भारत चीन सीमा विवाद और 21 साल में हुई 25 बैठकों का पूरा सच और ताजा सहमति

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भारत चीन सीमा विवाद और 21 साल में हुई 25 बैठकों का पूरा सच और ताजा सहमति
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भारत और चीन के बीच सीमा विवाद को सुलझाने के लिए पिछले 21 साल में कुल 25 बैठकें हो चुकी हैं। अगस्त 2026 की बैठक में 8 बिंदुओं पर सहमति बनी है, लेकिन सीमा का अंतिम निर्धारण अब भी बाकी है। भारत और चीन के बीच सीमा विवाद दशकों पुराना है और दोनों देशों के बीच बातचीत भी लंबे समय से चल रही है, लेकिन अब तक पूरी सीमा पर अंतिम समझौता नहीं हो पाया है। अगस्त 2026 में दोनों देशों के विशेष प्रतिनिधियों की 25वीं बैठक हुई, जिसमें सीमा तय करने की बातचीत आगे बढ़ाने, वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी पर शांति बनाए रखने और सैन्य अधिकारियों के बीच संपर्क बढ़ाने पर सहमति बनी।

सीमा विवाद के आंकड़े और चीन के कब्जे वाली जमीन

विदेश मंत्रालय ने 8 दिसंबर 2011 को राज्यसभा में जानकारी दी थी कि जम्मू-कश्मीर में भारत की करीब 38,000 वर्ग किलोमीटर जमीन पर चीन का अवैध कब्जा है। इसके अलावा 2 मार्च 1963 को चीन और पाकिस्तान के बीच हुए सीमा समझौते के तहत पाकिस्तान ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर यानी पीओके की भारतीय जमीन का करीब 5,180 वर्ग किलोमीटर हिस्सा चीन को सौंप दिया था। भारत सरकार ने इस हस्तांतरण को हमेशा अवैध करार दिया है। वहीं, सीमा के पूर्वी हिस्से में चीन अरुणाचल प्रदेश की करीब 90,000 वर्ग किलोमीटर जमीन पर अपना दावा पेश करता है। आईटीबीपी के डीजी शत्रुजीत कपूर का कहना है कि पिछले कुछ महीनों में अरुणाचल प्रदेश में चीन और भारत के सैनिक आमने-सामने आ गए थे और कई जगहों पर टकराव की स्थिति भी बनी थी जो अभी भी जारी है।

2003 में शुरू हुई विशेष प्रतिनिधियों की बातचीत

भारत और चीन ने साल 2003 में सीमा विवाद का राजनीतिक समाधान तलाशने के लिए दोनों देशों के विशेष प्रतिनिधि नियुक्त करने पर सहमति जताई थी। इनका मुख्य काम सीमा समझौते का ऐसा फ्रेमवर्क तैयार करना था जिस पर दोनों देश अपनी सहमति दे सकें। शुरुआती पांच बैठकों के बाद 11 अप्रैल 2005 को दोनों देशों ने भारत-चीन सीमा विवाद के समाधान के लिए राजनीतिक मानकों और मार्गदर्शक सिद्धांतों से जुड़े समझौते पर हस्ताक्षर किए। इसका मुख्य उद्देश्य एक निष्पक्ष, उचित और दोनों देशों को स्वीकार्य समाधान की दिशा तय करना था। अगस्त 2026 तक विशेष प्रतिनिधियों की कुल 25 बैठकें हो चुकी हैं, लेकिन अब तक पूरी सीमा के लिए ऐसा कोई अंतिम समझौता नहीं हुआ है जिससे यह विवाद हमेशा के लिए खत्म हो सके।

25वीं बैठक में तय हुए आठ प्रमुख बिंदु

बीजिंग में 25 अगस्त 2026 को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने 25वें दौर की उच्चस्तरीय बातचीत में हिस्सा लिया। इसके अगले दिन 26 अगस्त को जारी संयुक्त सहमति में कुल आठ प्रमुख बातें शामिल थीं। सबसे पहली बात सीमा पर शांति बनाए रखने और संबंधों को स्थिर बनाने के लिए लगातार काम करने की थी और दूसरी बात 2005 के समझौते के आधार पर ऐसा समाधान तलाशने की थी जो निष्पक्ष हो और जिसे दोनों देश स्वीकार कर सकें। तीसरी बात सीमा निर्धारण और सीमा प्रबंधन से जुड़े दो कार्य समूहों की भूमिका बढ़ाने की थी, जिन्हें पहले अपने काम की शर्तें और दायरा तय करना होगा। चौथी बात जमीन पर किसी भी स्थिति या विवाद को कूटनीतिक बातचीत, सैन्य अधिकारियों और मौजूदा संपर्क व्यवस्थाओं के जरिए तुरंत सुलझाने की कोशिश करने की थी। पांचवीं बात पूर्वी और मध्य क्षेत्रों में सैन्य हॉटलाइन के दो अतिरिक्त संपर्क माध्यम और सीनियर सैन्य कमांडरों की बैठकों के लिए दो अतिरिक्त जगहें तय करने की थी। छठी बात तीन तय सीमा व्यापार केंद्रों को फिर से खोलने का स्वागत करने, कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए भारतीय यात्रियों के जत्थों की संख्या बढ़ाने और सीमा पार सहयोग मजबूत करने पर जोर देने की थी। सातवीं बात सितंबर में सीमा पार बहने वाली नदियों पर एक्सपर्ट ग्रुप की बैठक आयोजित करने की थी, जिसमें पानी के बहाव और जलस्तर से जुड़े आंकड़े साझा करने तथा पुराने समझौतों को आगे बढ़ाने पर चर्चा होगी। आठवीं और अंतिम बात दोनों देशों द्वारा विशेष प्रतिनिधियों की 26वीं बैठक साल 2027 में भारत में आयोजित करने पर सहमति जताने की थी।

गलवान संघर्ष और उसके बाद रिश्तों में आए बदलाव

भारत और चीन के रिश्तों में कड़वाहट और तनाव की सबसे बड़ी वजह जून 2020 में गलवान घाटी में दोनों देशों की सेनाओं के बीच हुई हिंसक झड़प थी। इसके बाद सीमा पर दोनों देशों के बीच आपसी भरोसा काफी घट गया और संबंधों पर गहरा असर पड़ा और इसके जवाब में भारत ने चीनी निवेश पर कड़ी पाबंदियां लगाईं, टिकटॉक समेत कई लोकप्रिय चीनी ऐप पर प्रतिबंध लगाया और चीन के साथ होने वाली सीधी उड़ानों को पूरी तरह रोक दिया था। हालांकि, अक्टूबर 2024 में पूर्वी लद्दाख में सैनिकों की वापसी यानी डिसइंगेजमेंट को लेकर सहमति बन गई। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच भी महत्वपूर्ण मुलाकात हुई। साल 2025 में दोनों देशों के बीच सीधी उड़ानें फिर से शुरू कर दी गईं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीन में आयोजित एससीओ समिट में शामिल हुए। इन सभी कदमों से दोनों देशों के संबंधों को सामान्य बनाने की कोशिशों को आगे बढ़ाने में काफी मदद मिली।

आर्थिक संबंध और भविष्य की चुनौतियां

इन तमाम कूटनीतिक प्रयासों के बावजूद सीमा विवाद पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, लेकिन दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंध लगातार अहम बने हुए हैं। साल 2025 में भारत और चीन के बीच द्विपक्षीय व्यापार बढ़कर 155 अरब 60 करोड़ डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया, जो पिछले साल के मुकाबले 12 प्रतिशत से भी ज्यादा था। इसका मतलब साफ है कि सीमा पर तनाव के बावजूद दोनों देशों के आर्थिक रिश्ते लगातार मजबूत होते रहे हैं। यदि सीमा निर्धारण की बातचीत आगे बढ़ती है, तो इससे विवादित इलाकों को लेकर दोनों देशों की स्थिति और अधिक स्पष्ट हो सकती है। नए हॉटलाइन संपर्क माध्यम और सैन्य बैठक स्थल किसी भी तनावपूर्ण स्थिति में तुरंत बातचीत करने में बहुत मदद कर सकते हैं, जिससे किसी भी प्रकार की गलतफहमी के कारण होने वाले टकराव का खतरा काफी हद तक घट सकता है। हालांकि, सीमा पर शांति बनाए रखना और सीमा विवाद का अंतिम समाधान निकालना दोनों बिल्कुल अलग बातें हैं। वर्तमान में दोनों देशों ने केवल बातचीत आगे बढ़ाने और सीमा प्रबंधन सुधारने पर अपनी सहमति जताई है। उन्होंने अभी तक यह बिल्कुल नहीं बताया है कि किस इलाके की सीमा सबसे पहले तय होगी, जमीन पर कौन-से ठोस बदलाव किए जाएंगे और अंतिम समझौते की निश्चित समय-सीमा क्या होगी। एक्सपर्ट ग्रुप्स को सबसे पहले अपने काम का दायरा तय करना होगा और उसके बाद ही यह पूरी तरह स्पष्ट हो पाएगा कि सीमा निर्धारण की प्रक्रिया में कितनी ठोस प्रगति होती है, जिसके लिए साल 2027 में होने वाली 26वीं बैठक अगला सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव साबित होगी।

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