मानी जा रही है। अवामी लीग को चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं मिलने के कारण मुकाबला एकतरफा रहा, जिससे BNP को दो-तिहाई बहुमत प्राप्त हुआ है।

महिला नेतृत्व के तीन दशकों का अंत

बांग्लादेश की राजनीति में पिछले 35 वर्षों से महिलाओं का वर्चस्व रहा है। 1991 से लेकर 2024 तक देश की सत्ता मुख्य रूप से दो महिला नेताओं, शेख हसीना और खालिदा जिया के इर्द-गिर्द घूमती रही। 1988 में काजी जफर अहमद के पद छोड़ने के बाद यह पहला अवसर होगा जब कोई पुरुष नेता प्रधानमंत्री की शपथ लेगा। राजनीतिक विश्लेषकों और आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, 1991 में संसदीय लोकतंत्र की बहाली के बाद से बांग्लादेश ने केवल महिला प्रधानमंत्रियों का शासन देखा है। शेख हसीना के देश छोड़ने और खालिदा जिया के निधन के बाद अब नेतृत्व की कमान पूरी तरह से नई पीढ़ी के हाथ में जा रही है।

तारिक रहमान की राजनीतिक वापसी और पृष्ठभूमि

तारिक रहमान की सत्ता में वापसी कई मायनों में महत्वपूर्ण है। वे पूर्व राष्ट्रपति जियाउर रहमान और पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के पुत्र हैं। आधिकारिक विवरणों के अनुसार, वे लंबे समय तक लंदन में निर्वासन में रहे और वहां से पार्टी की गतिविधियों का संचालन करते रहे। 2024 के छात्र आंदोलन के दौरान हुई हिंसा और उसके बाद शेख हसीना सरकार के पतन ने उनके लिए राजनीतिक रास्ते खोल दिए। निर्वाचन आयोग ने अवामी लीग पर प्रतिबंधात्मक कार्रवाई करते हुए उसे चुनाव प्रक्रिया से बाहर रखा था, जिसका आधार छात्र आंदोलन के दौरान हुई मानवाधिकारों की कथित अवहेलना को बनाया गया था।

बांग्लादेश में पुरुष प्रधानमंत्रियों का ऐतिहासिक संदर्भ

स्वतंत्र बांग्लादेश के इतिहास में शुरुआती दौर में पुरुष नेताओं ने कमान संभाली थी। 1971 में स्वतंत्रता के बाद शेख मुजीबुर रहमान देश के पहले प्रधानमंत्री बने थे। उनके बाद ताजुद्दीन अहमद, मुहम्मद मंसूर अली और शाह अज़ीजुर रहमान जैसे नेताओं ने इस पद की जिम्मेदारी निभाई। हालांकि, 1975 के तख्तापलट और उसके बाद के सैन्य हस्तक्षेपों के कारण देश में राजनीतिक अस्थिरता बनी रही। 1980 के दशक के अंत तक मिज़ानुर रहमान चौधरी और काजी जफर अहमद प्रधानमंत्री रहे, लेकिन 1991 के बाद से यह पद पूरी तरह से महिला नेतृत्व के अधीन आ गया था।

नई सरकार के समक्ष प्रशासनिक और आर्थिक चुनौतियां

अधिकारियों और आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार, नई सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना है। बांग्लादेश वर्तमान में उच्च मुद्रास्फीति और विदेशी मुद्रा भंडार की कमी जैसी समस्याओं से जूझ रहा है और इसके अतिरिक्त, अवामी लीग को चुनाव से बाहर रखने के फैसले पर अंतरराष्ट्रीय समुदायों की प्रतिक्रिया और आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ करना तारिक रहमान के लिए प्राथमिकता होगी। छात्र संगठनों की अपेक्षाओं को पूरा करना और प्रशासनिक सुधारों को लागू करना भी आगामी सरकार के लिए एक जटिल कार्य होगा।

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