भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश सहित पांच राज्यों में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों से पहले सवर्ण मतदाताओं को अपने पाले में बनाए रखने के लिए एक नई रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। पिछले एक सप्ताह के भीतर केंद्र सरकार द्वारा लिए गए दो बड़े फैसलों को इसी कवायद का हिस्सा माना जा रहा है और इनमें से पहला फैसला जाति जनगणना के प्रारूप से संबंधित है, जबकि दूसरा फैसला विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के इक्विटी नियमों में बदलाव की समीक्षा से जुड़ा है। इन कदमों के जरिए बीजेपी ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि वह अपने पारंपरिक और कोर वोट बैंक की चिंताओं के प्रति संवेदनशील है और किसी भी कीमत पर उनकी नाराजगी मोल नहीं लेना चाहती।
जाति जनगणना और उपजातियों का पेच
केंद्र सरकार द्वारा हाल ही में जारी किए गए जनगणना के ड्राफ्ट में एक महत्वपूर्ण बदलाव देखा गया है। इस नए प्रारूप में जातियों को उनकी उपजातियों में विभाजित नहीं किया गया है। इस फैसले पर राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज हो गई है और इसे सवर्ण समाज को एकजुट रखने की एक कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव का मानना है कि उपजातियों को अलग-अलग दर्ज न करने से जाति गणना का वह सटीक और विस्तृत डेटा सामने नहीं आ पाएगा जिसकी उम्मीद की जा रही थी। गौरतलब है कि साल 2012 में हुए सोशल इकोनॉमिक्स सर्वे के दौरान भी कुछ इसी तरह की प्रक्रिया अपनाई गई थी, जिसके परिणामस्वरूप देशभर में करीब 47 लाख जातियों के आंकड़े सामने आए थे। जानकारों का कहना है कि उपजातियों की अलग से गिनती न करके सरकार ने सवर्ण समाज के भीतर किसी भी संभावित विभाजन को रोकने और उनकी सामूहिक शक्ति को बरकरार रखने का प्रयास किया है।
यूजीसी इक्विटी नियम 2026 पर पुनर्विचार
दूसरा महत्वपूर्ण फैसला यूजीसी की इक्विटी नीति से जुड़ा है और केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में यह स्पष्ट किया है कि वह यूजीसी इक्विटी नियम 2026 में बदलाव के लिए पुनर्विचार कर रही है। गुरुवार को हुई सुनवाई के दौरान केंद्र ने अदालत को बताया कि इस मामले पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है। दरअसल, इस नीति को लेकर सवर्ण समाज और सामान्य वर्ग के छात्रों के बीच लंबे समय से असंतोष था। ऐसी आशंकाएं जताई जा रही थीं कि इस नए कानून के लागू होने से विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले सामान्य वर्ग के मेधावी छात्रों को कई तरह की प्रशासनिक और शैक्षणिक दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। सरकार के इस कदम को सवर्ण समाज की इन्हीं चिंताओं को शांत करने और युवाओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
2027 का चुनावी रण और सवर्णों की भूमिका
फरवरी 2027 में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मणिपुर, गोवा और पंजाब में विधानसभा के चुनाव होने हैं। इन 5 राज्यों में से 4 में इस समय बीजेपी की सरकारें हैं। उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य है और यहां की राजनीति में सवर्ण मतदाताओं की भूमिका अत्यंत निर्णायक मानी जाती है। बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में लगातार तीसरी बार सत्ता में आने का लक्ष्य रखा है और इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सवर्णों का साथ मिलना अनिवार्य है। पार्टी की स्थापना के समय से ही सवर्णों को बीजेपी का सबसे भरोसेमंद और कोर वोटर माना जाता रहा है, इसलिए चुनाव से पहले उनकी नाराजगी दूर करना पार्टी की प्राथमिकता बन गई है।
उत्तर प्रदेश में सवर्णों का जनसंख्या गणित
उत्तर प्रदेश की सामाजिक संरचना में सवर्ण यानी सामान्य वर्ग की आबादी कुल जनसंख्या का करीब 15 से 19 प्रतिशत मानी जाती है। इस वर्ग के भीतर भी अलग-अलग जातियों का अपना प्रभाव है। आंकड़ों के अनुसार, ब्राह्मण समाज की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा करीब 9 से 10 प्रतिशत है। इसके बाद राजपूत यानी ठाकुर समाज की आबादी करीब 5 प्रतिशत है। भूमिहार समाज की हिस्सेदारी करीब 2 प्रतिशत और वैश्य (बनिया) समाज भी करीब 2 प्रतिशत के आसपास है। इसके अलावा कायस्थ और अन्य सवर्ण जातियां शेष हिस्से में आती हैं। चुनावी नजरिए से इतनी बड़ी आबादी को नजरअंदाज करना किसी भी राजनीतिक दल के लिए संभव नहीं है, क्योंकि ये मतदाता न केवल खुद वोट देते हैं बल्कि सामाजिक विमर्श को भी प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।
बीजेपी के लिए सवर्ण क्यों हैं अनिवार्य?
CSDS-Lokniti के पोस्ट-पोल सर्वे के आंकड़ों पर नजर डालें तो 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के 79 प्रतिशत सवर्ण मतदाताओं ने एनडीए के पक्ष में मतदान किया था। इसी चुनाव में बीजेपी को उत्तर प्रदेश की 33 सीटों पर जीत हासिल हुई थी, जिनमें से करीब 17 सांसद यानी लगभग 50 प्रतिशत सांसद सवर्ण समुदाय से ही आते हैं। ये आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि सवर्ण वोटर न केवल बीजेपी का पारंपरिक आधार हैं, बल्कि पार्टी की विधायी शक्ति में भी उनका बहुत बड़ा योगदान है। ऐसे में इस वोट बैंक में किसी भी तरह की सेंधमारी या नाराजगी पार्टी के लिए बड़ा राजनीतिक संकट पैदा कर सकती है।
ऐतिहासिक चुनावी पैटर्न और सवर्णों का रुख
उत्तर प्रदेश की राजनीति में सवर्णों ने समय-समय पर अपनी ताकत का अहसास कराया है और साल 2007 में जब बहुजन समाज पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला था, तब उसके पीछे दलितों और ब्राह्मणों का एक अनूठा सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूला था। इसके बाद 2009 के लोकसभा चुनाव में करीब 53 प्रतिशत ब्राह्मणों ने बीजेपी का साथ दिया था। हालांकि, 2012 के विधानसभा चुनाव में सवर्णों का झुकाव समाजवादी पार्टी की ओर देखा गया, जहां करीब 19 प्रतिशत ब्राह्मणों ने सपा को वोट दिया और राजपूत समाज के वोट शेयर में भी सपा को 6 प्रतिशत की बढ़त मिली। इसी समर्थन के दम पर सपा ने 224 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी। 2014 के बाद से सवर्णों का बड़ा हिस्सा फिर से बीजेपी के साथ जुड़ गया, जो 2017 और 2022 के चुनावों में भी बरकरार रहा। यही कारण है कि बीजेपी 2027 के चुनाव से पहले अपने इस मजबूत किले को और अधिक सुरक्षित करने में जुट गई है।