35 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया गया है। 83 प्रतिशत दर्ज की गई थी। 74 प्रतिशत के ऊंचे स्तर पर पहुंच गई है। इन तमाम चुनौतियों के बावजूद, दूसरी तरफ औद्योगिक उत्पादन, निर्यात, जीएसटी संग्रह और बैंक कर्ज में लगातार हो रही बढ़ोतरी से देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत सहारा मिल रहा है, जिससे समग्र आर्थिक गतिविधियां पटरी पर बनी हुई हैं और विभिन्न क्षेत्रों में सकारात्मक परिणाम देखने को मिल रहे हैं।
आर्थिक वृद्धि दर और वैश्विक अनुमान
35 प्रतिशत रह सकती है। 8 प्रतिशत दर्ज की गई थी, जिसका सीधा मतलब यह है कि आर्थिक विकास की रफ्तार में मामूली नरमी आने के बावजूद यह देश में बेहद मजबूत बनी हुई है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ ने पूरे वित्त वर्ष के लिए भारत की आर्थिक वृद्धि का अनुमान बढ़ाकर 7 प्रतिशत कर दिया है। 1 प्रतिशत की वृद्धि का मजबूत अनुमान जताया है, जो देश की आर्थिक स्थिरता और निवेशकों के भरोसे को दर्शाता है।
औद्योगिक उत्पादन और जीएसटी कलेक्शन में शानदार बढ़ोतरी
देश के औद्योगिक क्षेत्र में भी उल्लेखनीय मजबूती देखने को मिली है और अगस्त 2026 के दौरान औद्योगिक उत्पादन में सालाना आधार पर पूरे 8 प्रतिशत की शानदार वृद्धि दर्ज की गई। इस विशेष अवधि में विनिर्माण क्षेत्र का उत्पादन 9 प्रतिशत तक बढ़ गया। 9 प्रतिशत की ठोस बढ़ोतरी दर्ज की गई। 6 प्रतिशत के उच्च स्तर पर रही। इन तमाम वित्तीय और औद्योगिक आंकड़ों से यह स्पष्ट रूप से पता चलता है कि देश में आर्थिक गतिविधियां पूरी गति से जारी हैं और विभिन्न प्रकार के व्यवसायों तथा कारोबार को बैंक कर्ज के जरिए भरपूर मदद मिल रही है।
महंगाई का बढ़ता दबाव और खाने-पीने की चीजों के दाम
एक तरफ जहां देश में आर्थिक विकास और उत्पादन के मोर्चे पर अच्छे संकेत मिल रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ महंगाई का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है, जिससे आम जनता की मुश्किलें बढ़ी हैं। 83 प्रतिशत थी। 74 प्रतिशत के ऊंचे स्तर पर पहुंच गई है। बाजार में प्याज, चीनी, खाद्य तेल और चावल की कीमतों में लगातार हुई बढ़ोतरी को इस महंगाई का प्रमुख कारण बताया गया है। इस बढ़ती हुई महंगाई पर पूरी तरह से काबू पाने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने अपनी मौद्रिक नीति के तहत रेपो दर में 25 आधार अंक की बढ़ोतरी की है और मौद्रिक नीति के रुख को तटस्थ से धीरे-धीरे सख्ती की ओर बदल दिया है, जिसके परिणामस्वरूप रेपो दर बढ़ने से भविष्य में आम जनता और उद्योगों के लिए कर्ज की ब्याज दरों पर भी इसका सीधा असर पड़ सकता है।
निर्यात में 11 प्रतिशत की वृद्धि और मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार
वैश्विक बाजार में चारों तरफ छाई अनिश्चितता के बावजूद सितंबर 2026 के दौरान भारत के वस्तुओं और सेवाओं के कुल निर्यात में सालाना आधार पर 11 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। 1 प्रतिशत की जबरदस्त बढ़ोतरी की बेहद अहम भूमिका रही है। इसके साथ ही देश का वित्तीय स्वास्थ्य भी अत्यंत मजबूत स्थिति में है। आगामी 16 अक्टूबर 2026 तक भारत का कुल विदेशी मुद्रा भंडार 721 अरब डॉलर के ऊंचे स्तर पर पहुंच चुका था। 3 महीने के आयात की सभी जरूरी आवश्यकताओं को आसानी से पूरा करने के बिल्कुल बराबर है। विदेशी मुद्रा भंडार के इतना मजबूत रहने से अंतरराष्ट्रीय भुगतानों को चुकाने और बाहरी आर्थिक झटकों से देश की अर्थव्यवस्था को बचाने में बहुत बड़ी मदद मिलती है।
कम बारिश का कृषि क्षेत्र पर दबाव और खरीफ फसलें
देश के कई हिस्सों में मानसून के दौरान हुई कम बारिश का सीधा असर अब कृषि क्षेत्र पर पड़ सकता है, जो अर्थव्यवस्था के लिए एक चिंता का विषय है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, आगामी 2 अक्टूबर 2026 तक देश में खरीफ फसलों की बुवाई का कुल क्षेत्र 1,115 लाख 31 हजार हेक्टेयर दर्ज किया गया, जबकि गत वर्ष इसी समान अवधि में यह बुवाई क्षेत्र 1,127 लाख 12 हजार हेक्टेयर था। गौरतलब है कि जून से लेकर सितंबर के बीच के महीनों में देश भर में सामान्य औसत के मुकाबले 13 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई थी। इस कम वर्षा के कारण आगामी समय में कृषि फसलों के कुल उत्पादन पर गंभीर असर पड़ने और देश भर में खाद्य पदार्थों की खुदरा तथा थोक कीमतों में और अधिक बढ़ोतरी होने का बड़ा खतरा लगातार बना हुआ है।
मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में रोजगार और निवेश में बढ़ोतरी
59 प्रतिशत की ठोस वृद्धि दर्ज की गई है। 19 प्रतिशत की सकारात्मक वृद्धि देखी गई। 2 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। ये सभी आंकड़े इस बात की तस्दीक करते हैं कि विनिर्माण क्षेत्र लगातार विस्तार की ओर अग्रसर है और देश में रोजगार के नए अवसरों के साथ-साथ औद्योगिक निवेश भी तेजी से बढ़ रहा है।