एसबीआई रिसर्च की एक नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच विकसित हो रहे नए व्यापारिक संबंध भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण आर्थिक लाभ ला सकते हैं। रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि द्विपक्षीय व्यापार समझौतों और टैरिफ संरचना में बदलाव के कारण भारत का अमेरिका के साथ व्यापार अधिशेष (Trade Surplus) 45 अरब डॉलर तक बढ़ सकता है। यह विकास भारत की निर्यात क्षमता को मजबूत करने और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में इसकी भूमिका को विस्तारित करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
व्यापार अधिशेष और जीडीपी पर संभावित प्रभाव
एसबीआई रिसर्च के आंकड़ों के अनुसार, इस व्यापारिक तालमेल से भारत का अमेरिका के साथ कुल व्यापार अधिशेष 90 अरब डॉलर के स्तर को पार कर सकता है। रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि पारस्परिक टैरिफ में लगभग 18% की कमी आने की संभावना है, जिससे अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी। 1% की अतिरिक्त वृद्धि दर्ज की जा सकती है। अधिकारियों और शोधकर्ताओं के अनुसार, यह वृद्धि दर भारतीय अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में नई पूंजी के प्रवाह को सुनिश्चित करेगी।
15 प्रमुख उत्पाद श्रेणियों में निर्यात की संभावनाएं
रिपोर्ट में उन 15 प्रमुख उत्पाद श्रेणियों की पहचान की गई है जिनमें निर्यात वृद्धि की सर्वाधिक संभावना है। वर्तमान में, अमेरिका के कुल 3 ट्रिलियन डॉलर के आयात बाजार में भारत की हिस्सेदारी लगभग 3% है। एसबीआई की रिपोर्ट के अनुसार, इलेक्ट्रिकल मशीनरी, फार्मास्यूटिकल्स (दवाइयां), इंजीनियरिंग सामान, रत्न एवं आभूषण और टेक्सटाइल जैसे क्षेत्रों में 'अनमेट डिमांड' यानी अधूरी मांग को पूरा करने की बड़ी क्षमता है। इन क्षेत्रों में निर्यात क्षमता 100 अरब डॉलर सालाना को पार करने का अनुमान लगाया गया है, जो न केवल बड़े निगमों बल्कि सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) के लिए भी विस्तार के अवसर प्रदान करेगा।
कृषि और समुद्री खाद्य क्षेत्र के लिए शुल्क रियायतें
व्यापार समझौते के तहत कृषि क्षेत्र को मिलने वाली रियायतें विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। रिपोर्ट के अनुसार, भारत के लगभग 75% कृषि निर्यात पर अब अमेरिका में कोई अतिरिक्त शुल्क (Zero Additional Tariff) नहीं लगेगा। इसका सीधा लाभ चावल, मसाले, चाय, कॉफी, काजू और समुद्री भोजन (Seafood) के निर्यातकों को मिलने की उम्मीद है। अमेरिका वर्तमान में अपनी आवश्यकता का 25% चावल भारत से आयात करता है, और शुल्क में कमी के बाद इस मात्रा में और वृद्धि होने की संभावना है। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में विदेशी मुद्रा का प्रवाह बढ़ेगा और प्राथमिक क्षेत्र की आय में सुधार होगा।
टैरिफ संरचना में बदलाव और वैश्विक प्रतिस्पर्धा
भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक चर्चाओं में टैरिफ को तर्कसंगत बनाने पर जोर दिया गया है। वियतनाम और अन्य दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों के मुकाबले भारतीय सामानों को प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए टैरिफ बाधाओं को कम किया जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने भी अगले पांच वर्षों में अमेरिका से विमानन, ऊर्जा और उच्च तकनीक क्षेत्रों में 500 अरब डॉलर के उत्पाद खरीदने की योजना बनाई है। यह पारस्परिक सहयोग दोनों देशों के बीच व्यापार संतुलन को बनाए रखने और दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने के उद्देश्य से किया गया है।
रणनीतिक आपूर्ति श्रृंखला और विनिर्माण केंद्र
वैश्विक स्तर पर अपनाई जा रही 'चीन+1' रणनीति के तहत भारत एक प्रमुख विनिर्माण केंद्र (Manufacturing Hub) के रूप में उभर रहा है। एसबीआई की रिपोर्ट बताती है कि अमेरिकी कंपनियां अब अपनी आपूर्ति श्रृंखला के लिए चीन पर निर्भरता कम कर रही हैं और भारत को एक विश्वसनीय विकल्प के रूप में देख रही हैं। विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक्स और उच्च-तकनीकी विनिर्माण में अमेरिकी निवेश बढ़ने की संभावना है। यह रणनीतिक बदलाव भारत को वैश्विक मूल्य श्रृंखला (Global Value Chain) में एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी के रूप में स्थापित करने में सहायक होगा, जिससे औद्योगिक उत्पादन और रोजगार के अवसरों में वृद्धि होने की उम्मीद है।