गुलाम बने देशों से माफी मांगेंगे ब्रिटेन के प्रधानमंत्री, सूची में 19 देश शामिल

Add as Preferred Source on Google News →
विज्ञापन
गुलाम बने देशों से माफी मांगेंगे ब्रिटेन के प्रधानमंत्री, सूची में 19 देश शामिल
विज्ञापन

ब्रिटेन के राजनीतिक गलियारों और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में इन दिनों ऐतिहासिक रूप से हुए अन्याय के निवारण को लेकर एक बहुत बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एंडी बर्नहैम उन 19 देशों से माफी मांगने की तैयारी कर रहे हैं, जिन्हें एक वक्त में लंदन ने गुलाम बनाया था और उनके लोगों को दास व्यापार के तहत बेच दिया था। यह ऐतिहासिक फैसला कॉमनवेल्थ की मीटिंग से ठीक पहले काफी जोर-शोर से तैयार किया जा रहा है और इसे लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी व्यापक चर्चा हो रही है। ब्रिटिश प्रधानमंत्री का यह कदम ऐसे वक्त में उठाया जा रहा है, जब उन पर और उनकी सरकार पर ऐतिहासिक रूप से गुलाम बनाए गए देशों की तरफ से भारी हर्जाना और मुआवजा देने का लगातार दबाव बढ़ता जा रहा है। हाल ही में अफ्रीका और कैरेबियाई क्षेत्र के कुछ देशों ने ब्रिटेन की अदालतों में मुकदमा भी दाखिल किया है, जिससे ब्रिटेन की सरकार असहज स्थिति में है। इन तमाम मुकदमों और कानूनी लड़ाइयों में इन देशों का साफ तौर पर कहना है कि ब्रिटेन ने उन्हें सदियों तक गुलाम बनाए रखा, जिसके कारण उनके देश का आर्थिक विकास पूरी तरह से ठप हो गया और पीढ़ियों तक उनके नागरिकों को अमानवीय कष्ट झेलने पड़े।

ब्रिटिश अखबार द गार्जियन का बड़ा खुलासा और ऐतिहासिक संदर्भ

ब्रिटिश अखबार द गार्जियन की एक विस्तृत रिपोर्ट के मुताबिक इन पीड़ित देशों ने ब्रिटेन के सामने एक स्पष्ट मांग रखी है कि वह पहले औपचारिक रूप से माफी मांगे और उसके बाद भारी-भरकम हर्जाना अदा करे। हालांकि इसके उलट, प्रधानमंत्री कार्यालय की मुख्य कोशिश सिर्फ और सिर्फ माफी मांगकर पूरे मामले को हमेशा के लिए रफा-दफा करने की है, ताकि वित्तीय देनदारियों से बचा जा सके। इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि इससे पहले वर्ष 2016 में भी इस तरह की पहल करने का प्रयास हुआ था, लेकिन उस वक्त के प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने इस संवेदनशील मुद्दे पर सिर्फ खेद जताकर ही इतिश्री कर ली थी और कोई ठोस माफी या कदम नहीं उठाया था। अब वर्तमान प्रधानमंत्री एंडी बर्नहैम के सामने यह मामला एक बार फिर से बेहद गंभीर चुनौती बनकर उभरा है, जिससे निपटने के लिए उनकी सरकार कूटनीतिक रास्ते तलाश रही है। पंद्रहवीं से उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान हुए ट्रांस-अटलांटिक दास व्यापार के काले अध्याय के तहत करीब एक करोड़ पच्चीस लाख अफ्रीकी लोगों को जबरन गुलाम बनाकर अटलांटिक पार दूसरे महाद्वीपों में भेजा गया था, जिसे मानवता के इतिहास का सबसे बड़ा काला धब्बा माना जाता है।

किन-किन 19 देशों से माफी मांगेगा ब्रिटेन

ब्रिटेन की तरफ से जिन देशों से माफी मांगे जाने की पूरी तैयारी चल रही है, उनमें कई प्रमुख अफ्रीकी और अन्य देश शामिल हैं। इन देशों की सूची में गिनी, डीआर कांगो और नाइजीरिया जैसे मौजूदा देश सबसे प्रमुख रूप से शामिल हैं, जिन्होंने दास व्यापार के कारण सबसे ज्यादा यातनाएं झेली थीं। इसके अलावा इस लंबी सूची में घाना, लाइबेरिया, बेनिन, टोगो, कैमरून, अंगोला, सिएरा लियोन, गांबिया और सेनेगल के आम नागरिकों और पूर्वजों को भी ब्रिटेन द्वारा जबरन बेचे जाने का दर्द झेलना पड़ा था। अब ब्रिटेन सरकार इन सभी देशों से संपर्क साधकर अपनी ऐतिहासिक भूल सुधारने और माफी मांगने की योजना को अमलीजामा पहनाने में जुटी हुई है। ब्रिटिश प्रधानमंत्री कार्यालय से जुड़े गोपनीय सूत्रों ने द गार्जियन को यह भी जानकारी दी है कि प्रधानमंत्री बर्नहैम ने व्यक्तिगत तौर पर उन तमाम देशों से संपर्क साधा है, जिन्हें ब्रिटेन ने अपनी सैन्य और राजनीतिक ताकत के बल पर गुलाम बनाया था। बर्नहैम ने इन देशों के प्रतिनिधियों से यह संवाद स्थापित किया है कि वे किस तरह से औपचारिक माफी स्वीकार कर सकते हैं, ताकि यह पुराना और जटिल विवाद हमेशा के लिए खत्म हो सके और ब्रिटेन की वैश्विक छवि में सुधार हो सके।

मुआवजे के सवाल पर ब्रिटिश सरकार का कड़ा रुख

जहां एक तरफ पीड़ित देश भारी-भरकम मुआवजे और वित्तीय मदद की मांग पर अड़े हुए हैं, वहीं दूसरी तरफ ब्रिटिश प्रधानमंत्री कार्यालय का यह स्पष्ट रुख सामने आया है कि बर्नहैम व्यक्तिगत रूप से और आधिकारिक तौर पर मुआवजा देने के बिल्कुल पक्ष में नहीं हैं। ब्रिटिश सरकार का मानना है कि इतनी बड़ी धनराशि देना देश की अर्थव्यवस्था के लिए मुमकिन नहीं है। हालांकि, बीच का रास्ता निकालते हुए प्रधानमंत्री कार्यालय ने यह जरूर संकेत दिया है कि यदि कोई पीड़ित देश अपने यहां विकास कार्यों और आधारभूत संरचना के लिए ब्रिटेन से किसी प्रकार की मदद मांगता है, तो उसे री-स्ट्रक्चरिंग के नाम पर विशेष आर्थिक सहायता या पैसे दिए जा सकते हैं, जिसे सीधे तौर पर मुआवजा न कहकर विकास सहयोग कहा जाएगा और ब्रिटेन के नीति-निर्माताओं का यह भी तर्क है कि सदियों पुरानी गलतियों और कृत्यों के लिए आज की आधुनिक पीढ़ी या नई पीढ़ी के नागरिकों को सीधे तौर पर जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है, क्योंकि वे घटनाएं इतिहास का हिस्सा बन चुकी हैं। चार दिन पहले ही प्रकाशित हुए एक लेख में ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने खुद इस बात को रेखांकित करते हुए कहा था कि इतिहास की भूलों का बोझ वर्तमान पीढ़ी पर नहीं डाला जाना चाहिए।

ब्रिटेन को अचानक यह बड़ा फैसला क्यों लेना पड़ा

ब्रिटेन सरकार द्वारा अचानक उठाए जा रहे इन कदमों और माफी मांगने की इस पूरी कवायद के पीछे कई बेहद महत्वपूर्ण और रणनीतिक कारण छिपे हुए हैं, जो निम्नलिखित हैं:

  • जमैका देश ने ब्रिटेन के खिलाफ और वहां की सरकार के सबसे बड़े स्तर पर ब्रिटेन की ही अदालत में केस दायर कर दिया है। सबसे बड़ी बात यह है कि इस कानूनी कार्रवाई के लिए ब्रिटेन के अपने किंग चार्ल्स तृतीय ने भी अपनी औपचारिक अनुमति दे दी है। यदि ब्रिटिश अदालत सुनवाई के बाद मुआवजा देने का कोई भी आदेश पारित करती है, तो ब्रिटेन सरकार को कानूनी रूप से पैसे देने ही होंगे। इसके अलावा, अदालत में सुनवाई के दौरान जो तीखी दलीलें और खुलासे रखे जाएंगे, उनसे पूरी दुनिया के सामने ब्रिटेन की भारी किरकिरी होगी और उसकी अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को बड़ा आघात पहुंचेगा। बर्नहैम की सरकार किसी भी कीमत पर ऐसी शर्मनाक स्थिति से बचना चाहती है।
  • आगामी नवंबर के महीने में एक बहुत ही महत्वपूर्ण कॉमनवेल्थ समिट आयोजित होने वाली है। अगर इस उच्चस्तरीय सम्मेलन में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री व्यक्तिगत रूप से शामिल नहीं होते हैं या रिश्तों में खटास बनी रहती है, तो यह लंदन के लिए एक बहुत बड़ा कूटनीतिक झटका साबित हो सकता है। मौजूदा भू-राजनीतिक हालात ऐसे हैं कि ब्रिटेन को इस वक्त कॉमनवेल्थ देशों के समर्थन की अत्यधिक आवश्यकता है, खासकर तब जब अमेरिका ने यूरोप को लगभग पूरी तरह से अलग-थलग कर दिया है और ब्रिटेन को नए साझीदारों की तलाश है।
  • कैरेबियाई देशों के समूह ने ब्रिटेन से दो हजार चार सौ उनतीस लाख करोड़ रुपये का भारी-भरकम मुआवजा देने की आधिकारिक मांग रख दी है। इतनी विशालकाय रकम का भुगतान करना इस वक्त ब्रिटेन की आर्थिक क्षमता से बाहर है। इसी वजह से कूटनीतिक दबाव को कम करने और समिट को सफल बनाने के लिए यह माफी वाला दांव खेला जा रहा है, ताकि बात मुआवजे से हटकर केवल प्रतीकात्मक माफी तक सीमित रह सके।
विज्ञापन